भगवान अर्जुन से कह रहे है- यह युद्ध किये बिना तुम्हे शांति नहीं मिल सकती। इसलिए अपने मोह का त्याग करो , युद्ध करो, युद्ध करो।
क्षत्रिय होने के नाते भी अपने स्वधर्म का विचार करते हुए धर्म के लिये युद्ध करने से बढ़ कर कुछ नहीं।
अर्जुन सोच रहा है कि यद्यपि जीवात्मा नित्य है और शरीर के नष्ट हो जाने पर भी जीवात्मा नष्ट नहीं होता। परंतु धर्म के अनुसार क्या यह उचित है कि मैं अपने संबंधियो की हत्या करूँ।
फिर भला युद्ध से शांति का क्या लेना देना है।
अर्जुन उलझा हुआ है। वह फिर भगवान् कृष्ण से प्रश्न करता है।
युद्ध करने से अनेको हत्याए होगी
तो फिर संन्यास लेके संसार का त्याग करना क्यों उचित नहीं।
क्या संसार को त्याग कर ईश्वर की भक्ति में कोई शांति नहीं।
भगवान ने कहा- ये युद्ध इसी बात का ही तो परिणाम है। जब धर्म को जानने वाले लोग संसार का त्याग करते है तो अधर्मी लोग इस संसार पर राज करने लगते है।
जैसे वर्षा के बाद सूर्य की गर्मी से जल वाष्प बन कर उड़ जाता है और कीचड़ रह जाता है।
उसी प्रकार सत्वगुणी सज्जन लोग इस संसार का त्याग करते है और तमोगुण से युक्त लोग धरती पर राज करने लगते है परिणाम स्वरूप् अधर्म, पाप और अत्याचार बढ़ जाता है।
जब तमोगुणी व्यक्ति शासन करता
है तो केवल अपना स्वार्थ देखता है।
स्वार्थवश वो केवल अपने सुख साधनो को बढ़ाने में और मौज मस्ती में ही लगा रहता है। प्रजा के सुुुुुख
दुःख से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
ऐसे राजा की प्रजा या तो दुखो और कष्टो में जीवन यापन करते है या फिर प्रजा भी अनैतिक कार्य करने लगती
है ऐसे देश या राज्य में चोरी डकैती छिना झपटी , हत्या और बलात्कार जैसे कुकृत्य बढ़ जाते है।
ये सारी अशांति उन लोगो के कारन है जो अपने कर्तव्य का पालन करने की जगह संन्यास ले लेते है।
संन्यास वही ले सकते है जो अपने
कर्तव्यों से मुक्त हो चुका हो।
परन्तु तुम्हे संन्यास से बढ़कर अपने स्वधर्म( क्षत्रिय ) का पालन
करना चाहिए। स्वधर्म पर विचार करते हुए तुुम्हे संकोच अथवा चिंंता करने
की आवशयक्ता नही है।
यदि युद्ध में कुल नष्ट होते हो या तुम्हारे प्रियजनों की मृत्यु हो तो भी तुम्हे इन सभी परिणामों की चिंता न करके केवल अपने स्वधर्म की चिंता करनी चाहिए।
अर्जुन तुम परिणाम जानना चाहते हो तो इस युद्ध का परिणाम होगा धर्म की पूर्ण स्थापना। धर्म की पूर्ण स्थापना का अर्थ है- कुलधर्म, जातिधर्म, स्त्रीधर्म, स्वधर्म आदि सभी प्रकार के धर्मो की स्थापना।
शास्त्र का कहना है- धर्मो रक्षति रक्षित:| अर्थात जो व्यक्ति अपने धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसे नष्ट कर देता है।
भगवान कहते है-
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:|
अर्थात अपने स्वधर्म में मरना भी कल्याणकारी है तथा पराया धर्म भयंकर है।
यदि अपने स्वधर्म में कोई गुण न दिखाई दे तथा पराये धर्म में अनेक गुण दिखाई दे तो भी अपने स्वधर्म में ही श्रेय प्राप्त होगा। इसलिए हे अर्जुन युद्ध करो।
Psychological view से भी देखते है। कि मनुष्य को धर्म की चिंता क्यों करनी चाहिए।
मानसिक और बौद्धिक तौर पर सभी मनुष्य में अलग अलग गुण और अवगुण दोनों ही होते है। उन्ही गुणों और अवगुणों के कारण व्यक्ति का एक प्रकार का स्वभाव बनता है। अपने इसी स्व्भाव
और बुद्धि द्वारा वह अनेक कार्य करता है।
जो उसका स्वधर्म कहलाता है।
मान लो एक व्यक्ति काफी पढ़ लिख कर एक डॉक्टर बन जाता है।
और एक दूसरा व्यक्ति अधिक पढ़ा लिखा न होने के कारण एक कार मैकेनिक बन जाता है।
अब मानसिक तौर पर और कर्म
के तौर पर दोनों अलग अलग बुद्धि वाले मनुष्य है।
यदि डॉक्टर की कार ख़राब हो जाए तो
वह अपनी बुद्धि द्वारा उसे ठीक नहीं कर सकता इसके लिए उसे कार मैकेनिक के पास जाना ही होगा।
इसी तरह कार मैकेनिक को यदि कोई रोग लग जाए तो वह अपनी कारीगरी से
अपना रोग ठीक नहीं कर सकता।
दोनों ही व्यक्ति अपने अपने कार्यक्षेत्र में निपुण है क्योंकि यह अब उनका स्वधर्म बन चूका है। अपने स्वधर्म को छोड़ वह कोई अन्य कार्य करेगा तो नुकसान उठाएगा। डॉक्टर कार ठीक नहीं कर सकता , मैकेनिक अपना रोग ठीक नहीं कर सकता। दोनों ही अपने स्वभाव के कारन अपने अपने कामो में बुद्धिमान है।
चेतन मन का कार्य है सीखना । अभ्यास द्वारा सीखना । और भीतर का अवचेतन मन वो शक्ति है जो तुम्हे वो बनाती है जो तुम चाहते हो।
जैसे एक व्यक्ति कार सीखते वक्त बहुत डरता है।बहुत सावधानी से कार चलाता है फिर भी यहाँ वहाँ कार को ठोक देता है।
क्योंकि जब तक वह बुद्धि( चेतन मन) द्वारा प्रयास करता है डरता है परंतु अभ्यास करते करते वह कार चलाना सीख जाता है। अब वह कार चलाते हुए डरता नहीं बल्कि एक
हाथ से कोल्ड ड्रिंक भी पी रहा है। पीछे बैठे व्यक्ति से बात भी कर रहा है। रेडियो पर चल रहे गाने भी सुन रहा है। फिर भी बहुत अच्छी कार चला रहा है। क्योंकि कार चलाना अब उसका स्वभाव( आदत) बन चूका है। क्योंकि अवचेतन मन ने उसके प्रयास को ग्रहण कर लिया है। याद रखिये अवचेतन मन हमारे स्वभाव का आदतों का केंद्र है।
कोई भी अपने स्वभाव से विपरीत कार्य नहीं कर पायेगा। यदि किया भी तो वह उतना अच्छा नहीं होगा जितना एक expert करता है।
इसी प्रकार अर्जुन जाती से ही नहीं स्व्भाव से भी एक योद्धा है। और वह अपने स्वभाव से विपरीत सन्यासी बनने की बात कर रहा है जो उसके लिए और संसार
दोनों के ही लिए गलत होता।
( psychological गीता से related सभी पिछले भागों को अवश्य पढ़े आपको समझने में आसानी होगी - आपका मित्र)
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