जागो हिंदू: दिसंबर 2018

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ

१. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक होगी, उस कुल में व्यक्ति जन्म लेता है

२. कुल अर्थात मूलाधारचक्र, शक्ति अथवा कुंडलिनी । कुल + देवता अर्थात ऐसे देवता जिसकी उपासना से मूलाधारचक्र में विद्यमान कुंडलिनीशक्ति जागृत होती है तथा आध्यात्मिक प्रगति आरंभ होती है । कुलदेवता, अर्थात कुलदेव अथवा कुलदेवी, दोनों ।

२. कुलदेवताकी उपासनाका इतिहास

कुलदेवताकी उपासनाका आरंभ वेदोत्तर एवं पुराणपूर्व कालमें हुआ । कुलदेवताकी साधनाद्वारा आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक उन्नति करनेवाले एक सिद्ध उदाहरण हैं छत्रपति शिवाजी महाराज । शिवाजी महाराजके गुरु समर्थ रामदासस्वामीजीने उन्हें उनकी कुलदेवी भवानीमाताकी ही उपासना बताई थी । संत तुकाराम महाराजने जिस पांडुरंगकी अनन्यभक्ति कर सदेह मुक्ति प्रप्त की, वह विठोबा उनके कुलदेवता ही थे ।

३. कुलदेवताका नामजप करने का महत्व

हम गंभीर रोगों में स्वयं निर्धारित औषधि नहीं लेते । ऐसे में उस क्षेत्र के अधिकारी व्यक्ति अर्थात, डॉक्टर के पास जाकर उनके परामर्शनुसार औषधि लेते हैं । उसी प्रकार भवसागर के गंभीर रोगों से बचने हेतु अर्थात, अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए, आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत व्यक्तियों के मार्गदर्शन अनुसार साधना करना आवश्यक है; परंतु ऐसे उन्नत व्यक्ति समाज में बहुत अल्प होते हैं । ९८ प्रतिशत तथाकथित गुरु वास्तव में गुरु होते ही नहीं । अतः यह प्रश्‍न उठता है कि कौनसा नाम जपना चाहिए; परंतु इस संदर्भ में भी प्रत्येक को उसकी उन्नति हेतु आवश्यक, ऐसे उचित कुल में ही भगवान ने जन्म दिया है ।

अस्वस्थ होने पर हम अपने फैमिली डॉक्टर के पास जाते हैं, क्योंकि उन्हें हमारी शरीरप्रकृति एवं रोग की जानकारी रहती है । यदि किसी कार्यालय में शीघ्र काम करवाना हो, तो हम परिचित व्यक्तिद्वारा काम करवा लेते हैं । उसी प्रकार अनेक देवताओं में से कुलदेवता ही हमें अपने लगते हैं । वे हमारी पुकार सुनते हैं एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु उत्तरदायी होते हैं ।

जब ब्रह्मांड के सर्व तत्त्व पिंड में लाए जाते हैं, तब साधना पूर्ण होती है । सर्व प्राणियों में से केवल गाय में ही ब्रह्मांड के सर्व देवताओं की स्पंदन-तरंगें ग्रहण करने की क्षमता है । (इसीलिए गाय के उदर में तैंतीस करोड देवता वास करते हैं, ऐसा कहा जाता है ।) उसी प्रकार ब्रह्मांड के सर्व तत्त्वों को आकर्षित कर, उन सभी में ३० प्रतिशत वृद्धि करने का सामर्थ्य केवल कुलदेवता के जप में है । इसके विपरीत श्रीविष्णुु, शिव, श्री गणपति आदि देवताओं का नामजप केवल विशिष्ट तत्त्व की वृद्धि हेतु है, जैसे शक्तिवर्धक के रूप में जीवनसत्त्व अ, ब (विटामिन ए, बी) इत्यादि लेते हैं ।

४. कुलदेवता का रुष्ट होना

यदि कोई विद्यार्थी बुद्धिमान होेते हुए भी पढाई न करता हो, तो पाठशाला में शिक्षक उसे डांटते हैं । उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति करने की क्षमता होने पर भी यदि कोई व्यक्ति साधना नहीं करता, तो कुलदेवता उस पर क्रोधित होते हैं; परंतु सामान्यतः उस व्यक्ति को इस क्रोध का भान नहीं होता, इसलिए कुलदेवता कुछ व्यावहारिक अडचनें उत्पन्न करते हैं बहुत प्रयत्न करने पर भी उन अडचनों का निराकरण न कर पाने पर, वह व्यक्ति किसी उन्नत पुरुष से (संत अथवा गुरुसे) पूछताछ करता है । उन्नत पुरुषद्वारा कुलदेवता की उपासना बताए जाने पर एवं उसके अनुसार उपासना आरंभ करने पर कुलदेवता अडचनों का निराकरण करते हैं एवं उपासना में सहायता भी करते हैं ।

५. किसका नामजप करना चाहिए – कुलदेवता का अथवा कुलदेवी का ?

१. केवल कुलदेवता होने पर उन्हींका एवं केवल कुलदेवी के होने पर कुलदेवी का नामजप करना चाहिए ।

२. यदि किसी के कुलदेव एवं कुलदेवी दोनों हों, तो उन्हें कुलदेवी का जप करना चाहिए । इसके निम्नलिखित कारण हैं ।

बचपन में माता-पिता दोनों के होते हुए हम माता के साथ ही अधिक हठ करते हैं, क्योंकि मां हमारे हठ को शीघ्र पूर्ण कर देती है । उसी प्रकार, कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं ।

कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी पृथ्वीतत्त्व से अधिक संबंधित होती हैं ।

आध्यात्मिक प्रगति के लिए परात्पर गुरु का दिया नाम १०० प्रतिशत, कुलदेवी का ३० प्रतिशत तो कुलदेवता का नाम २५ प्रतिशत पूरक होता है ।

६. कुलदेवताका नामजप करनेकी पद्धति

कुलदेवताके नामसे पूर्व ‘श्री’ लगाएं, नामको संस्कृत व्याकरणानुसार चतुर्थीका त्यय लगाएं एवं अंतमें ‘नमः’ बोलें, उदा. कुलदेवता गणेश हों, तो ‘श्री गणेशाय नमः ।’, कुलदेवी दुर्गा हों, तो ‘श्री दुर्गायै नमः ।’ बोलना कठिन है, इसलिए ‘देव्यै’ त्यय लगाकर ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ बोलें ।

७. नामजप कितना करना चाहिए ?

कुलदेवता का नामजप प्रतिदिन न्यूनतम १ से २ घंटे एवं अधिकतम अर्थात निरंतर करना चाहिए ।

८. कुलदेवता के नामजप संबंधी प्रायः पूछे जानेवाले प्रश्‍न

कुलदेवता यदि ज्ञात न हो, तो क्या करें ?

यदि कुलदेवता ज्ञात न हो तो कुटुंब के ज्येष्ठ, अपने उपनामवाले बंधु, जातिबंधु, गांव के लोग, पुरोहित इत्यादि से कुलदेवता की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करें । कुलदेवता के संदर्भ में जानकारी न मिलने से इष्टदेवता के नामका जप करना चाहिए अथवा ‘श्री कुलदेवतायै नमः ।’ यह जप करना चाहिए । यह जप पूर्ण होते ही कुलदेवता का नाम बतानेवाले मिलते हैं । देवता के रूप की कल्पना न होने के कारण मात्र ‘श्री कुलदेवतायै नमः ऐसा जप करना, अधिकांश लोगों के लिए कठिन हो जाता है । इसके विपरीत, प्रिय देवता को रूप ज्ञात होने के कारण उनका जप करना सहज लगता है ।

कुलदेवता का नामजप करने से क्या लाभ होता है ?

कुलदेवता का आवश्यक जप पूर्ण होने पर गुरु साधक के जीवन में स्वयं आकर गुरुमंत्र देते हैं ।
कुलदेवता यदि श्री गणेश-पंचायतन जैसे हो, तो नामजप कैसे करें ?

किसी के कुलदेवता श्री गणेश-पंचायतन अथवा श्रीविष्णुु-पंचायतन (पंचायतन अर्थात पांच देवता) इस प्रकार के हों, तो पंचायतन के प्रमुख देवता को क्रमशः श्री गणेश अथवा श्रीविष्णुु को ही कुलदेवता मानें ।

विवाहित स्त्री ससुराल के अथवा मायके के कुलदेवता का नाम जपें ?

सामान्यतः विवाहोपरांत स्त्री का नाम परिवर्तित होता है । मायके का सबकुछ त्यागकर स्त्री ससुराल आती है । एक अर्थ से यह उसका पुनर्जन्म ही होता है; इसीलिए विवाहित स्त्री को अपने ससुराल के कुलदेवता का जप करना चाहिए । यदि कोई स्त्री बचपन से ही नामजप करती हो एवं प्रगत साधक हो, तो विवाह के पश्‍चात भी वही नामजप जारी रखने में कोई हानि नहीं । यदि गुरु ने किसी स्त्री को उसके विवाहपूर्व नामजप दिया हो, तो उसे वही नाम जपना चाहिए।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

Dharma ka Prabhav

《 ब्रह्मा पुराण 》
अध्याय – ५८-

🥦💎🍥🌙🌞🚩धर्म से यमलोक में सुखपूर्वक गति तथा भगवदभक्ति के प्रभाव का वर्णन🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩मुनियों ने कहा – अहो ! यमलोक के मार्ग में तो बड़ा भयंकर दुःख होता है | सधुश्रेष्ठ ! आपने उन दु:खों के साथ ही घोर नरकों तथा दक्षिणद्वार का भी वर्णन किया | ब्रह्मन ! उस भयानक मार्ग में कष्टों से बचने का कोई उपाय हैं या नही ? यदि है तो बताइये, किस उपाय से मनुष्य यमलोक में सुखपूर्वक जा सकते हैं ?🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩व्यासजी ने कहा – मुनिवरो ! जो लोग इस लोकमें धर्मपरायण हो अहिंसा का पालन करते, गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहते और देवता तथा ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, वे स्त्री और पुत्रोंसहित जिस प्रकार उस मार्ग से यात्रा करते हैं, वह बतलाता हूँ | उपर्युक्त पुण्यात्मा पुरुष सुवर्णमय ध्वजाओं से सुशोभित भांति-भांति के दिव्य विमानोंपर आरूढ़ हो धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक नाना पराक्र की वस्तुएँ दान में देते हैं, वे उस महान पथपर सुख से यात्रा करते हैं | जो ब्राह्मणों को, बाह्मणों में भी विशेषत: श्रीत्रियों को अत्यंत भक्तिपूर्वक उत्तम रीति से तैयार किया हुआ अन्न देते हैं , वे सुसज्जित विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो सदा सत्य बोलते और बाहर-भीतर से शुद्ध रहते हैं, वे भी देवताओं के समान कान्तिमान शरीर धारणकर विमानोंद्वारा यमराज के भवन में जाते हैं | जो धर्मज्ञ पुरुष जीविकारहित दिन-दुर्बल साधुओं को भगवान विष्णु के उद्देश्य से पवित्र गोदान करते हैं, वे मणिजटित दिव्य विमानोंद्वारा धर्मराज के लोक में जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो जूता, छाता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे दिव्य आभूषणों स अलंकृत हो हाथी, रथ और घोड़ों की सवारी से वहाँ की यात्रा करते हैं | उनके ऊपर सोने-चांदी का छत्र लगा रहता हैं | जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विशुद्ध ह्रदय से भक्तिपूर्वक गुड़का रस और भात देते हैं, वे सुवर्णमय वाहनोंद्वारा यमलोक में जाते हैं | जो ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक शुद्ध एवं सुसंस्कृत दूध, दही, घी और गुड दान करते हैं, वे चक्रवाक पक्षियों से जुड़े हुए सुवर्णमय विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं | उससमय गन्धर्वगण वाद्योंद्वारा उनकी सेवा करते हिन् | जो सुगन्धित पुष्प दान करते हैं, वे हंसयुक्त विमानों से धर्मराज के नगर को जाते हैं | जो क्षोत्रिय ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक तिल, तिलमयी धेनु अथवा घृतमयी धेनु दान करते हैं, वे चंद मंडल के समान उज्ज्वल विमानोंद्वारा यमराज के भवन में प्रवेश करते हैं | उससमय गंधर्वगण उनका सुयश गाते रहते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩इस लोक में जिनके बनवाये हुए कुएँ, बावडी, तालाब, सरोवर, दीर्घिका, पुष्करिणी तथा शीतल जलाशय शोभा पाते हैं, वे दिव्य घंटानाद से मुखरित, सुवर्ण और चन्द्रमा के समान कान्तिमान विमानोद्वारा यात्रा करते हैं | मार्ग में उन्हें सुख देने के लिये दिव्य पंखे डुलाये जाते हैं | जो लोग समस्त प्राणियों के जीवनभुत जलका दान करते हैं, वे पिपासा से रहित हो दिव्य विमानोंपर बैठकर सुखपूर्वक उस महान पथ की यात्रा करते हैं | जिन्होंने ब्राह्मणों को लकड़ी की बनी खडाऊं, सवारी, पीढ़ा और आसन दान किये हैं, वे उस मार्ग में सुख से जाते हैं | वे विमानोंपर बैठकर सोने और मणियों के बने हुए उत्तम पिढोपर पैर रखकर यात्रा करते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो मनुष्य दूसरों के उपकार के लिये फल और पुष्पों से सुशोभित विचित्र उद्यान लगाते हैं, वे वृक्षोंकी रमणीय एवं शीतल छाया में सुखपूर्वक यात्रा करते हैं | जो लोग सोना, चाँदी, मूँगा तथा मोती दान करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्ज्वल विमानोंपर बैठकर यमलोक में जाते हैं | भूमिदान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओं से तृप्त हो उदयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी विमानोंपर बैठकर देदीप्यमान शरीर से धर्मराज के नगर को जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो बाह्मणों के लिये भक्तिपूर्वक उत्तम गंध, अगर, कपूर, पुष्प और धूप का दान करते हैं, वे मनोहर गंध, सुंदर वेष, उत्तम कान्ति और श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित हो विचित्र विमानोंद्वारा धर्मनगर की यात्रा करते हैं | दीप-दान करनेवाले मनुष्य अग्नि के तुल्य प्रकाशमान होकर सूर्य के समान तेजस्वी विमानोंद्वारा दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए चलते हैं | जो गृह अथवा रहने के लिये स्थान देते हैं, वे अरुणोदयकी-सी कान्तिवाले सुवर्णमंडित गुर्हों के साथ धर्मराज के नगर में जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो ‘पापहरे !’ इत्यादि का उच्चारण करके गौ को मस्तक झुकाते हैं, वह सुख से यमलोक के मार्गपर आगे बढ़ता हैं | जो शठता और दम्भ का परित्याग करके एक समय भोजन करते हैं, वे हंसयुक्त विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक की यात्रा करते हैं | जो जितेन्द्रिय पुरुष एक दिन उपवास करके दूसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे मोरों से जुड़े हुए विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो नियमपूर्वक व्रत का पालन करते हुए तीसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे हाथियों से जुड़े हुए दिव्य रथोंपर आसीन हो यमराज के लोक में जाते अं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो नित्य पवित्र रहकर इन्द्रियों को वश में रखते हुए छठे दिन आहार ग्रहण करते हैं, वे साक्षात शचीपति इंद्र के समान ऐरावत की पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं | जो एक पक्षतक उपवास करके अन्न ग्रहण करते हैं, वे बाघों से जुड़े हुए विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | उससमय देवता और असुर उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं | जो जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे सूर्य के समान देदीप्यमान रथोपर बैठकर यमलोक की यात्रा करते हैं | जो स्त्री अथवा गौ की रक्षा के लिये युद्ध प्राणत्याग करता हैं, वह सूर्य के समान कान्तिमान शरीर धारण करके देवकन्याओंद्वारा सेवित हो धर्मनगर की यात्रा करता है |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो भगवान विष्णु में भक्ति रखते हुए जितेन्द्रियभाव से तीर्थों की यात्रा करते हैं, वे सुखदायक विमानों से सुशोभित हो उस भयंकर पथ की यात्रा करते हैं | जो श्रेष्ठ द्विज प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा भगवान का यजन करते हैं, वे तपाये हुए सुवर्णसदृश विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं | जो दूसरों को पीड़ा नहीं देते और भृत्यों का भरण-पोषण करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्ज्वल विमानोंपर बैठकर सुखसे यात्रा करते है |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो समस्त प्राणियों के प्रति क्षमाभाव रखते, सबको अभय देते, क्रोध, मोह और मद से मुक्त रहते तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे महान तेजसे सम्पन्न हो पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशमान विमानपर बैठकर यमराज की पूरी में जाते हैं | उससमय देवता और गन्धर्व उनकी सेवामे खड़े रहते हैं | जो सत्य और पवित्रता से युक्त रहकर कभी भी मांसाहार नही करते, वे बी धर्मराज के नगर में सुखसे ही यात्रा करते हैं | जो एक हजार गौओं का दान करता है और जो कभी मांस भक्षण नही करता, वे दोंनो समान हैं – यह बात पूर्वकाल में वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ साक्षात ब्रह्माजी ने कही थी |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩ब्राह्मणों ! सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य होता हैं और समस्त यज्ञों के अनुष्ठान से जिस फल की प्राप्ति होती हैं, वही या उसके समान फल मांस न खाने से भी प्राप्त होता हैं | इसप्रकार दान और व्रत में तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा पुरुष विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं, जहाँ सूर्यनंदन यम विराजमान रहते हैं | धार्मिक पुरुषों को देखकर यमराज स्वयं ही स्वागतपूर्वक उन्हें आसन देते और पाद्य, अर्घ्य तथा प्रिय वचनोंद्वारा उनका सम्मान करते हैं | वे कहते हैं – पुण्यात्मा पुरुषो ! आपलोग धन्य हैं | आप अपने आत्माका कल्याण करनेवाले महात्मा हैं, क्योंकि आपने दिव्य सुख के लिये शुभकर्मों का अनुष्ठान किया है | अब इस विमानपर बैठकर उस अनुपम स्वर्गलोक को जाइये, जहाँ समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं | वहाँ महान भोगो माँ उपभोग करके अंत में पुण्य क्षीण होनेपर जो थोडा अशुभ कर्म शेष रहेगा, उसका फल यहाँ आकर भोगियेगा |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩धर्मात्मा पुरुष अपने पुण्यों के प्रभाव से धर्मराज को कोमल ह्रदयवाले अपने पिता के तुल्य देखते हैं, इसलिये धर्म का सदा सेवन करना चाहिये | धर्म मोक्षरूप फल को देनेवाला हैं | धर्म से ही अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि बतायी गयी हैं | धर्म ही माता-पिता और भ्राता हैं, धर्म ही अपना रक्षक और सुह्रद हैं | स्वामी, सखा, पालक तथा धारण-पोषण करनेवाला धर्म ही हैं | धर्मसे अर्थ, अर्थ से काम और कामसे भोग एवं सुख उपलब्ध होते है | धर्म से ही ऐश्वर्य, एकाग्रता और उत्तम स्वर्गीय गति प्राप्त होती हैं | विप्रवरो ! धर्म का यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्य की महान भय से रक्षा करता हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि धर्म से देवत्त्व और ब्राह्मणत्त्व भी प्राप्त हो सकते हैं | जब मनुष्यों के पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं, तब उनकी बुद्धि इस लोक में धर्म की ओर लगती है |हजारों जन्मों के पश्चात दुर्लभ मनुष्य जीवन को पाकर जो धर्म का आचरण नहीं करता, वह निश्चय ही सौभाग्य से वंचित है | जो लोग कुत्सित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरों के सेवक और मुर्ख है, उन्होंने पूर्वजन्म में धर्म नहीं किया हैं – ऐसा जानना चाहिये | जो दीर्घायु, शूरवीर, पंडित, भोगसाधन से सम्पन्न, धनवान, नीरोग तथा रूपवान हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में अवश्य ही धर्म का अनुष्ठान किया है | ब्राह्मणों ! इसप्रकार धर्मपरायण मनुष्य उत्तम गति को प्राप्त होते हैं और अधर्म का सेवन करनेवाले लोग पशु-पक्षियों की योनि में जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो मनुष्य नरकासुर का विनाश करनेवाले भगवान वासुदेव के भक्त है, वे स्वप्न में भी यमराज अथवा नरकों को नहीं देखते | जो दैत्यों और दानवों का संहार करनेवाले आदि-अंतरहित भगवान नारायण को प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, वे भी यमराज को नहीं देखते | जो मन, वाणी और क्रिया के द्वारा भगवान अच्युत की शरण में चले गये हैं, उनपर यमराज का वश नही चलता | वे मोक्षरूप फल के भागी होते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩ब्राह्मणों ! जो मनुष्य प्रतिदिन जगन्नाथ श्रीनारायण को नमस्कार करते है, वे वैकुण्ठधाम के सिवा अन्यत्र नही जाते | श्रीविष्णु को नमस्कार करके मनुष्य यमदूतों को, यमलोक के मार्ग को, यमपुरी को तथा वहाँ के नरकों को किसीप्रकार नहीं देख पाते | मोह में पडकर अनेकों बार पाप कर लेनेपर भी यदि मानव सर्वपापहारी श्रीहरि को नमस्कार करते हैं तो वे नरक में नही पड़ते | जो लोग शठतासे भी सदा भगवान जनार्दन का स्मरण करते हैं, वे भी देहत्याग के पश्चात रोग-शोक से रहित श्रीविष्णुधाम को प्राप्त होते हैं | अत्यंत क्रोध में आसक्त होकर भी जो कभी श्रीहरि के नामों का कीर्तन करता हैं, वह भी चेदिराज शिशुपाल की भांति सम्पूर्ण दोषों का क्षय हो जानेसे मोक्ष को प्राप्त करता हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

– नारायण नारायण –

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जिला फैजाबाद बाल कृष्ण मंदिर धार्मिक जय भगवान परशुराम की आप सभी भक्तजनों से हाथ जोड़कर विनती है प्रतिदिन हाजिरी जरूर लगाएं प्रेम से बोलिए राधे राधे और हमारा नंबर है संपर्क कर लीजिएगा☎ 85 2880 5193 आपका शुभचिंतक बृजलाल पासवान
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         🌹जय श्री कृष्ण🌹
         🌹Զเधे-Զเधे ...✍🌹

मददगार

🌹👩* *👩🌹
शिप्रा का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने शिप्रा पूरी बोगी घूम आई थी, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी । मन अनजाने भय से काँप सा गया ।
पहली बार अकेली सफर कर रही थी, इसलिये पहले से ही घबराई हुई थी। अतः खुद को सहज रखने के लिए चुपचाप अपनी सीट पर मैगज़ीन निकाल कर पढ़ने लगी ।
नवयुवकों का झुंड जो शायद किसी कैम्प जा रहे थे, के हँसी - मजाक , चुटकुले उसके हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे ।
शिप्रा के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे - धीरे उतरने लगी ।
सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने कहा --
" हेलो , मैं साकेत और आप ? "
भय से पीली पड़ चुकी शिप्रा ने कहा --" जी मैं ........."
"कोई बात नहीं , नाम मत बताइये । वैसे कहाँ जा रहीं हैं आप ?"
शिप्रा ने धीरे से कहा--"इलाहबाद"
"क्या इलाहाबाद... ?
वो तो मेरा नानी -घर है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं ।" खुश होते हुए साकेत ने कहा ।और फिर इलाहाबाद की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति हैं , उसके दोनों मामा सेना के उच्च अधिकारी हैं और ढेरों नई - पुरानी बातें ।
शिप्रा भी धीरे - धीरे सामान्य हो उसके बातों में रूचि लेती रही । शिप्रा रात भर साकेत का हाथ पकड़ के सोती रही
रात जैसे कुँवारी आई थी , वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई ।
सुबह शिप्रा ने कहा - " लीजिये मेरा पता रख लीजिए , कभी नानी घर आइये तो जरुर मिलने आइयेगा ।"
" कौन सा नानीघर बहन ? वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ - मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो पहले कभी इलाहबाद आया ही नहीं ।"
"क्या..... ?" -- चौंक उठी शिप्रा ।
"बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं, कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें । हम में ही तो पिता और भाई भी होते हैं ।"
कह कर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुरा उठा साकेत ।
शिप्रा साकेत को देखती रही जैसे कि कोई अपना भाई उससे विदा ले रहा हो शिप्रा की आँखें गीली हो चुकी थी
काश इस संसार मे सब ऐसे हो जाये
न कोई अत्याचार ,न व्यभिचार ,भय मुक्त समाज का स्वरूप हमारा देश,हमारा प्रदेश, हमारा शहर,हमारा गांव
जहाँ सभी बहन ,बेटियों,खुली हवा में सांस ले सकें
निर्भय होकर कहीं भी कभी भी आ जा सके जहाँ जर कोई एक दूसरे का मददगार हो I 💐💐💐💐

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ १. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक हो...