जागो हिंदू: जनवरी 2018

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

गंगाजल का रहस्य-२

*गंगाजल ख़राब क्यों नहीं होता

हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा (भागीरथी), हरिद्वार (देवप्रयाग) में अलकनंदा से मिलती है। यहाँ तक आते-आते इसमें कुछ चट्टानें घुलती जाती हैं जिससे इसके जल में ऐसी क्षमता पैदा हो जाती है जो पानी को सड़ने नहीं देती। हर नदी के जल की अपनी जैविक संरचना होती है, जिसमें वह ख़ास तरह के घुले हुए पदार्थ रहते हैं जो कुछ क़िस्म के जीवाणु को पनपने देते हैं और कुछ को नहीं। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि गंगा के पानी में ऐसे जीवाणु हैं जो सड़ाने वाले कीटाणुओं को पनपने नहीं देते, इसलिए पानी लंबे समय तक ख़राब नहीं होता।

वैज्ञानिक कारण
वैज्ञानिक बताते हैं कि हरिद्वार में गोमुख- गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता पर इसलिए कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवनदायनी उपयोगी जड़ी-बूटियों, खनिज पदार्थों और लवणों को स्पर्श करता हुआ आता है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा के जल का ख़राब नहीं होने के कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। गंगाजल में बैट्रिया फोस नामक एक बैक्टीरिया पाया गया है जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को खाता रहता है। इससे जल की शुद्धता बनी रहती है।

गंगा के पानी में गंधक (सल्फर) की प्रचुर मात्रा मौजूद रहती है; इसलिए भी यह ख़राब नहीं होता। इसके अतिरिक्त कुछ भू-रासायनिक क्रियाएं भी गंगाजल में होती रहती हैं, जिससे इसमें कभी कीड़े पैदा नहीं होते। यही कारण है कि यह पानी सदा पीने योग्य माना गया है। जैसे-जैसे गंगा हरिद्वार से आगे अन्य शहरों की ओर बढ़ती जाती है शहरों, नगर निगमों और खेती-बाड़ी का कूड़ा-करकट तथा औद्योगिक रसायनों का मिश्रण गंगा में डाल दिया जाता है।

वैज्ञानिको के मत एवं शोध
वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि गंगाजल से स्नान करने तथा गंगाजल को पीने से हैजा, प्लेग, मलेरिया तथा क्षय आदि रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इस बात की पुष्टि के लिए एक बार डॉ. हैकिन्स, ब्रिटिश सरकार की ओर से गंगाजल से दूर होने वाले रोगों के परीक्षण के लिए आए थे। उन्होंने गंगाजल के परिक्षण के लिए गंगाजल में हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले गए। हैजे के कीटाणु मात्र 6 घंटें में ही मर गए और जब उन कीटाणुओं को साधारण पानी में रखा गया तो वह जीवित होकर अपने असंख्य में बढ़ गया। इस तरह देखा गया कि गंगाजल विभिन्न रोगों को दूर करने वाला जल है।

फ्रांस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. हैरेन ने गंगाजल पर वर्षों अनुसंधन करके अपने प्रयोगों का विवरण शोधपत्रों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने आंत्र शोध व हैजे से मरे अज्ञात लोगों के शवों को गंगाजल में ऐसे स्थान पर डाल दिया, जहाँ कीटाणु तेजी से पनप सकते थे। डॉ. हैरेन को आश्चर्य हुआ कि कुछ दिनों के बाद इन शवों से आंत्र शोध व हैजे के ही नहीं बल्कि अन्य कीटाणु भी गायब हो गए। उन्होंने गंगाजल से 'बैक्टीरियासेपफेज' नामक एक घटक निकाला, जिसमें औषधीय गुण हैं।

इंग्लैंड के जाने-माने चिकित्सक सी. ई. नेल्सन ने गंगाजल पर अन्वेषण करते हुए लिखा कि इस जल में सड़ने वाले जीवाणु ही नहीं होते। उन्होंने महर्षि चरक को उद्धृत करते हुए लिखा कि गंगाजल सही मायने में पथ्य है।

रूसी वैज्ञानिकों ने हरिद्वार एवं काशी में स्नान के उपरांत 1950 में कहा था कि उन्हें स्नान के उपरांत ही ज्ञात हो पाया कि भारतीय गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं।

गंगाजल की पाचकता के बारे में ओरियंटल इंस्टीटयूट में हस्तलिखित आलेख रखे हैं। कनाडा के मैकिलन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. एम. सी. हैमिल्टन ने गंगा की शक्ति को स्वीकारते हुए कहा कि वे नहीं जानते कि इस जल में अपूर्व गुण कहाँ से और कैसे आए। सही तो यह है कि चमत्कृत हैमिल्टन वस्तुत: समझ ही नहीं पाए कि गंगाजल की औषधीय गुणवत्ता को किस तरह प्रकट किया जाए।

आयुर्वेदाचार्य गणनाथ सेन, विदेशी यात्री इब्नबतूता वरनियर, अंग्रेज़ सेना के कैप्टन मूर, विज्ञानवेत्ता डॉ. रिचर्डसन आदि सभी ने गंगा पर शोध करके यही निष्कर्ष दिया कि यह नदी अपूर्व है।

गंगाजल में स्नान
गंगा नदी में तैरकर स्नान करने वालों को स्नान का विशेष लाभ होता है। गंगाजल अपने खनिज गुणों के कारण इतना अधिक गुणकारी होता है कि इससे अनेक प्रकार के रोग दूर होते हैं। गंगा नदी में स्नान करने वाले लोग स्वस्थ और रोग मुक्त बने रहते हैं। इससे शरीर शुद्ध और स्फूर्तिवान बनता है। भारतीय सभ्यता में गंगा को सबसे पवित्र नदी माना जाता है। गंगा नदी के पानी में विशेष गुण के कारण ही गंगा नदी में स्नान करने भारत के विभिन्न क्षेत्र से ही नहीं बल्कि संसार के अन्य देशों से भी लोग आते हैं। गंगा नदी में स्नान के लिए आने वाले सभी लोग विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति पाने के लिए हरिद्वार और ऋषिकेश आकर मात्र कुछ ही दिनों में केवल गंगा स्नान से पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। कई विद्वानों ने गंगाजल की पवित्रता का वर्णन अपने निबन्धों में पूर्ण आत्मा से किया है। भौतिक विज्ञान के कई आचार्यो ने भी गंगाजल की अद्भुत शक्ति और प्रभाव को स्वीका

महाविद्या साधना-१

गुप्त नवरात्रि विशेष
🔸🔸🔹🔹🔸🔸
दस महाविद्या दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में अलग ही महत्त्व है। लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सदगुरू से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते है।

महाकाली महाविद्या दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
यह तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है। आप चाहे या न चाहे विघटनकारी तत्व आपके जीवन की शांति, सौहार्द भंग करते ही रहते हैं। एक दृष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की अपेक्षा एक सरल और शांत प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए अपमान, तिरस्कार के द्वार खुले ही रहते हैं। आज ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसका कोई शत्रु न हो … और शत्रु का तात्पर्य मानव जीवन की शत्रुता से ही नहीं, वरन रोग, शोक, व्याधि, पीडा भी मनुष्य के शत्रु ही कहे जाते हैं, जिनसे व्यक्ति हर क्षण त्रस्त रहता है … और उनसे छुटकारा पाने के लिए टोने टोटके आदि के चक्कर में फंसकर अपने समय और धन दोनों का ही व्यय करता है, परन्तु फिर भी शत्रुओं से छुटकारा नहीं मिल पाता।

महाकाली दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है, क्योंकि महाकाली ही मात्र वे शक्ति स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार कर अपने भक्तों को रक्षा कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालिदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने ‘मेघदूत’ , ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति भी कई गुना बढ़ जाती है।

तारा दीक्षा
🔹🔸🔹🔸🔹
तारा के सिद्ध साधक के बारे में प्रचिलित है, वह जब प्रातः काल उठाता है, तो उसे सिरहाने नित्य दो तोला स्वर्ण प्राप्त होता है। भगवती तारा नित्य अपने साधक को स्वार्णाभूषणों का उपहार देती हैं। तारा महाविद्या दस महाविद्याओं में एक श्रेष्ठ महाविद्या हैं। तारा दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक को जहां आकस्मिक धन प्राप्ति के योग बनने लगते हैं, वहीं उसके अन्दर ज्ञान के बीज का भी प्रस्फुटन होने लगता है, जिसके फलस्वरूप उसके सामने भूत भविष्य के अनेकों रहस्य यदा-कदा प्रकट होने लगते हैं। तारा दीक्षा प्राप्त करने के बाद साधक का सिद्धाश्रम प्राप्ति का लक्ष्य भी प्रशस्त होता हैं।

षोडशी त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा प्राप्त होने से आद्याशक्ति त्रिपुरा शक्ति शरीर की तीन प्रमुख नाडियां इडा, सुषुम्ना और पिंगला जो मन बुद्धि और चित्त को नियंत्रित करती हैं, वह शक्ति जाग्रत होती है। भू भुवः स्वः यह तीनों इसी महाशक्ति से अद्भुत हुए हैं, इसीसलिए इसे त्रिपुर सुन्दरी कहा जाता है। इस दीक्षा के माध्यम से जीवन में चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही साथ आध्यात्मिक जीवन में भी सम्पूर्णता प्राप्त होती है, कोई भी साधना हो, चाहे अप्सरा साधना हो, देवी साधना हो, शैव साधना हो, वैष्णव साधना हो, यदि उसमें सफलता नहीं मिल रहीं हो, तो उसको पूर्णता के साथ सिद्ध कराने में यह महाविद्या समर्थ है, यदि इस दीक्षा को पहले प्राप्त कर लिया जाए तो साधना में शीघ्र सफलता मिलती है। गृहस्थ सुख, अनुकूल विवाह एवं पौरूष प्राप्ति हेतु इस दीक्षा का विशेष महत्त्व है। मनोवांछित कार्य सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा उपयुक्त है। इस दीक्षा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।

भुवनेश्वरी दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
भूवन अर्थात इस संसार की स्वामिनी भुवनेश्वरी, जो ‘ह्रीं’ बीज मंत्र धारिणी हैं, वे भुवनेश्वरी ब्रह्मा की भी आधिष्ठात्री देवी हैं। महाविद्याओं में प्रमुख भुवनेश्वरी ज्ञान और शक्ति दोनों की समन्वित देवी मानी जाती हैं। जो भुवनेश्वरी सिद्धि प्राप्त करता है, उस साधक का आज्ञा चक्र जाग्रत होकर ज्ञान-शक्ति, चेतना-शक्ति, स्मरण-शक्ति अत्यन्त विकसित हो जाती है। भुवनेश्वरी को जगतधात्री अर्थात जगत-सुख प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। दरिद्रता नाश, कुबेर सिद्धि, रतिप्रीती प्राप्ति के लिए भुवनेश्वरी साधना उत्तम मानी है है। इस महाविद्या की आराधना एवं दीक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति की वाणी में सरस्वती का वास होता है। इस महाविद्या की दीक्षा प्राप्त कर भुवनेश्वरी साधना संपन्न करने से साधक को चतुर्वर्ग लाभ प्राप्त होता ही है। यह दीक्षा प्राप्त कर यदि भुवनेश्वरी साधना संपन्न करें तो निश्चित ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।

छिन्नमस्ता महाविद्या दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
भगवती छिन्नमस्ता के कटे सर को देखकर यद्यपि मन में भय का संचार अवश्य होता है, परन्तु यह अत्यन्त उच्चकोटि की महाविद्या दीक्षा है। यदि शत्रु हावी हो, बने हुए कार्य बिगड़ जाते हों, या किसी प्रकार का आपके ऊपर कोई तंत्र प्रयोग हो, तो यह दीक्षा अत्यन्त प्रभावी है। इस दीक्षा द्वारा कारोबार में सुदृढ़ता प्राप्त होती है, आर्थिक अभाव समाप्त हो जाते हैं, साथ ही व्यक्ति के शरीर का कायाकल्प भी होना प्रारम्भ हो जाता है। इस साधना द्वारा उच्चकोटि की साधनाओं का मार्ग प्रशस्त हो जाता है, तथा उसे मौसम अथवा सर्दी का भी विशेष प्रभाव नहीं पङता है।

त्रिपुर भैरवी दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹
भूत-प्रेत एवं इतर योनियों द्वारा बाधा आने पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। ग्रामीण अंचलों में तथा पिछडे क्षेत्रों के साथ ही सभ्य समाज में भी इस प्रकार के कई हादसे सामने आते है, जब की पूरा का पूरा घर ही इन बाधाओं के कारण बर्बादी के कगार पर आकर खडा हो गया हो। त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहां प्रेत बाधा से मुक्ति प्राप्त होती है, वही शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखारने लगता है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक में आत्म शक्ति त्वरित रूप से जाग्रत होने लगती है, और बड़ी से बड़ी परिस्थियोंतियों में भी साधक आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है, असाध्य और दुष्कर से दुष्कर कार्यों को भी पूर्ण कर लेता है। दीक्षा प्राप्त होने पर साधक किसी भी स्थान पर निश्चिंत, निर्भय आ जा सकता है, ये इतर योनियां स्वयं ही ऐसे साधकों से भय रखती है।

धूमावती दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹
धूमावती दीक्षा प्राप्त होने से साधक का शरीर मजबूत व् सुदृढ़ हो जाता है। आए दिन और नित्य प्रति ही यदि कोई रोग लगा रहता हो, या शारीरिक अस्वस्थता निरंतर बनी ही रहती हो, तो वह भी दूर होने लग जाती है। उसकी आखों में प्रबल तेज व्याप्त हो जाता है, जिससे शत्रु अपने आप में ही भयभीत रहते हैं। इस दीक्षा के प्रभाव से यदि कीसी प्रकार की तंत्र बाधा या प्रेत बाधा आदि हो, तो वह भी क्षीण हो जाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद मन में अदभुद साहस का संचार हो जाता है, और फिर किसी भी स्थिति में व्यक्ति भयभीत नहीं होता है। तंत्र की कई उच्चाटन क्रियाओं का रहस्य इस दीक्षा के बाद ही साधक के समक्ष खुलता है।

बगलामुखी दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
यह दीक्षा अत्यन्त तेजस्वी, प्रभावकारी है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक निडर एवं निर्भीक हो जाता है। प्रबल से प्रबल शत्रु को निस्तेज करने एवं सर्व कष्ट बाधा निवारण के लिए इससे अधिक उपयुक्त कोई दीक्षा नहीं है। इसके प्रभाव से रूका धन पुनः प्राप्त हो जाता है। भगवती वल्गा अपने साधकों को एक सुरक्षा चक्र प्रदान करती हैं, जो साधक को आजीवन हर खतरे से बचाता रहता है।

मातंगी दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
आज के इस मशीनी युग में जीवन यंत्रवत, ठूंठ और नीरस बनकर रह गया है। जीवन में सरसता, आनंद, भोग-विलास, प्रेम, सुयोग्य पति-पत्नी प्राप्ति के लिए मातंगी दीक्षा अत्यन्त उपयुक्त मानी जाती है। इसके अलावा साधक में वाक् सिद्धि के गुण भी जाते हैं। उसमे आशीर्वाद व् श्राप देने की शक्ति आ जाती है। उसकी वाणी में माधुर्य और सम्मोहन व्याप्त हो जाता है और जब वह बोलता है, तो सुनने वाले उसकी बातों से मुग्ध हो जाते है। इससे शारीरिक सौन्दर्य एवं कान्ति में वृद्धि होती है, रूप यौवन में निखार आता है। इस दीक्षा के माध्यम से ह्रदय में जिस आनन्द रस का संचार होता है, उसके फलतः हजार कठिनाई और तनाव रहते हुए भी व्यक्ति प्रसन्न एवं आनन्द से ओत-प्रोत बना रहता है।

कमला दीक्षा
🔸🔹🔸🔹🔸
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार प्रकार के पुरुषार्थों को प्राप्त करना ही सांसारिक प्राप्ति का ध्येय होता है और इसमे से भी लोग अर्थ को अत्यधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। इसका कारण यह है की भगवती कमला अर्थ की आधिष्ठात्री देवी है। उनकी आकर्षण शक्ति में जो मात्रु शक्ति का गुण विद्यमान है, उस सहज स्वाभाविक प्रेम के पाश से वे अपने पुत्रों को बांध ही लेती हैं। जो भौतिक सुख के इच्छुक होते हैं, उनके लिए कमला सर्वश्रेष्ठ साधना है। यह दीक्षा सर्व शक्ति प्रदायक है, क्योंकि कीर्ति, मति, द्युति, पुष्टि, बल, मेधा, श्रद्धा, आरोग्य, विजय आदि दैवीय शक्तियां कमला महाविद्या के अभिन्न देवियाँ हैं।

प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है, साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर या गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक दीक्षा के महत्त्व का एक प्रतिशत भी वर्णन स्थानाभाव के कारण यहां नहीं हुआ है, वस्तुतः मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एक-एक करके सभी साधनों में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है।

यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू नहीं है, कोई मदारी का खेल नहीं है, कि बटन दबाया और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया।

दीक्षा तो एक संस्कार है, जिसके माध्यम से कुस्नास्कारों का क्षय होता है, अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है, ज्ञान शक्ति व् सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व् प्रसन्नता आ पाती है। दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है … और जब उसके चित्त में शुद्धता आ जाती है, उसके बाद ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अन्दर सिद्धियों का दर्शन कर आश्चर्य चकित रह जाता है।

जब कोई श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसनता होती है, कि मैंने बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते है, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ महाविद्या दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी इर्ष्या करते हैं।

ब्राह्मण विरोधी गतिविधियों को जानिए



‘ब्राह्मण’
आज के समय में एक ऐसा विषय हैं जिनका वर्णन धरती के सबसे खतरनाक खलनायकों में से किया जाता है. ऐसे दौर में जब पैसा ‘सुप्रीम गॉड’ बन चुका है और इज्जत सम्मान सिर्फ उसी व्यक्ति को मिलता है जिसके पास पैसा होता है. उस दौर में भी अगर कुछ लोग कपोल कल्पित इतिहास पर छाती पीटते हों और खुद को शोषित पिछड़ा मानकर खुद की बेहतरी के लिए कुछ करने के बजाय किसी दूसरे को गिराने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हों तो ऐसे में इसका पता लगाना बेहद आवश्यक हो जाता है कि, उन्हें भटकाया किसने है और इसके पीछे उनकी मंशा क्या है.
अगर एक झूठ सौ बार बोला जाय तो वह सत्य सिद्ध हो जाता है
प्रोपोगंडा में बहुत ताकत होती है, यह किसी के भी सोच विचार बदलने का एक ताकतवर हथियार है. लगभग 150 वर्ष पूर्व ब्राह्मणों के विरुद्ध ग्लोबल माफियाओं द्वारा शुरू किया गया प्रोपोगंडा वर्तमान में एक मिशन सा बन चुका है. राजनीतिक पार्टियाँ के नेता व उनके समर्थक हों या फिर अमेरिका यूरोप में बैठे माफियाओं के चंदे पर पलने वाले एनजीओ या फिर भारत के कुंठाग्रस्त बुद्धिजीवियों से प्रभावित युवा लगभग हर तरफ से ब्राह्मणों के खिलाफ ऐसा भड़काऊ माहौल तैयार किया जा रहा है जैसे दोनों वर्ल्ड वॉर उन्हीं की वजह से हुए थे और हिटलर,स्टालिन माओ, ब्रिटेन, अमेरिका ने दुनिया भर में जितने कत्लेआम किये सब ब्राह्मणों की वजह से ही किये थे. प्रोपोगंडा में बहुत ताकत होती है, यह किसी के भी सोच विचार बदलने का एक ताकतवर हथियार है.
एंटी ब्राह्मण माहौल बनाने के लिए तथाकथित दलित पिछड़े एवं नेताओं पत्रकारों का ब्राह्मण विरोध तो मात्र एक मुखौटा भर है, ब्राह्मण विरोध के पीछे के मास्टरमाइंड कहीं और ही बैठे हैं. हर किसी को यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिए, ये युग पैसे का है जिसके पास जितना पैसा है उसकी आवाज उतनी ही तेजी से सुनी जाती है. ऐसा ही कुछ एंटी ब्राह्मण माहौल बना रहे लोगों के साथ है जिन्हें भारत को तोड़ने का सपना देखने वाली ताकतें अकूत धन उपलब्ध करवाया करती हैं. यह समझने की आवश्यकता है, आखिर ब्राह्मणों ने ऐसी कौन सी गलतियाँ की थीं जिनके चलते आज उनके अस्तित्व को मिटाने की बातें हो रही हैं.

ब्राह्मण और मानव जगत दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे रहे हैं. ब्राह्मण शब्द का मानव जाति से वही संबंध है जो जल का प्रकृति से अर्थात एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती. ऐसा नहीं है कि, प्रकृति में सिर्फ जल ही सर्वश्रेष्ठ है या मानवों में सिर्फ ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ हैं. ना कोई नीचा है और ना कोई ऊंचा बल्कि सभी का अपना अपना महत्त्व है.
प्राणी जीवन के दो द्वार हैं एक जीवन और एक मृत्यु, एक आदर्श सभ्यता वही है जो इसके बीच के मार्ग को सरल कर दे

ऋषियों और ब्राह्मणों द्वारा निर्मित भारतीय सभ्यता धरती की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता थी और भारतीयों द्वारा बनाई व्यवस्था धरती की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था. इसमें कोई राकेट साइंस नहीं था बल्कि इसे समझना उतना ही सरल है जितनी सरल हमारी ये सभ्यता थी. इस व्यवस्था में मनुष्य का जीवन कितनी आसानी से गुजर जाय इसपर जोर दिया जाता था. आज की कथित प्रगतिशील व्यवस्था में प्राणी जगत का क्या हाल है ये हर कोई जानता है. लोगों को अपने जीवन से घुटन सी होने लगी है, अपनी मूलभूत जरूरत की चीजें पाने के लिए लोग क्या क्या नहीं कर रहे. तथाकथित प्रगतिशील लोगों द्वारा धरती का कबाड़ा हो चुका है और अब मंगल ग्रह पर रहने के लिए प्लाट तलाशे जा रहे हैं.

इस दानवी व्यवस्था को बिचौलियों की व्यवस्था कहा जाय तो गलत नहीं होगा. आज हर एक कदम पर बिचौलिए हैं जिनसे पार पाए बिना जीना मुश्किल है. तथाकथित प्रगतिशीलत बनने और विज्ञान द्वारा चीजें आसान बनाने के नाम पर मानव जीवन को और भी जटिल बना दिया गया है. खाने पानी से लेकर हवा और जमीन तक हर चीज पर बिचौलियों का कब्जा है. इंसान को कुछ भी प्राप्त करने के लिए पहले कहीं से कागज के टुकड़े जुटाने पड़ते हैं तभी वह कुछ प्राप्त कर सकता है. धरती पर राज करने का सपना देखने वाले कुछ ग्लोबल माफियाओं ने धरती पर ऐसा सिस्टम थोपा जिससे पूरा मानव जगत उनका गुलाम हो गया. समस्या यह नहीं है कि मानव जगत गुलाम है, समस्या यह है कि, इसका उन्हें आभास तक नहीं है. अब अगर इस दानवी व्यवस्था की राह में टाँगे अड़ाने वाला कोई बचा है तो वह है भारत का ब्राह्मण समुदाय. जो पिछले हजारों वर्षों से दानवों और उनकी व्यवस्था के खिलाफ ना ही मात्र लड़ता रहा है बल्कि लोगों को भी शिक्षित कर उनके खिलाफ खड़ा करता रहा है. इसीलिये आवश्यक है कि, पहले इन्हें खत्म किया जाय.

ब्राह्मण हजारों वर्षों से अध्यापक समुदाय (Teacher Community) रहा है, जिसका कार्य हमेशा से ही मानव समाज को सुशिक्षित करना, जागृत करना और उन्हें बेहतर बनाना रहा है वो भी बिना किसी से एक रुपया फीस मांगे. मानव मूल्य क्या होते हैं, धरती पर हर एक प्राणी की कीमत क्या है ये ज्ञान ब्राह्मणों ने भारतीय समाज को दिया था. आज के समय में लोग अपने बच्चों को हजारों लाखों की फीस देकर पढ़ाते हैं फिर वही बच्चे अपने माँ बाप को लात मार देते हैं. सामाजिक जीवन जीने वाले भारतीयों को एकाकी सभ्यता में जीना सिखाया जा रहा है. भारतीयों ने जो आपसी विश्वास पर आधारित समाज और व्यवस्थाएं बनाई थीं आजकल वह आई कार्ड में सिमट के रह गयी है. ऐसा पहले पश्चिम में था अब वही कुसंस्कृति भारत में स्थापित हो गयी है. हैरानी होती है जानकर इसे मानव सभ्यता आजकल प्रगतिशील होना कहती है.

जब दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग कबीलाई जीवन जीते थे और उनके जीवन का एक ही ध्येय पेट भरना और बच्चे पैदा करना था. तब ब्राह्मणों के नेर्तित्त्व में भारतीयों ने एक उच्चकोटि की सभ्यता विकसित कर ली थी. ना ही मात्र दुनिया की सबसे पहली पुस्तक ऋग्वेद भारत में लिखी गयी थी बल्कि सुश्रुत संहिता, चरक संहिता और पतंजलि योग सूत्र जैसी उच्च कोटि की पुस्तकें भारत में हजारों वर्षों पहले लिखी जा चुकी थीं. ब्राह्मणों का सृष्टि की शुरुआत से ही एक ही मिशन रहा था धरती को कैसे सभ्य समाज के रहने लायक एवं बेहतर से बेहतर बनाया जा सके. यही कारण था की उन्होंने सामाजिक जीवन में संतुलन बनाये रखने के लिए समाज में कई नियमों का निर्माण किया और उनका पालन समाज किस तरह करे इसके उपाय भी किये थे.

ब्राह्मणों को मिटाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में जो शैतानी सिस्टम दुनिया पर थोपा गया है और हर चीज बिकाऊ बना दी गयी है. ये सब ब्राह्मणिक ढाँचे में फिट नहीं बैठती हैं. ब्राह्मण ऐसी व्यवस्था के हमेशा से विरोधी रहे थे. चाहे वह छात्रों से पैसे वसूल कर उन्हें शिक्षा देना हो. बेड पर लेटे बीमार व्यक्ति से पैसे वसूलना हो. दूध दही अनाज और यहाँ तक कि, जल, मिटटी और हवा भी बेंचने का धंधा चल पड़ा है. न्याय व्यवस्था जैसी चीज को भी बिकाऊ बना दिया गया है. बिना पैसे और किसी बिचौलिए के न्याय तो दूर लोगों की सुनवाई भी नहीं हो सकती. मानव जीवन से जुड़ा हर एक पहलू आज पैसे पर जाकर अटकता है. आज इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि, इंसान पैसे कमाने के लिए पैदा होता है या अन्य प्राणियों की तरह जीने के लिए.

ग्लोबल माफियाओं ने हर देश में सेंट्रल बैंक बनाकर धरती को अपनी करेंसी और मुद्रा प्रणाली द्वारा कंट्रोल कर लिया है. 20वीं सदी में उन्होंने हर देश से राजतंत्र जैसी प्राकृतिक व्यवस्था हटाने की शुरुआत की थी और सभी देशों पर जबरन शैतानी लोकतंत्र थोप दिया ताकि बिचौलियों के माध्यम से वो दुनिया पर शासन कर सकें. जो तानशाही से भी खतरनाक शासन प्रणाली है. तानाशाही और लोकतंत्र में सिर्फ इतना फर्क है कि, तानाशाही प्रत्यक्ष होती है और लोकतंत्र में तानाशाही चुनाव जीतने के बाद होती है. तानाशाही में जनता को कम से कम आभास होता है कि, वह तानाशाही झेल रही है लेकिन लोकतंत्र में उसे तमाम प्रोपोगंडाओं के माध्यम से उसे विश्वास दिलाया जाता है कि, वह एक बेहतर सिस्टम में जी रहे हैं जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं. ब्राह्मणों ने धरती के लिए जो सिस्टम बनाया था उनमें इन सब शोषणकारी चीजें कहीं नहीं थीं. चूँकि ब्राह्मणों की सलाह और देखरेख में ही भारत शासित होता था इसलिए आवश्यक है कि, उन्हें इतना बदनाम कर दिया जाय जिससे उन्हें शासन से दूर रखने में कोई समस्या ना आये.
राजकाज को लेकर एक पुरानी कहावत है जिसके अनुसार, अगर किसी राष्ट्र की राजव्यवस्था के बारे में जानना है तो आप वहां के राजा को नहीं बल्कि उस राजा के सलाहकारों को देखो
ब्राह्मणिक सामाजिक व्यवस्था में ठगों लुटेरों की कोई जगह नहीं ।

पश्चिम के सामाजिक जीवन में सिर्फ मनुष्यों की गिनती होती है किसी अन्य की नहीं जबकि भारत का सामजिक ढांचा मात्र मानव जीवन तक ही नहीं सीमित था बल्कि उसमें प्रकृति, पेड़ पशु पक्षी एवं पूरा ब्रह्मांड आता था जिनके संरक्षण और सम्मान की बातें वेदों में भी लिखी हैं. ब्राह्मणों ने हर उस चीज के संरक्षण पर बल दिया जो कि, प्राकृतिक संतुलन और मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक थे.

पश्चिमी जगत हमेशा से ही ठग और लुटेरा समुदाय रहा है उन्हें जहाँ मौका मिला वहां उन्होंने लोगों को ठगा. रूस के लोग आज भी ब्रिटेन को ठग लुटेरा और अंग्रेजी भाषा को चोर लुटेरों की भाषा बोलते हैं. आज की समाज व्यवस्था कुछ ऐसी है लोग चाहे जितना बड़ा अपराध कर लें वह कभी सुधर नही सकते क्योंकि ये समाज व्यवस्था कुकर्मियों को सजा नहीं देती बल्कि उनका संरक्षण करती है. आजकल अपराधी युवाओं के आदर्श होते हैं. चोरों लुटेरों और हत्यारों के भी गुरु होने लगे हैं. जबकि भारतीय समाज व्यवस्था कुछ ऐसी थी जहाँ अपराध तो दूर लोग इसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे. यदि कोई सामाजिक नियम तोड़ता भी था तो उसे समाज ऐसा बहिष्कृत करता था जो ना जीने लायक होता था ना मरने लायक.

आज ये देखना बेहद आश्चर्यजनक है, प्रकृति का दोहन करने वाले, धरती की हर एक चीज को अपने उपभोग की वस्तु मानने वाले, मानव समाज को नस्लों में बांटने वाले, मनुष्यों को इस धर्म उस धर्म में विभाजित करने वाले, धरती पर बॉर्डर की रेखाएं खींचने वाले, वीजा पासपोर्ट जैसा वाहियात सिस्टम लगाकर मानव समाज को एक राष्ट्रीयता में समेट देने वाले, न्याय व्यवस्था के नाम पर बिचौलियों की व्यवस्था लादने वाले लोग अरबों रूपये की फंडिंग करके उन ब्राह्मणों के विरुद्ध मिशन चलवा रहे हैं जिन्होंने मानव सभ्यता को आदर्श तरीके से जीना सिखाया था.
एक पुरानी रणनीति रही है, आप अगर अपने विरोधी की बराबरी ना कर सको तो उसे बदनाम कर दो. इस तरह से ना ही मात्र आप उससे ऊपर आ जाओगे बल्कि अगले की विश्वसनीयता भी खत्म हो जायेगी.

जब भी अन्याय और अधर्म बढ़ा है ब्राह्मण ना ही मात्र पूरे समाज को लेकर हमेशा उसके खिलाफ खड़े हुए हैं बल्कि उन्होंने समय समय पर उसका सफाया भी किया है. इसलिए भविष्य में ऐसा फिर कभी ना होने पाए इसके लिए आवश्यक था कि, उनका सफाया कर दिया जाय. भारत ने कभी किसी सभ्यता पर हमला नहीं किया लेकिन दुनिया के हर एक कोने से आक्रमणकारी भारत पर हमला करते रहे लेकिन वो कभी भी इस सभ्यता को मिटा नहीं पाए. ग्लोबल माफियाओं के मजदूर ब्रिटिश जब भारत आये तब उन्होंने अनुभव किया कि, भारतीयों से युद्ध में पार पाना संभव नहीं है इसलिए उन्होंने छल प्रपंच और भारतीयों को बांटने की नीति अपनाई जिससे वे लंबे समय तो इस महान राष्ट्र को लूट सकें. उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था, शासन व्यवस्था, समाज व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था को कंट्रोल करके भारत को छिन्न-भिन्न कर दिया जिससे भारतीय अपनी जड़ों से कट जाएँ.

पश्चिमी लुटेरों के इतने जतन के बावजूद भी भारत पर उनका कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा. क्योंकि भारत में ब्राह्मण थे जो बेहद ही मोटी चमड़ी के होते हैं और थोड़े समय बाद पुनः भारतीयों को भारतीय ढाँचे में ढालने की कला में वो हजारों वर्षों से पारंगत रहे हैं. यही कारण था, इस बार ऐसा मिशन चलाया गया जिससे भारतीयों से ही ब्राह्मणों का खात्मा करवाया जा सके. ग्लोबल माफियाओं की इस व्यवस्था को अगर किसी से सबसे ज्यादा खतरा है तो ब्राह्मणों से इसलिए उन्होंने एक सोची-समझी साजिश के तहत ब्राह्मणों के विरुद्ध प्रोपोगेन्डा करना शुरू कर दिया. उन्होंने उन्हीं लोगों को ब्राह्मणों के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया जो भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख अंग थे.
युद्ध की यह एक पुरानी रणनीति रही है, किसी किले को बाहरी दुश्मन उतनी आसानी से नहीं ढहा पाते जितनी जल्दी उसे किले के अंदर वाले ढहा डालते हैं, इसी रणनीति के तहत भारतीय समाज में ही विभाजन की रेखाएं खींच दी गयीं.
प्रत्यक्ष युद्ध में ना जीत पाए इसलिए भारतीय समाज में फूट डालकर भारत को जीतने की साजिश

ब्रिटिशों के आने से पहले भारत में कभी कोई जाति प्रथा नहीं थी और ना ही जाति प्रथा जैसी किसी चीज का जिक्र हमारे किसी प्राचीन ग्रंथ या एतिहासिक पुस्तकों में मिलता है. यहाँ तक कि, भारत और भारतीय संस्कृति पर लिखने वाले फाह्यान, ह्वेनसांग, अलबरूनी, मेगास्थनीज और टॉलमी जैसे विदेशी इतिहासकारों ने भारत में जाति व्यवस्था जैसी चीज का कोई जिक्र किया है. ब्राह्मणों द्वारा किसी का शोषण तो दूर की बात भारत में सामुदायिक नफरत का कभी कोई इतिहास नहीं रहा. भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अध्ययन करने आये सभी विदेशी यात्रियों ने एक भी ऐसा कोई तथ्य नहीं दिया जो यह प्रमाणित कर सके कि, भारतीय समाज में किसी प्रकार की कोई असमानता थी..

भारतीय समाज में जातियां नहीं ज्ञातियाँ थीं. ज्ञातियाँ अर्थात जिन्हें जिस क्षेत्र का ज्ञान हो : शिक्षक, पुरोहित, योद्धा, व्यापारी, किसान, ग्वाल, लोहार, कुम्हार, सुनार, चर्मकार, नाई इसी तरह भारत में कई सारी ज्ञातियाँ थीं. जो जिस क्षेत्र के ज्ञाता थे वे अपनी ज्ञातियों के अनुसार विभाजित थे, कोई भी व्यक्ति भारत में जाति के हिसाब से नहीं बल्कि ज्ञाति के हिसाब से जाना जाता था. जाति शब्द वास्तव में ज्ञाति का ही अपभ्रंश है जिसे जानबूझकर ग्लोबल माफियाओं ने अपने भाड़े के विद्वानों से स्थापित करवाया.

ब्राह्मण वर्ग में शिक्षक ज्ञाति के साथ ही पुरोहित भी हुआ करते थे अर्थात पर+हित, अर्थात ऐसे लोग जिनका कार्य ही दूसरों के हित के लिए सोचना था. मानवों के हित के लिए, समाज के हित के लिए, प्रकृति के हित के लिए, यहाँ तक कि पशु पक्षियों के हित से लेकर नदी तालाबों और पेड़ पालवों का का भी हित. आज जिस बराबरी (Equality) और शोषक व्यवस्था का ढोल पीटा जाता है अगर किसी ने सभी के हित का ध्यान रखते हुए समाज के लिए आदर्श व्यवस्था का निर्माण किया था तो वो भारतीय समाज का ब्राह्मण वर्ग था. जिन्होंने हर किसी का काम बाँट दिया था. लोग सिर्फ वही करते थे जो वो सबसे अच्छी तरह से कर पाते थे.

हर एक मनुष्य की छमता को देखते हुए ऐसी ही व्यवस्था के लिये हमारे पूर्वजों ने 4 वर्ण बनाये थे. ये सामाजिक नियम ब्राह्मणों ने नहीं बल्कि मानव समाज ने बनाये थे, ब्राह्मण भी इस व्यवस्था का हिस्सा थे जो समाज द्वारा खड़े किये गये थे. उनका पोषण भी समाज ही करता था. सोचने विचारने और निर्णय लेने के अन्य की अपेक्षा ब्राह्मण वर्ग ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकता था इसलिए उन्हें समाज ने इस जिम्मेदारी के लिए चुना था.

M.A. Sherring (Matthew Atmore Sherring 1826–1880) नामक एक ईसाई पादरी का इस कार्य में महत्त्वपूर्ण रोल रहा था. उसने भारतीय समाज को जातियों अर्थात कास्ट में बांटने के लिए एक किताब लिखी थी Hindu Tribes and Castes इसके जरिये ग्लोबल माफियाओं ने ईसाई मिशनरियों के साथ मिलकर भारतीय समाज को कई धड़ों में बांटने की स्क्रिप्ट तैयार करवाई थी जो कि अब जाकर परवान चढ़ रही है. मैक्समूलर भी ऐसा ही भाड़े पर हायर किया गया इंडोलोजिस्ट था जिसने बाद में यह स्वीकार भी किया कि, उसे ब्रिटिश एम्पायर द्वारा भारतीय धर्म ग्रंथो को विकृत करने के लिए हायर नौकरी पर रखा गया था.

मनुस्मृति जैसे महान ग्रंथ को भी ब्रिटिश काल में ही दूषित किया गया. इसके पहले इतिहास में कभी मनुस्मृति को लेकर कोई शिकायत नहीं मिलती. 18,1900 से पहले के साहित्यों में मनुस्मृति के खिलाफ एक भी शब्द कहीं देखने को नहीं मिलेगा. बल्कि मनुस्मृति की महिमा का बखान कई देशों के विद्वानों ने किया है. चूँकि मनुस्मृति ही वह विधान था जिससे भारतीय समाज चलता था इसलिए भारत के दुश्मनों ने सबसे ज्यादा इस ग्रंथ को ही बदनाम किया. जितने भी तथाकथित भारतीय समाज सुधारकों ने मनुस्मृति की निंदा की या उन्हें जलाया वास्तव में उन्हें मनुस्मृति का लेश मात्र भी ज्ञान ना था. उन्होंने मनुस्मृति की जगह यूरोपियनों की प्रोपोगंडा स्मृति पढी थी.

ईसाईयों में उनके जन्म के समय से ही एक हवस रही है, पूरी दुनिया को ईसाईयत में बदलने की. इसमें उन्हें एक अलग ही चरमसुख की प्राप्ति होती है. मिशनरियों ने पहले यूरोप में पागन धर्म को मानने वाले यूरोपियनों को ईसाईयत में धर्मांतरित किया फिर यही मिशन उनका उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया और एशिया में चला. लगभग हर जगह उन्हें मनचाही सफलता मिली और उन्होंने सफलतापूर्वक देश के देश ईसाई बना डाले. लेकिन भारत में वे ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि यहाँ उनका मुकाबला ब्राह्मणों से था

ईसाई मिशनरियां और यूरोपीय लुटेरे एक बेहद संगठित गिरोह की तरह काम करते रहे हैं. जहाँ-जहाँ यूरोपीय लुटेरे लूटमार करने के लिए जाते थे वहां पीछे-पीछे ईसाई मिशनरियां अपनी दूकान लेकर पहुंच जाती थीं. लुटेपिटे परेशान लोग दुनिया के लिए समस्या हैं लेकिन वे ईसाई मिशनरियों के लिए एक मौका होते हैं. विपदाग्रस्त स्थलों में मिशनरियों की दुकान सबसे अच्छी चलती है.
दुनिया के किसी भी कोने में (गैर ईसाई) जब कोई आपदा आती है तो वहां राहत बाद में पहुंचती हैं, अपनी दुकानें लेकर ईसाई मिशनरियाँ वहां पहले पहुंचती हैं.

भारत में ईसाई मिशनरियों को अपनी असफलता का कारण उसी समय पता चल गया था जब पुर्तगाली शैतान जेवियर्स (वही सेंट जेवियर जिसके नाम पर भारत में हजारों स्कूल कालेज हैं) गोवा में धर्मांतरण और लूटमार के लिए पहुंचा था. ब्राह्मण हमेशा से ही ईसाई मिशनरियों की राह में बड़ा रोड़ा रहे हैं. ब्रिटिशों ने भारत में जानबूझकर कई बार अकाल को जन्म दिया. जिसमें करोड़ों भारतीय मारे गये. सिर्फ बंगाल क्षेत्र में ही 1 करोड़ के लगभग भारतीयों का अकाल में सफाया हो गया. इस तबाही में ईसाई मिशनरियों ने गिद्धों की तरह हर मौके को लपकने की कोशिश की और भूखे लोगों को अनाज देने के नाम पर जमकर धर्मान्तरित किया. लेकिन फिर भी ईसाई मिशनरियों को वो सफलता कभी नहीं मिल पाई जिसकी उन्हें अपेक्षा थी.

धर्मांतरण के लिए भारत आयीं ईसाई मिशनरियों ने वेटिकन को कई पत्र लिखे थे जिसमें उन्होंने भारत में ईसाईयत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ब्राह्मणों को बताया था. ईसाई मिशनरियों के अनुसार, ब्राह्मणों की सामाजिक व्यवस्था के चलते हिन्दुओं को ईसाईयत में ढाल पाना असंभव है.

ईसाई मिशनरियों से ऐसे इनपुट मिलने के बाद वेटिकन और Jesuit जैसे ईसाई संगठनों ने रणनीति तैयार की है कि, सबसे पहले ब्राह्मणों को बदनाम कर भारतीय समाज से उनकी उपयोगिता समाप्त की जाय. इसके पश्चात ही उनका ईसाईयत मिशन भारत में सफल हो पायेगा. वर्तमान में भारत में चल रहे ब्राह्मण विरोध का कारण ईसाईयत मिशन ही है. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि, भारतीय व्यवस्थाओं को सिरे से नकारने और यूरोपीय व्यवस्थाओं को अपनाने में भारत का वह तबका बहुत आगे है जिसने यूरोपीय माध्यम से अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा पायी है.
भारत का अंग्रेजी मीडिया भारत और भारतीय सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ ही ब्राह्मणों का कट्टर विरोधी है तो उसका यही कारण है.

आज यह एक रिसर्च का विषय है कि, ईसाई मिशनरियों में गैर ईसाईयों को ईसाईयत में ढालने की इतनी हवस क्यों है ? आखिर कौन सा आनंद मिलता है उन्हें ? आज जब हर वर्ग अपनी बेहतरी के लिए पसीना बहाने में व्यस्त है ऐसे में बर्बर ईसाई मिशनरियाँ आज भी धर्म परिवर्तन जैसी मध्ययुगीन सोच अपनाये हुए हैं. दुनिया बदल गयी लेकिन ईसाई मिशनरियां आज भी अपनी सोच बदलने को नहीं तैयार...!!

एक तथ्य जो आप जानकर भी नहीं जानते हैं....

राम नाम का मोल,,,,,,,,

आज ऐसी कथा लेकर आया हूं जिसे आपने सुना भी होगा, तो फिर से क्यों सुनें! आपने अभी तक कथा बस सुनी है लेकिन आज इसे समझेंगे कि कैसे यह कथा हमारी आपकी ही है, फिर शायद आप इसे दस बार और पढ़ें।

एक पहुंचे हुए महात्माजी थे। उनके पास एक शिष्य भी रहता था।एक बार महात्माजी कहीं गए हुए थे उस दौरान एक व्यक्ति आश्रम में आया। आगंतुक ने कहा- मेरा बेटा बहुत बीमार है। इसे ठीक करने का उपाय पूछने आया हूं।

शिष्य ने बताया कि महात्माजी तो नहीं हैं, आप कल आइए। आगंतुक बहुत दूर से और बड़ी आस लेकर आया था। उसने शिष्य से ही कहा- आप भी तो महात्माजी के शिष्य हैं। आप ही कोई उपाय बता दें बड़ी कृपा होगी। मुझे निराश न करें, दूर से आया हूं।

उसकी परेशानी देखकर शिष्य ने कहा- सरल उपाय है, किसी पवित्र चीज पर राम नाम तीन बार लिख लो, फिर उसे धोकर अपने पुत्र को पिला दो,ठीक हो जाएगा।

दूसरे दिन वह व्यक्ति फिर आया, उसके शिष्य के बताए अनुसार कार्य किया था तो उसके पुत्र को आऱाम हो गया था। वह आभार व्यक्त करने आया था।

महात्माजी कुटिया पर मौजूद थे। आगंतुक ने महात्माजी के दर्शन किए और सारी बात कही- बड़े आश्चर्य की बात है, मेरे बेटा ऐसे उठ बैठा जैसे कोई रोग ही न रहा हो।

यह सब जानकर महात्माजी शिष्य से नाराज हुए,वह बोले- साधारण सी पीड़ा के लिए तूने राम नाम का तीन बार प्रयोग कराया,तुम्हें राम नाम की महिमा ही नहीं पता, इसके एक उच्चारण से ही अनंत पाप कट जाते हैं, तुम इस आश्रम में रहने योग्य नहीं हो,जहां इच्छा है वहां चले जाओ।

शिष्य ने उनके पैर पकड़ लिए, माफी मांगने लगा। महात्माजी ने क्षमा भी कर दिया पर उन्होंने सोचा कि शिष्य को यह समझाना भी जरूरी है आखिर उसने गलती क्या की।

महात्माजी ने एक चमकता पत्थर शिष्य को दिया और बोले- शहर जाकर इसकी कीमत करा लाओ,ध्यान रहे बेचना नहीं है,बस लिखते जाना कि किसने कितनी कीमत लगाई।

यहां रूकना नहीं है, कथा पढ़ते रहिए, यह तो भूमिका है, असली बात तो अभी आऩी बाकी है।

शिष्य पत्थर लेकर चला, उसे सबसे पहले सब्जी बेचने वाली मिली,पत्थर की चमक देखकर उसने सोचा यह सुंदर पत्थर बच्चों के खेलने के काम आ सकता है, उसके बदले वह ढेर सारी मूली और साग देने को तैयार हो गई।

शिष्य आगे बढ़ा तो उसकी भेंट एक बनिए से हुई. उसने पूछा कि इसका क्या मोल लगाओगे, उसने कहा- पत्थर तो सुंदर और चमकीला है, इससे तोलने का काम लिया जा सकता है।

इसलिए मैं तुम्हें एक रूपया दे सकता हूं।

शिष्य आगे चला और सुनार के यहां पहुंचा, सुनार ने कहा- यह तो काम का है,इसे तोड़कर बहुत से पुखराज बन जाएंगे, मैं इसके एक हजार रुपए तक दे सकता हूं।

फिर शिष्य रत्नों का मोल लगाने वाले जौहरी के पास पहुंचा,अभी तक पत्थर की कीमत साग-मूली और एक रुपए लगी थी इसलिए उसकी हिम्मत बड़े दुकान में जाने की नहीं पड़ी थी।

पर हजार की बात से हौसला बढ़ा,जौहरी ठीक से पत्थर को परख नहीं पाया लेकिन उसने अंदाजा लगाया कि यह कोई उच्च कोटि का हीरा है। वह लाख रूपए तक पर राजी हुआ।

शिष्य एक के बाद एक बड़ी दुकानों में पहुंचा। कीमत बढ़ती-बढ़ती करोड़ तक हो गई। वह घबराया कि कहीं उसे अब भी सही कीमत न पता चली हो।हारकर वह राजा के पास चला गया।

राजा ने जौहरियों को बुलाया, सबने कहा ऐसा पत्थर तो कभी देखा ही नहीं,इसकी कीमत आंकना हमारी बुद्धि से परे हैं। इसके लिए तो सारे राज्य की संपत्ति कम पड़ जाए।

महात्माजी की प्रसिद्धि से सब परिचित थे। राजा ने कहा- गुरूजी से कहना कि यदि वह इसे बेचना चाहें तो मैं उन्हें सारा राज्य देने को तैयार हूं। शिष्य ने कहा कि नहीं सिर्फ कीमत पता करनी है।

वह वापस आश्रम पर चला आया और सारी कहानी सुना दी, फिर बोला कि जब राजा पत्थर के बदले अपनी सारी संपत्ति देने को राजी है तो इसे बेच ही देना चाहिए।

गुरुजी ने कहा- अभी तक इसकी कीमत नहीं आंकी जा सकी है।शिष्य ने पूछा- गुरुजी राजा अपना पूरा राज्य देने को राजी है।इससे अधिक इसकी क्या कीमत हो सकती है?

गुरु ने उसे एक लोहा लेकर आने को कहा। वह लोहे के दो चिमटे लेकर आया।गुरु ने चिमटों से पत्थर का स्पर्श कराया तो वे सोने के हो गए। शिष्य की तो जैसे आंखें फटी ही रह गईं।

गुरूजी ने पूछा- तुमने इस पत्थर का चमत्कार देखा,अब बोलो इसकी क्या कीमत होनी चाहिए।शिष्य बोला- संसार में हर चीज की कीमत सोने से लगती है, पर जो स्वयं सोना बनाता हो उसका मोल कैसे लगे!

महात्माजी बोले- यह पारस है,इससे स्पर्श करते ही लोहे जैसी कुरुप और कठोर चीज सोने जैसी लचीली और चमकदार हो जाती है। भगवान के नाम का महिमा भी कुछ ऐसी ही है।

इस पारस के प्रयोग से तो केवल जड़ पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं जो नश्वर हैं, परमात्मा तक तो यभी नहीं पहुंचा सकता। लेकिन राम नाम तो सच्चित आनंद का मार्ग है। इसका मोल पहचानो।

जिस नाम के प्रभाव से इंसान भव सागर पार करता है उस प्रभु को मामूली सी परेशानी में बुला लेना उचित नहीं।राम नाम का प्रयोग सोच-समझ कर करना चाहिए।

इसी तरह है तुम्हारी अपनी कीमत,इंसान को अपनी कीमत का तब तक पता नहीं चलता जब तक उसे सही पहचानने वाला न मिले।

सोचें कितनी बड़ी बात कही महात्माजी ने, आपकी क्या कीमत है उसे सही-सही पहचानने वाला नहीं मिला। जैसे पारस पत्थक साग बेचने वाले के लिए बस कुछ मूली के बराबर मोल का था।

बनिए के लिए एक रूपए और सुनार के लिए हजार रुपए की कीमत वाला जबकि राजा अपना पूरा राज-पाट इसके बदले देने को राजी हो गया।

भगवान का नाम सर्वश्रेष्ठ है और आप यदि भगवान के बताए मार्ग पर चल रहे हैं तो उनके प्रिय भक्त. भगवान के प्रियभक्त का मोल समझ लेना किसी ऐरे गैरे के बस की बात तो है नहीं।

यदि आप सत्य के मार्ग पर हैं और कोई आपकी कद्र नहीं कर रहा तो कमी आपमें नहीं है, कमी तो उसमें है जिसे आपका मोल नहीं पता।वह आपके योग्य नहीं।कोई आपको नहीं पहचान पा रहा तो आप हताश न हों, बल्कि पहले से ज्यादा नेक कार्य आरंभ कर दें।

आप सही मार्ग पर चल रहे हैं, किसी का अहित नहीं करते, किसी से द्वेष नहीं रखते, शत्रुता नहीं रखते तो आप ही ईश्वर के प्रिय अनुचर हैं।स्वयं से प्रेम कीजिए। अपना मोल पहले आप तो समझिए, संसार तो बाद में समझेगा।

आपके लिए आप बहुत अहम है फिर संसार. परंतु ऐसा सोचने का अधिकार केवल उनको ही प्राप्त है जो सचमुच ईश्वर के मार्ग पर हैं. जिनमें सच्चाई, सद्भाव, दया और क्षमाशीलता जैसे गुण हैं. यदि इऩ गुणों से विहीन होकर यह भावना रखेंगे तो सावधान करता हूं, ईश्वर आपको कभी फलते नहीं देख सकते।

आप यदि अवगुणों से भरे किसी व्यक्ति को बहुत फलते-फूलते देख रहे हैं तो निराश न हों. आपको नहीं पता कि अंदर से वह कितना भयभीत कितना खोखला है।वह तो पूर्वजन्म के संचित पुण्यकर्मों के बैंक बैलेस में से दोनों हाथ उड़ा रहा है। जिस दिन वह बैलेंस समाप्त हुआ उसका बुरा हश्र होगा।

बुरी राह पर चलने वाले लोगों की संताने क्यों दुखी रहती हैं. माता-पिता के पूर्वजन्म से संचित कर्मों से बच्चों को अंश मिलता है।अब पापी उस बैंलेस को लुटा रहा है तो बच्चों के लिए बचाएगा ही क्या? इसी कारण उनकी संतानें कष्ट भोगती हैं।

भगवान के नाम का प्रभाव और उसका रहस्य जब तक हम नहीं समझेंगे तब तक किसी भी शिक्षा का कोई मोल नहीं।

आत्मबोध करें, दूसरों के ज्ञान और उपदेश को ग्रहण करें, कहीं ऐसा न हो कि किसी अभिमान में आप ऐसे जौहरी को ठुकरा रहे हों जो आपमें पारस देखता है। आपको कथा कैसी लगी, बताइएगा।

आज का ब्राह्मण



‘ब्राह्मण’
आज के समय में एक ऐसा विषय हैं जिनका वर्णन धरती के सबसे खतरनाक खलनायकों में से किया जाता है. ऐसे दौर में जब पैसा ‘सुप्रीम गॉड’ बन चुका है और इज्जत सम्मान सिर्फ उसी व्यक्ति को मिलता है जिसके पास पैसा होता है. उस दौर में भी अगर कुछ लोग कपोल कल्पित इतिहास पर छाती पीटते हों और खुद को शोषित पिछड़ा मानकर खुद की बेहतरी के लिए कुछ करने के बजाय किसी दूसरे को गिराने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हों तो ऐसे में इसका पता लगाना बेहद आवश्यक हो जाता है कि, उन्हें भटकाया किसने है और इसके पीछे उनकी मंशा क्या है.
अगर एक झूठ सौ बार बोला जाय तो वह सत्य सिद्ध हो जाता है
प्रोपोगंडा में बहुत ताकत होती है, यह किसी के भी सोच विचार बदलने का एक ताकतवर हथियार है. लगभग 150 वर्ष पूर्व ब्राह्मणों के विरुद्ध ग्लोबल माफियाओं द्वारा शुरू किया गया प्रोपोगंडा वर्तमान में एक मिशन सा बन चुका है. राजनीतिक पार्टियाँ के नेता व उनके समर्थक हों या फिर अमेरिका यूरोप में बैठे माफियाओं के चंदे पर पलने वाले एनजीओ या फिर भारत के कुंठाग्रस्त बुद्धिजीवियों से प्रभावित युवा लगभग हर तरफ से ब्राह्मणों के खिलाफ ऐसा भड़काऊ माहौल तैयार किया जा रहा है जैसे दोनों वर्ल्ड वॉर उन्हीं की वजह से हुए थे और हिटलर,स्टालिन माओ, ब्रिटेन, अमेरिका ने दुनिया भर में जितने कत्लेआम किये सब ब्राह्मणों की वजह से ही किये थे. प्रोपोगंडा में बहुत ताकत होती है, यह किसी के भी सोच विचार बदलने का एक ताकतवर हथियार है.
एंटी ब्राह्मण माहौल बनाने के लिए तथाकथित दलित पिछड़े एवं नेताओं पत्रकारों का ब्राह्मण विरोध तो मात्र एक मुखौटा भर है, ब्राह्मण विरोध के पीछे के मास्टरमाइंड कहीं और ही बैठे हैं. हर किसी को यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिए, ये युग पैसे का है जिसके पास जितना पैसा है उसकी आवाज उतनी ही तेजी से सुनी जाती है. ऐसा ही कुछ एंटी ब्राह्मण माहौल बना रहे लोगों के साथ है जिन्हें भारत को तोड़ने का सपना देखने वाली ताकतें अकूत धन उपलब्ध करवाया करती हैं. यह समझने की आवश्यकता है, आखिर ब्राह्मणों ने ऐसी कौन सी गलतियाँ की थीं जिनके चलते आज उनके अस्तित्व को मिटाने की बातें हो रही हैं.

ब्राह्मण और मानव जगत दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे रहे हैं. ब्राह्मण शब्द का मानव जाति से वही संबंध है जो जल का प्रकृति से अर्थात एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती. ऐसा नहीं है कि, प्रकृति में सिर्फ जल ही सर्वश्रेष्ठ है या मानवों में सिर्फ ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ हैं. ना कोई नीचा है और ना कोई ऊंचा बल्कि सभी का अपना अपना महत्त्व है.
प्राणी जीवन के दो द्वार हैं एक जीवन और एक मृत्यु, एक आदर्श सभ्यता वही है जो इसके बीच के मार्ग को सरल कर दे

ऋषियों और ब्राह्मणों द्वारा निर्मित भारतीय सभ्यता धरती की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता थी और भारतीयों द्वारा बनाई व्यवस्था धरती की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था. इसमें कोई राकेट साइंस नहीं था बल्कि इसे समझना उतना ही सरल है जितनी सरल हमारी ये सभ्यता थी. इस व्यवस्था में मनुष्य का जीवन कितनी आसानी से गुजर जाय इसपर जोर दिया जाता था. आज की कथित प्रगतिशील व्यवस्था में प्राणी जगत का क्या हाल है ये हर कोई जानता है. लोगों को अपने जीवन से घुटन सी होने लगी है, अपनी मूलभूत जरूरत की चीजें पाने के लिए लोग क्या क्या नहीं कर रहे. तथाकथित प्रगतिशील लोगों द्वारा धरती का कबाड़ा हो चुका है और अब मंगल ग्रह पर रहने के लिए प्लाट तलाशे जा रहे हैं.

इस दानवी व्यवस्था को बिचौलियों की व्यवस्था कहा जाय तो गलत नहीं होगा. आज हर एक कदम पर बिचौलिए हैं जिनसे पार पाए बिना जीना मुश्किल है. तथाकथित प्रगतिशीलत बनने और विज्ञान द्वारा चीजें आसान बनाने के नाम पर मानव जीवन को और भी जटिल बना दिया गया है. खाने पानी से लेकर हवा और जमीन तक हर चीज पर बिचौलियों का कब्जा है. इंसान को कुछ भी प्राप्त करने के लिए पहले कहीं से कागज के टुकड़े जुटाने पड़ते हैं तभी वह कुछ प्राप्त कर सकता है. धरती पर राज करने का सपना देखने वाले कुछ ग्लोबल माफियाओं ने धरती पर ऐसा सिस्टम थोपा जिससे पूरा मानव जगत उनका गुलाम हो गया. समस्या यह नहीं है कि मानव जगत गुलाम है, समस्या यह है कि, इसका उन्हें आभास तक नहीं है. अब अगर इस दानवी व्यवस्था की राह में टाँगे अड़ाने वाला कोई बचा है तो वह है भारत का ब्राह्मण समुदाय. जो पिछले हजारों वर्षों से दानवों और उनकी व्यवस्था के खिलाफ ना ही मात्र लड़ता रहा है बल्कि लोगों को भी शिक्षित कर उनके खिलाफ खड़ा करता रहा है. इसीलिये आवश्यक है कि, पहले इन्हें खत्म किया जाय.

ब्राह्मण हजारों वर्षों से अध्यापक समुदाय (Teacher Community) रहा है, जिसका कार्य हमेशा से ही मानव समाज को सुशिक्षित करना, जागृत करना और उन्हें बेहतर बनाना रहा है वो भी बिना किसी से एक रुपया फीस मांगे. मानव मूल्य क्या होते हैं, धरती पर हर एक प्राणी की कीमत क्या है ये ज्ञान ब्राह्मणों ने भारतीय समाज को दिया था. आज के समय में लोग अपने बच्चों को हजारों लाखों की फीस देकर पढ़ाते हैं फिर वही बच्चे अपने माँ बाप को लात मार देते हैं. सामाजिक जीवन जीने वाले भारतीयों को एकाकी सभ्यता में जीना सिखाया जा रहा है. भारतीयों ने जो आपसी विश्वास पर आधारित समाज और व्यवस्थाएं बनाई थीं आजकल वह आई कार्ड में सिमट के रह गयी है. ऐसा पहले पश्चिम में था अब वही कुसंस्कृति भारत में स्थापित हो गयी है. हैरानी होती है जानकर इसे मानव सभ्यता आजकल प्रगतिशील होना कहती है.

जब दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग कबीलाई जीवन जीते थे और उनके जीवन का एक ही ध्येय पेट भरना और बच्चे पैदा करना था. तब ब्राह्मणों के नेर्तित्त्व में भारतीयों ने एक उच्चकोटि की सभ्यता विकसित कर ली थी. ना ही मात्र दुनिया की सबसे पहली पुस्तक ऋग्वेद भारत में लिखी गयी थी बल्कि सुश्रुत संहिता, चरक संहिता और पतंजलि योग सूत्र जैसी उच्च कोटि की पुस्तकें भारत में हजारों वर्षों पहले लिखी जा चुकी थीं. ब्राह्मणों का सृष्टि की शुरुआत से ही एक ही मिशन रहा था धरती को कैसे सभ्य समाज के रहने लायक एवं बेहतर से बेहतर बनाया जा सके. यही कारण था की उन्होंने सामाजिक जीवन में संतुलन बनाये रखने के लिए समाज में कई नियमों का निर्माण किया और उनका पालन समाज किस तरह करे इसके उपाय भी किये थे.

ब्राह्मणों को मिटाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में जो शैतानी सिस्टम दुनिया पर थोपा गया है और हर चीज बिकाऊ बना दी गयी है. ये सब ब्राह्मणिक ढाँचे में फिट नहीं बैठती हैं. ब्राह्मण ऐसी व्यवस्था के हमेशा से विरोधी रहे थे. चाहे वह छात्रों से पैसे वसूल कर उन्हें शिक्षा देना हो. बेड पर लेटे बीमार व्यक्ति से पैसे वसूलना हो. दूध दही अनाज और यहाँ तक कि, जल, मिटटी और हवा भी बेंचने का धंधा चल पड़ा है. न्याय व्यवस्था जैसी चीज को भी बिकाऊ बना दिया गया है. बिना पैसे और किसी बिचौलिए के न्याय तो दूर लोगों की सुनवाई भी नहीं हो सकती. मानव जीवन से जुड़ा हर एक पहलू आज पैसे पर जाकर अटकता है. आज इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि, इंसान पैसे कमाने के लिए पैदा होता है या अन्य प्राणियों की तरह जीने के लिए.

ग्लोबल माफियाओं ने हर देश में सेंट्रल बैंक बनाकर धरती को अपनी करेंसी और मुद्रा प्रणाली द्वारा कंट्रोल कर लिया है. 20वीं सदी में उन्होंने हर देश से राजतंत्र जैसी प्राकृतिक व्यवस्था हटाने की शुरुआत की थी और सभी देशों पर जबरन शैतानी लोकतंत्र थोप दिया ताकि बिचौलियों के माध्यम से वो दुनिया पर शासन कर सकें. जो तानशाही से भी खतरनाक शासन प्रणाली है. तानाशाही और लोकतंत्र में सिर्फ इतना फर्क है कि, तानाशाही प्रत्यक्ष होती है और लोकतंत्र में तानाशाही चुनाव जीतने के बाद होती है. तानाशाही में जनता को कम से कम आभास होता है कि, वह तानाशाही झेल रही है लेकिन लोकतंत्र में उसे तमाम प्रोपोगंडाओं के माध्यम से उसे विश्वास दिलाया जाता है कि, वह एक बेहतर सिस्टम में जी रहे हैं जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं. ब्राह्मणों ने धरती के लिए जो सिस्टम बनाया था उनमें इन सब शोषणकारी चीजें कहीं नहीं थीं. चूँकि ब्राह्मणों की सलाह और देखरेख में ही भारत शासित होता था इसलिए आवश्यक है कि, उन्हें इतना बदनाम कर दिया जाय जिससे उन्हें शासन से दूर रखने में कोई समस्या ना आये.
राजकाज को लेकर एक पुरानी कहावत है जिसके अनुसार, अगर किसी राष्ट्र की राजव्यवस्था के बारे में जानना है तो आप वहां के राजा को नहीं बल्कि उस राजा के सलाहकारों को देखो
ब्राह्मणिक सामाजिक व्यवस्था में ठगों लुटेरों की कोई जगह नहीं ।

पश्चिम के सामाजिक जीवन में सिर्फ मनुष्यों की गिनती होती है किसी अन्य की नहीं जबकि भारत का सामजिक ढांचा मात्र मानव जीवन तक ही नहीं सीमित था बल्कि उसमें प्रकृति, पेड़ पशु पक्षी एवं पूरा ब्रह्मांड आता था जिनके संरक्षण और सम्मान की बातें वेदों में भी लिखी हैं. ब्राह्मणों ने हर उस चीज के संरक्षण पर बल दिया जो कि, प्राकृतिक संतुलन और मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक थे.

पश्चिमी जगत हमेशा से ही ठग और लुटेरा समुदाय रहा है उन्हें जहाँ मौका मिला वहां उन्होंने लोगों को ठगा. रूस के लोग आज भी ब्रिटेन को ठग लुटेरा और अंग्रेजी भाषा को चोर लुटेरों की भाषा बोलते हैं. आज की समाज व्यवस्था कुछ ऐसी है लोग चाहे जितना बड़ा अपराध कर लें वह कभी सुधर नही सकते क्योंकि ये समाज व्यवस्था कुकर्मियों को सजा नहीं देती बल्कि उनका संरक्षण करती है. आजकल अपराधी युवाओं के आदर्श होते हैं. चोरों लुटेरों और हत्यारों के भी गुरु होने लगे हैं. जबकि भारतीय समाज व्यवस्था कुछ ऐसी थी जहाँ अपराध तो दूर लोग इसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे. यदि कोई सामाजिक नियम तोड़ता भी था तो उसे समाज ऐसा बहिष्कृत करता था जो ना जीने लायक होता था ना मरने लायक.

आज ये देखना बेहद आश्चर्यजनक है, प्रकृति का दोहन करने वाले, धरती की हर एक चीज को अपने उपभोग की वस्तु मानने वाले, मानव समाज को नस्लों में बांटने वाले, मनुष्यों को इस धर्म उस धर्म में विभाजित करने वाले, धरती पर बॉर्डर की रेखाएं खींचने वाले, वीजा पासपोर्ट जैसा वाहियात सिस्टम लगाकर मानव समाज को एक राष्ट्रीयता में समेट देने वाले, न्याय व्यवस्था के नाम पर बिचौलियों की व्यवस्था लादने वाले लोग अरबों रूपये की फंडिंग करके उन ब्राह्मणों के विरुद्ध मिशन चलवा रहे हैं जिन्होंने मानव सभ्यता को आदर्श तरीके से जीना सिखाया था.
एक पुरानी रणनीति रही है, आप अगर अपने विरोधी की बराबरी ना कर सको तो उसे बदनाम कर दो. इस तरह से ना ही मात्र आप उससे ऊपर आ जाओगे बल्कि अगले की विश्वसनीयता भी खत्म हो जायेगी.

जब भी अन्याय और अधर्म बढ़ा है ब्राह्मण ना ही मात्र पूरे समाज को लेकर हमेशा उसके खिलाफ खड़े हुए हैं बल्कि उन्होंने समय समय पर उसका सफाया भी किया है. इसलिए भविष्य में ऐसा फिर कभी ना होने पाए इसके लिए आवश्यक था कि, उनका सफाया कर दिया जाय. भारत ने कभी किसी सभ्यता पर हमला नहीं किया लेकिन दुनिया के हर एक कोने से आक्रमणकारी भारत पर हमला करते रहे लेकिन वो कभी भी इस सभ्यता को मिटा नहीं पाए. ग्लोबल माफियाओं के मजदूर ब्रिटिश जब भारत आये तब उन्होंने अनुभव किया कि, भारतीयों से युद्ध में पार पाना संभव नहीं है इसलिए उन्होंने छल प्रपंच और भारतीयों को बांटने की नीति अपनाई जिससे वे लंबे समय तो इस महान राष्ट्र को लूट सकें. उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था, शासन व्यवस्था, समाज व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था को कंट्रोल करके भारत को छिन्न-भिन्न कर दिया जिससे भारतीय अपनी जड़ों से कट जाएँ.

पश्चिमी लुटेरों के इतने जतन के बावजूद भी भारत पर उनका कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा. क्योंकि भारत में ब्राह्मण थे जो बेहद ही मोटी चमड़ी के होते हैं और थोड़े समय बाद पुनः भारतीयों को भारतीय ढाँचे में ढालने की कला में वो हजारों वर्षों से पारंगत रहे हैं. यही कारण था, इस बार ऐसा मिशन चलाया गया जिससे भारतीयों से ही ब्राह्मणों का खात्मा करवाया जा सके. ग्लोबल माफियाओं की इस व्यवस्था को अगर किसी से सबसे ज्यादा खतरा है तो ब्राह्मणों से इसलिए उन्होंने एक सोची-समझी साजिश के तहत ब्राह्मणों के विरुद्ध प्रोपोगेन्डा करना शुरू कर दिया. उन्होंने उन्हीं लोगों को ब्राह्मणों के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया जो भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख अंग थे.
युद्ध की यह एक पुरानी रणनीति रही है, किसी किले को बाहरी दुश्मन उतनी आसानी से नहीं ढहा पाते जितनी जल्दी उसे किले के अंदर वाले ढहा डालते हैं, इसी रणनीति के तहत भारतीय समाज में ही विभाजन की रेखाएं खींच दी गयीं.
प्रत्यक्ष युद्ध में ना जीत पाए इसलिए भारतीय समाज में फूट डालकर भारत को जीतने की साजिश

ब्रिटिशों के आने से पहले भारत में कभी कोई जाति प्रथा नहीं थी और ना ही जाति प्रथा जैसी किसी चीज का जिक्र हमारे किसी प्राचीन ग्रंथ या एतिहासिक पुस्तकों में मिलता है. यहाँ तक कि, भारत और भारतीय संस्कृति पर लिखने वाले फाह्यान, ह्वेनसांग, अलबरूनी, मेगास्थनीज और टॉलमी जैसे विदेशी इतिहासकारों ने भारत में जाति व्यवस्था जैसी चीज का कोई जिक्र किया है. ब्राह्मणों द्वारा किसी का शोषण तो दूर की बात भारत में सामुदायिक नफरत का कभी कोई इतिहास नहीं रहा. भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अध्ययन करने आये सभी विदेशी यात्रियों ने एक भी ऐसा कोई तथ्य नहीं दिया जो यह प्रमाणित कर सके कि, भारतीय समाज में किसी प्रकार की कोई असमानता थी..

भारतीय समाज में जातियां नहीं ज्ञातियाँ थीं. ज्ञातियाँ अर्थात जिन्हें जिस क्षेत्र का ज्ञान हो : शिक्षक, पुरोहित, योद्धा, व्यापारी, किसान, ग्वाल, लोहार, कुम्हार, सुनार, चर्मकार, नाई इसी तरह भारत में कई सारी ज्ञातियाँ थीं. जो जिस क्षेत्र के ज्ञाता थे वे अपनी ज्ञातियों के अनुसार विभाजित थे, कोई भी व्यक्ति भारत में जाति के हिसाब से नहीं बल्कि ज्ञाति के हिसाब से जाना जाता था. जाति शब्द वास्तव में ज्ञाति का ही अपभ्रंश है जिसे जानबूझकर ग्लोबल माफियाओं ने अपने भाड़े के विद्वानों से स्थापित करवाया.

ब्राह्मण वर्ग में शिक्षक ज्ञाति के साथ ही पुरोहित भी हुआ करते थे अर्थात पर+हित, अर्थात ऐसे लोग जिनका कार्य ही दूसरों के हित के लिए सोचना था. मानवों के हित के लिए, समाज के हित के लिए, प्रकृति के हित के लिए, यहाँ तक कि पशु पक्षियों के हित से लेकर नदी तालाबों और पेड़ पालवों का का भी हित. आज जिस बराबरी (Equality) और शोषक व्यवस्था का ढोल पीटा जाता है अगर किसी ने सभी के हित का ध्यान रखते हुए समाज के लिए आदर्श व्यवस्था का निर्माण किया था तो वो भारतीय समाज का ब्राह्मण वर्ग था. जिन्होंने हर किसी का काम बाँट दिया था. लोग सिर्फ वही करते थे जो वो सबसे अच्छी तरह से कर पाते थे.

हर एक मनुष्य की छमता को देखते हुए ऐसी ही व्यवस्था के लिये हमारे पूर्वजों ने 4 वर्ण बनाये थे. ये सामाजिक नियम ब्राह्मणों ने नहीं बल्कि मानव समाज ने बनाये थे, ब्राह्मण भी इस व्यवस्था का हिस्सा थे जो समाज द्वारा खड़े किये गये थे. उनका पोषण भी समाज ही करता था. सोचने विचारने और निर्णय लेने के अन्य की अपेक्षा ब्राह्मण वर्ग ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकता था इसलिए उन्हें समाज ने इस जिम्मेदारी के लिए चुना था.

M.A. Sherring (Matthew Atmore Sherring 1826–1880) नामक एक ईसाई पादरी का इस कार्य में महत्त्वपूर्ण रोल रहा था. उसने भारतीय समाज को जातियों अर्थात कास्ट में बांटने के लिए एक किताब लिखी थी Hindu Tribes and Castes इसके जरिये ग्लोबल माफियाओं ने ईसाई मिशनरियों के साथ मिलकर भारतीय समाज को कई धड़ों में बांटने की स्क्रिप्ट तैयार करवाई थी जो कि अब जाकर परवान चढ़ रही है. मैक्समूलर भी ऐसा ही भाड़े पर हायर किया गया इंडोलोजिस्ट था जिसने बाद में यह स्वीकार भी किया कि, उसे ब्रिटिश एम्पायर द्वारा भारतीय धर्म ग्रंथो को विकृत करने के लिए हायर नौकरी पर रखा गया था.

मनुस्मृति जैसे महान ग्रंथ को भी ब्रिटिश काल में ही दूषित किया गया. इसके पहले इतिहास में कभी मनुस्मृति को लेकर कोई शिकायत नहीं मिलती. 18,1900 से पहले के साहित्यों में मनुस्मृति के खिलाफ एक भी शब्द कहीं देखने को नहीं मिलेगा. बल्कि मनुस्मृति की महिमा का बखान कई देशों के विद्वानों ने किया है. चूँकि मनुस्मृति ही वह विधान था जिससे भारतीय समाज चलता था इसलिए भारत के दुश्मनों ने सबसे ज्यादा इस ग्रंथ को ही बदनाम किया. जितने भी तथाकथित भारतीय समाज सुधारकों ने मनुस्मृति की निंदा की या उन्हें जलाया वास्तव में उन्हें मनुस्मृति का लेश मात्र भी ज्ञान ना था. उन्होंने मनुस्मृति की जगह यूरोपियनों की प्रोपोगंडा स्मृति पढी थी.

ईसाईयों में उनके जन्म के समय से ही एक हवस रही है, पूरी दुनिया को ईसाईयत में बदलने की. इसमें उन्हें एक अलग ही चरमसुख की प्राप्ति होती है. मिशनरियों ने पहले यूरोप में पागन धर्म को मानने वाले यूरोपियनों को ईसाईयत में धर्मांतरित किया फिर यही मिशन उनका उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया और एशिया में चला. लगभग हर जगह उन्हें मनचाही सफलता मिली और उन्होंने सफलतापूर्वक देश के देश ईसाई बना डाले. लेकिन भारत में वे ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि यहाँ उनका मुकाबला ब्राह्मणों से था

ईसाई मिशनरियां और यूरोपीय लुटेरे एक बेहद संगठित गिरोह की तरह काम करते रहे हैं. जहाँ-जहाँ यूरोपीय लुटेरे लूटमार करने के लिए जाते थे वहां पीछे-पीछे ईसाई मिशनरियां अपनी दूकान लेकर पहुंच जाती थीं. लुटेपिटे परेशान लोग दुनिया के लिए समस्या हैं लेकिन वे ईसाई मिशनरियों के लिए एक मौका होते हैं. विपदाग्रस्त स्थलों में मिशनरियों की दुकान सबसे अच्छी चलती है.
दुनिया के किसी भी कोने में (गैर ईसाई) जब कोई आपदा आती है तो वहां राहत बाद में पहुंचती हैं, अपनी दुकानें लेकर ईसाई मिशनरियाँ वहां पहले पहुंचती हैं.

भारत में ईसाई मिशनरियों को अपनी असफलता का कारण उसी समय पता चल गया था जब पुर्तगाली शैतान जेवियर्स (वही सेंट जेवियर जिसके नाम पर भारत में हजारों स्कूल कालेज हैं) गोवा में धर्मांतरण और लूटमार के लिए पहुंचा था. ब्राह्मण हमेशा से ही ईसाई मिशनरियों की राह में बड़ा रोड़ा रहे हैं. ब्रिटिशों ने भारत में जानबूझकर कई बार अकाल को जन्म दिया. जिसमें करोड़ों भारतीय मारे गये. सिर्फ बंगाल क्षेत्र में ही 1 करोड़ के लगभग भारतीयों का अकाल में सफाया हो गया. इस तबाही में ईसाई मिशनरियों ने गिद्धों की तरह हर मौके को लपकने की कोशिश की और भूखे लोगों को अनाज देने के नाम पर जमकर धर्मान्तरित किया. लेकिन फिर भी ईसाई मिशनरियों को वो सफलता कभी नहीं मिल पाई जिसकी उन्हें अपेक्षा थी.

धर्मांतरण के लिए भारत आयीं ईसाई मिशनरियों ने वेटिकन को कई पत्र लिखे थे जिसमें उन्होंने भारत में ईसाईयत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ब्राह्मणों को बताया था. ईसाई मिशनरियों के अनुसार, ब्राह्मणों की सामाजिक व्यवस्था के चलते हिन्दुओं को ईसाईयत में ढाल पाना असंभव है.

ईसाई मिशनरियों से ऐसे इनपुट मिलने के बाद वेटिकन और Jesuit जैसे ईसाई संगठनों ने रणनीति तैयार की है कि, सबसे पहले ब्राह्मणों को बदनाम कर भारतीय समाज से उनकी उपयोगिता समाप्त की जाय. इसके पश्चात ही उनका ईसाईयत मिशन भारत में सफल हो पायेगा. वर्तमान में भारत में चल रहे ब्राह्मण विरोध का कारण ईसाईयत मिशन ही है. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि, भारतीय व्यवस्थाओं को सिरे से नकारने और यूरोपीय व्यवस्थाओं को अपनाने में भारत का वह तबका बहुत आगे है जिसने यूरोपीय माध्यम से अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा पायी है.
भारत का अंग्रेजी मीडिया भारत और भारतीय सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ ही ब्राह्मणों का कट्टर विरोधी है तो उसका यही कारण है.

आज यह एक रिसर्च का विषय है कि, ईसाई मिशनरियों में गैर ईसाईयों को ईसाईयत में ढालने की इतनी हवस क्यों है ? आखिर कौन सा आनंद मिलता है उन्हें ? आज जब हर वर्ग अपनी बेहतरी के लिए पसीना बहाने में व्यस्त है ऐसे में बर्बर ईसाई मिशनरियाँ आज भी धर्म परिवर्तन जैसी मध्ययुगीन सोच अपनाये हुए हैं. दुनिया बदल गयी लेकिन ईसाई मिशनरियां आज भी अपनी सोच बदलने को नहीं तैयार...!!

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ १. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक हो...