जागो हिंदू: दिसंबर 2017

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

जीव और ईश्वर के मिलन के लिए पहले पूतना वासना का नाश होना चाहिए ।
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अविद्या (पूतना) नष्ट होने से जीवन की गाड़ी राह पर आने लगती है ,और शकटासुर का नाश होता है ।जीवन सही रास्ते पर चलने लगता है ,तब तृणावर्त-,रजोगुण नष्ट होकर सत्त्वगुण बढ़ने लगता है ।
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रजोगुण मिटने के बाद कन्हैया माखन-मन की चोरी करते हैं और जीवन सात्विक बनता है । जीवन सात्विक होने पर आसक्ति की मटकी फूट जाती है । दही की मटकी - संसारासक्ति की मटकी ।
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संसारासक्ति नष्ट होने पर प्रभू जीव के पाश में बंधते हैं । यही दामोदर लीला है । प्रभू के बंधने पर दम्भ - बकासुर , और पाप-ताप -अघासुर का बध होता है ।
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सांसारिक ताप नष्ट होने पर दावाग्नि नष्ट होती है ,शान्त होती है ।अत: इन्द्रियाँ शुद्ध हुई ,अन्त:करण की वासना का क्षय हुआ ।। यही नागदमन , और प्रलम्बासुर बध है ।
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जीव ईश्वर से मिलने के योग्य होने पर कृष्ण की मधुर मुरली की मधु- रिमा तान सुन पाता है । वेणुगीत अर्थात् नादब्रह्म की उपासना ।
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गोवर्धन लीला । गो - इन्द्रियों का संवर्धन , इन्द्रियों के पुष्ट होने पर भक्ति रस उत्पन्न होता है । इन्द्रियों की पुष्टि होने पर षडरस का और वरूण देव का पराभव होता है ।
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चीरहरण लीला - बाह्यावरण , अज्ञान और वासना के नष्ट होने पर रासलीला होती है , जीव और ब्रह्म का मिलन होता है ।।

नारद मोह

नारद मोह,,,,एक सोने के पतरे पर तुलसी रखकर पलड़ें में रखा तब भगवान के बराबर भार बैठा!!!!!

एक बार देवर्षि नारद के मन में आया कि भगवान् के पास बहुत महल आदि है है, एक- आध हमको भी दे दें तो यहीं आराम से टिक जायें, नहीं तो इधर-उधर घूमते रहना पड़ता है। भगवान् के द्वारिका में बहुत महल थे।

नारद जी ने भगवान् से कहा- भगवन ! आपके बहुत महल हैं, एक हमको दो तो हम भी आराम से रहें। आपके यहाँ खाने- पीने का इंतजाम अच्छा ही है । भगवान् ने सोचा कि यह मेरा भक्त है, विरक्त संन्यासी है। अगर यह कहीं राजसी ठाठ में रहने लगा तो थोड़े दिन में ही इसकी सारी विरक्ति भक्ति निकल जायेगी।

हम अगर सीधा ना करेंगे तो यह बुरा मान जायेगा, लड़ाई झगड़ा करेगा कि इतने महल हैं और एकमहल नहीं दे रहे हैं। भगवान् ने चतुराई से काम लिया, नारद से कहा जाकर देख ले, जिस मकान में जगह खाली मिले वही तेरे नाम कर देंगे।

नारद जी वहाँ चले। भगवान् की तो १६१०८ रानियाँ और प्रत्येक के ११- ११ बच्चे भी थे। यह द्वापर युग की बात है।

सब जगह नारद जी घूम आये लेकिन कहीं एक कमरा भी खाली नहीं मिला, सब भरे हुए थे। आकर भगवान् से कहा वहाँ कोई जगह खाली नहीं मिली। भगवान् ने कहा फिर क्या करूँ , होता तो तेरे को दे देता। नारद जी के मन में आया कि यह तो भगवान् ने मेरे साथ धोखाधड़ी की है, नहीं तो कुछ न कुछ करके, किसी को इधर उधर शिफ्ट कराकर, खिसकाकर एक कमरा तो दे ही सकते थे।

इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है तो अब मैं भी इन्हे मजा चखाकर छोडूँगा। नारद जी रुक्मिणी जी के पास पहुँचे, रुक्मिणी जी ने नारद जी की आवभगत की, बड़े प्रेम से रखा। उन दिनों भगवान् सत्यभामा जी के यहाँ रहते थे।

एक आध दिन बीता तो नारद जी ने उनको दान की कथा सुनाई, सुनाने वाले स्वयं नारद जी। दान का महत्त्व सुनाने लगे कि जिस चीज का दान करोगे वही चीज आगे तुम्हारे को मिलती है। जब नारद जी ने देखा कि यह बात रुक्मिणी जी को जम गई है तो उनसे पूछा आपको सबसे ज्यादा प्यार किससे है ?

रुक्मिणी जी ने कहा यह भी कोई पूछने की बात है, भगवान् हरि से ही मेरा प्यार है। कहने लगे फिर आपकी यही इच्छा होगी कि अगले जन्म में तुम्हें वे ही मिलें।

रुक्मिणी जी बोली इच्छा तो यही है। नारद जी ने कहा इच्छा है तो फिर दान करदो, नहीं तो नहीं मिलेंगे। आपकी सौतें भी बहुत है और उनमें से किसी ने पहले दान कर दिया उन्हें मिल जायेंगे। इसलिये दूसरे करें, इसके पहले आप ही कर दे। रुक्मिणी जी को बात जँच गई कि जन्म जन्म में भगवान् मिले तो दान कर देना चाहियें।

रुक्मिणी से नारद जी ने संकल्प करा लिया। अब क्या था, नारद जी का काम बन गया। वहाँ से सीधे सत्यभामा जी के महल में पहुँच गये और भगवान् से कहा कि उठाओ कमण्डलु, और चलो मेरे साथ। भगवान् ने कहा कहाँ चलना है, बात क्या हुई ? नारद जी ने कहा बात कुछ नहीं, आपको मैंने दान में ले लिया है। आपने एक कोठरी भी नहीं दी तो मैं अब आपको भी बाबा बनाकर पेड़ के नीचे सुलाउँगा। सारी बात कह सुनाई।

भगवान् ने कहा रुक्मिणी ने दान कर दिया है तो ठीक है। वह पटरानी है, उससे मिल तो आयें। भगवान् ने अपने सारे गहने गाँठे, रेशम के कपड़े सब खोलकर सत्यभामा जी को दे दिये और बल्कल वस्त्र पहनकर, भस्मी लगाकर और कमण्डलु लेकर वहाँ से चल दिये।

उन्हें देखते ही रुक्मिणी के होश उड़ गये। पूछा हुआ क्या ? भगवान् ने कहा पता नहीं, नारद कहता है कि तूने मेरे को दान में दे दिया। रुक्मिणी ने कहा लेकिन वे कपड़े, गहने कहाँ गये, उत्तम केसर को छोड़कर यह भस्मी क्यों लगा ली ? भगवान् ने कहा जब दान दे दिया तो अब मैं उसका हो गया। इसलिये अब वे ठाठबाट नहीं चलेंगे।

अब तो अपने भी बाबा जी होकर जा रहे हैं । रुक्मिणी ने कहा मैंने इसलिये थोड़े ही दिया था कि ये ले जायें।

भगवान् ने कहा और काहे के लिये दान दिया जाता है ? इसीलिये दिया जाता है कि जिसको दो वह ले जाये । अब रुक्मिणी को होश आया कि यह तो गड़बड़ मामला हो गया। रुक्मिणी ने कहा नारद जी यह आपने मेरे से पहले नहीं कहा, अगले जन्म में तो मिलेंगे सो मिलेंगे, अब तो हाथ से ही खो रहे हैं । नारद जी ने कहा अब तो जो हो गया सो हो गया, अब मैं ले जाऊँगा। रुक्मिणी जी बहुत रोने लगी।

तब तक हल्ला गुल्ला मचा तो और सब रानियाँ भी वहा इकठ्ठी हो गई। सत्यभामा, जाम्बवती सब समझदार थीं। उन्होंने कहा भगवान् एक रुक्मिणी के पति थोड़े ही हैं, इसलिये रुक्मिणी को सर्वथा दान करने का अधिकार नहीं हो सकता, हम लोगों का भी अधिकार है।

नारद जी ने सोचा यह तो घपला हो गया। कहने लगे क्या भगवान् के टुकड़े कराओगे ? तब तो 16108 हिस्से होंगे। रानियों ने कहा नारद जी कुछ ढंग की बात करो। नारद जी ने विचार किया कि अपने को तो महल ही चाहिये था और यही यह दे नहीं रहे थे, अब मौका ठीक है, समझौते पर बात आ रही है।

नारद जी ने कहा भगवान् का जितना वजन है, उतने का तुला दान कर देने से भी दान मान लिया जाता है ।

तुलादान से देह का दान माना जाता है। इसलिये भगवान् के वजन का सोना, हीरा, पन्ना दे दो। इस पर सब रानियाँ राजी हो गई। बाकी तो सब राजी हो गये लेकिन भगवान् ने सोचा कि यह फिर मोह में पड़ रहा है । इसका महल का शौक नहीं गया। भगवान् ने कहा तुलादान कर देना चाहिये, यह बात तो ठीक हे ।

भगवान् तराजु के एक पलड़े के अन्दर बैठ गये। दूसरे पलड़े में सारे गहने, हीरे, पन्ने रखे जाने लगे। लेकिन जो ब्रह्माण्ड को पेट में लेकर बैठा हो, उसे द्वारिका के धन से कहाँ पूरा होना है। सारा का सारा धन दूसरे पलड़े पर रख दिया लेकिन जिस पलड़े पर भगवान बैठे थे वह वैसा का वैसा नीचे लगा रहा, ऊपर नहीं हुआ ।

नारद जी ने कहा देख लो, तुला तो बराबर हो नहीं रहा है, अब मैं भगवान् को ले जाऊँगा । सब कहने लगे अरे कोई उपाय बताओ । नारद जी ने कहा और कोई उपाय नहीं है । अन्य सब लोगों ने भी अपने अपने हीरे पन्ने लाकर डाल दिये लेकिन उनसे क्या होना था । वे तो त्रिलोकी का भार लेकर बैठे थे। नारद जी ने सोचा अपने को अच्छा चेला मिल गया, बढ़िया काम हो गया । उधर औरते सब चीख रही थी। नारद जी प्रसन्नता के मारे इधर ऊधर टहलने लगे।

भगवान् ने धीरे से रुक्मिणी को बुलाया। रुक्मिणी ने कहा कुछ तो ढंग निकालिये, आप इतना भार लेकर बैठ गये, हम लोगों का क्या हाल होगा ? भगवान् ने कहा ये सब हीरे पन्ने निकाल लो, नहीं तो बाबा जी मान नहीं रहे हैं।

यह सब निकालकर तुलसी का एक पत्ता और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा रख दो तो तुम लोगों का काम हो जायगा। रुक्मिणी ने सबसे कहा कि यह नहीं हो रहा है तो सब सामान हटाओ । सारा सामान हटा दिया गया और एक छोटे से सोने के पतरे पर तुलसी का पता रखा गया तो भगवान् के वजन के बराबर हो गया ।

सबने नारद जी से कहा ले जाओ तूला दान। नारद जी ने खुब हिलाडुलाकर देखा कि कहीं कोई डण्डी तो नहीं मार रहा है । नारद जी ने कहा इन्होंने फिर धोखा दिया । फिर जहाँ के तहाँ यह लेकर क्या करूँगा ? उन्होंने कहा भगवन्। यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं, केवल घरवालियों की बात सुनते हैं, मेरी तरफ देखो।

भगवान् ने कहा तेरी तरफ क्या देखूँ ? तू सारे संसार के स्वरूप को समझ कर फिर मोह के रास्ते जाना चाह रहा है तो तेरी क्या बात सुनूँ। तब नारद जी ने समझ लिया कि भगवान् ने जो किया सो ठीक किया । नारद जी ने कहा एक बात मेरी मान लो। आपने मेरे को तरह तरह के नाच अनादि काल से नचाये और मैंने तरह तरह के खेल आपको दिखाये। rpd

कभी मनुष्य, कभी गाय इत्यादि पशु, कभी इन्द्र, वरुण आदि संसार में कोई ऐसा स्वरूप नहीं जो चैरासी के चक्कर में किसी न किसी समय में हर प्राणी ने नहीं भोग लिया। अनादि काल से यह चक्कर चल रहा है, सब तरह से आपको खेल दिखाया आप मेरे को ले जाते रहे और मैं खेल करता रहा ।

अगर आपको मेरा कोई खेल पसंद आगया हो तो आप राजा की जगह पर हैं और मैं ब्राह्मण हूँ तो मेरे को कुछ इनाम देना चाहिये । वह इनाम यही चाहता हूँ कि मेरे शोक मोह की भावना निवृत्त होकर मैं आपके परम धाम में पहुँच जाऊँ ।

और यदि कहो कि तूने जितने खेल किये सब बेकार है, तो भी आप राजा हैं । जब कोई बार बार खराब खेल करता है तो राजा हुक्म देता है कि इसे निकाल दो । इसी प्रकार यदि मेरा खेल आपको पसन्द नहीं आया है तो फिर आप कहो कि इसको कभी संसार की नृत्यशाला में नहीं लाना है । तो भी मेरी मुक्ति है । भगवान् बड़े प्रसन्न होकर तराजू से उठे और नारद जी को छाती से लगाया और कहा तेरी मुक्ति तो निश्चित है।

भारतीय विज्ञान

2005 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जब इलाहाबाद आये तो महर्षि भारद्धाज आश्रम देखने की इच्छा उन्होंने प्रगट की और उन्होंने बताया कि महर्षि भारद्धाज ने सर्वप्रथम विमान शास्त्र की रचना की थी। महाकुंभ के अवसर पर देश-देशांतर के सभी विद्धान प्रयाग आते थे और इसी भारद्धाज आश्रम में महीने दो महीने रहकर अपने-अपने शोध और खोज पर चर्चा करते थे जिससे उनको जनकल्याण में लगाया जा सके। सोशल नेटवर्किंग साईट पर जब किसी ने अरब के किसी व्यक्ति का नाम देते हुए कहा कि सबसे पहले इन्होंने विमान की खोज की तो आश्‍चर्य हुआ।

प्राचीन काल में वेद, मंत्र, उपनिषद किसने लिखे ? उन भारतीयों ने अपने से अधिक अपनी कृति से प्रेम किया होगा यही कारण है कि अपना नाम प्रकाशित नहीं किया जबकि आप एक छोटी सी कविता भी लिख दें तो छपवाना चाहेंगे।
“ वैज्ञानिकाश्चं: कपिल: कणाद: सुश्रुतस्त था। चरको भास्क्राचार्यो वाराहमिहिर: सुधी:। नागार्जुनो भरद्धाजो बसुर्वुध:। ध्येायो वेंकटरामश्चस विज्ञा रामानुजादय:।

पश्चिम में एक धारणा प्रचलित की गई है कि भारत में साहित्य में अच्छा कार्य हुआ है। रामायण, महाभारत, मेघदूत और शकुंतला विलुप्त नहीं हुए। संगीत के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई लेकिन भारत वैज्ञानिक प्रगति नहीं कर पाया। पश्चिम के लोग कहते हैं कि आपके साधु-संत आंखे मूंद लेते हैं और ब्रम्हाहण्ड देख लेते हैं। दुनियां जानती है कि शून्यं का आविष्कार भारत में हुआ इससे पहले यूरोप के अंदर दशमलव पद्धति नहीं अपनाई गई थी। रोमन लिपि में गिनती की जाती थी जिसमें अंको को ।, ।।, ।।। का प्रयोग किया जाता रहा। इसमें यदि हजार से उपर की संख्या लिखनी होतो समस्या खडी हो जाती है और गुणा-भाग करना तो और भी कठिन कार्य है। 13 वीं शताब्दी तक यूरोप में गुणा-भाग विश्वाविघालय स्तर पर पढाया जाता था। जोडने और घटाने के साथ ही गुणा-भाग का कार्य सिर्फ भारत में होता था क्यों कि हमारे यहां जीरो का आविष्कार हो चुका था। जीरो रहने से किसी भी अंक का मान दस गुना बढ जाता है। जीरो को सारे अरेबिया ने भारत से प्राप्त किया अरेबिया से यूरोप जाकर वह इंटरनेशनल फार्म आफ अरेबिक न्यूमरल कहा जाने लगा। आज भी अरब के लोग शून्य को हिंदसा कहते हैं तो यूरोप में इसे अरेबिक न्यूमरल कहा जाता है।

आर्यभटट ने पाई रेशो का मान 14 वीं शताब्दी में निकाला कि पाई का मान 3.14159256 होता है इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने रेडियस, वृत, डायामीटर आदि का भी उल्लेख किया है। महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है कि योजनानां सहस्रेद्धि द्धिशत द्धियोजनम, वह प्रकाश जो एक निमिष इतना चलती है उसको नमस्कार है। महाभारत के समय रास्ते की माप योजन से होती थी, चार कोस का एक योजन और दो मील का एक कोस इसप्रकार आठ मील का एक योजन होता था। प्रकाश के बारे में शांति पर्व में कहा गया है कि दो हजार दो सौ योजन अर्ध निमिष में यात्रा करता है उसे नमस्कार है। निमिष अर्थात आदमी जितने समय में पलक झपकाता है या एक निमिष अर्थात सेकेंड का छठां भाग और अर्ध निमिष सेकेंड का बारहवां हिस्सा जिसमें प्रकाश अपनी दूरी तय करता है। अब इसतरह से जोड करें तो प्रकाश की गति लगभग दो लाख मील प्रति सेकेंड है। जो आज वैज्ञानिक मानते हैं वह वही है जो महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया।

इसीप्रकार पृथ्वी की आयु की गणना भी भारतीयों ने अपने अनुसार कर लिया था कि पृथ्वी की आयु दो सौ करोड वर्ष है। हांलाकि कैल्वीन की गणना से लेकर रेडियो एक्टिीवीटी की गणना के बाद वैज्ञानिक अब इस निष्कार्ष पर आ गये हैं कि पृथ्वी की आयु दो सौ करोड वर्ष ही है। भारतीयों ने कहा ब्रम्हा् के एक हजार साल कलियुग है तो दो हजार वर्ष द्धापर, तीन हजार वर्ष त्रेता और चार हजार साल का सतयुग होता है। अब यदि हिसाब लगाये तो सतयुग के संधिकाल के दोनो ओर चार-चार सौ वर्ष और कलियुग के दोनो और सौ-सौ वर्ष का संधिकाल होता है पुराण के अनुसार तो एक महायुग बारह हजार साल का होगा। यह बारह हजार वर्ष ब्रम्हाा जी का एक वर्ष है। मानव का एक वर्ष ब्रम्हा जी का एका दिन होता है। ब्रम्हा जी का एक वर्ष मानव का 360 साल हुए तो संधिकाल जोडने पर ब्रम्हा के 1200 साल का कलियुग हुआ। तो कलियुग का समय निकालने के लिये 1200 में 360 का गुणा कर दें तो मानव के चार लाख बतीस हजार वर्ष आते हैं। इस हिसाब से पृथ्वी की आयु आज के वै‍ज्ञानिकों की खोज के समतुल्य हो जाती है।

पाईथागोरस से काफी पहले ही बौधायन ने यज्ञ वेदियों को लेकर समकोण त्रिभुज पर कार्य किया और अनेक बातें प्रगट की वहीं भाष्क्राचार्य ने सरफेस आफ द स्फीपयर का अध्ययन किया और कहा कि एक वृत का क्षेत्रफल 4 पाई आर स्कवायर होगा। हांलाकि यह तो बिना डिफरेंसियल कैलकुलस के निकल ही नहीं सकता तो यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि भाष्काराचार्य को डिफरेंसियल कैलकुलस का ज्ञान रहा होगा। मेडिकल साईंस में सुश्रुत और चरक ने काफी कार्य किया और शल्‍य चिकित्सा की की प्रारंभिक जानकारी इनके ग्रंथो से मिलती है। शल्य क्रिया में कौन-कौन से उपकरण काम आते हैं इसका वर्णन सुश्रुत ने पहले ही कर दिया था। मोतियाबिंद से लेकर प्लानस्टिक सर्जरी तक में पहल भारत ने हजारों साल पहले ही कर दिया था।
एक हजार साल पुराना दिल्ली का लौह स्तंभ भारत के स्टेानलेस स्टील की खोज को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है जिसकी खोज अब जाकर दुनियां ने की है। जब पुरु और सिकंदर की भेंट हुई तो सिकंदर ने पुरु से भेंट में भारत वर्ष का लोहा मांगा ताकी वह उनसे तलवार बना सके और जब वह दुनियां के कुछ देशों में लडने गया तो उसके सैनिक ललकार कर कहते थे सावधान मेरा तलवार भारत के इस्पात से बना है, मेरी यह शमशीर एक बार में सिर को अलग कर देगी। वस्त्रों के मामले में कहा जाता है कि भारतीय मलमल 200 काउंट से उपर का बनता था और आज कंम्यूाटर भी 150 काउंट से अधिक का मलमल नही बना पाता।

महर्षि भारद्धाज ने सबसे पहले विमान शास्त्र की रचना की इसीतरह अगस्त संहिता में भी कई प्रकार के वैज्ञानिक ज्ञान की चर्चा की गई है। क्वांटम मेकेनिक और रिलेटिवीटी का सिद्धांत आने से काफी पहले ही हमारे वैज्ञानिकों ने कहा कि या पिण्डे सो ब्रह्माण्डे अर्थात जो ब्रह्माण्ड में है वही हमारे पिण्ड में है। दुर्भाग्य से प्राचीन भारत के इस ज्ञान-विज्ञान के बारे में जिसे जानना चाहिये वे संस्कृत नही जानते और जो संस्कृत जानते हैं वे विज्ञान के बारे में नही जानते जब तक इन दोनो का संगम नही होता अनेक तथ्य ऐसे ही दबे रह जायेगें।

क्या आप जानते कि भारत वर्ष के इन गाँवों में आज भी संस्कृत बोलते हैं लोग ?
संस्कृत संस्कार देने वाली भाषा है… अत: उसके नित्य उच्चारण से व्यक्ति के जीवन जीने की शैली अधिक भारतीय हो जाती है, उच्च आदर्शों के निकट पहुँचने में सहायक बनती है…

आज देश में ऐसे अनेक गाँवों में लोगों की आपसी बोलचाल की भाषा संस्कृत बन चुकी है। इन गाँवों में दैनिक जीवन का सम्पूर्ण वार्तालाप सिर्फ संस्कृत में ही किया जा रहा है।

ऐसे ग्रामों में सबसे महत्वपूर्ण नाम है कर्नाटक के मुत्तुर व होसहल्ली और मध्य प्रदेश के झिरी गाँव का, जहाँ सही अर्थों में संस्कृत जन-जन की भाषा बन चुकी है।

इन ग्रामों में लगभग 95 प्रतिशत लोग संस्कृत में ही वार्तालाप करते हैं। मुतरु, होसहल्ली व झिरी के अलावा मध्य प्रदेश के मोहद और बधुवार तथा राजस्थान के गनोडा भी ऐसे ग्राम हैं जहाँ दैनिक जीवन का अधिकांश वार्तालाप संस्कृत में ही किया जाता है।

सिर्फ एक-दूसरे का हालचाल जानने के लिए ही नहीं बल्कि खेतों में हल चलाने, दूरभाष पर बात करने, दुकान से सामान खरीदने और यहाँ तक कि नाई की दुकान पर बाल कटवाते समय भी संस्कृत में ही वार्तालाप देखने को मिलता है।

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रहस्यमय मंदिर:-२


चमत्कारिक कनिपक्कम गणपति मंदिर जहाँ लगातार बढ़ रहा है मूर्ति का आकार

चित्तूर , आन्ध्रप्रदेशका का एक जिला है यहाँ का विघ्नहर्ता कनिपक्कम गणपति मंदिर बाकि सब मंदिरों से अपने आप में अनूठा है क्योंकि , एक तो ये विशाल मंदिर नदी के बीचों बीच स्थित है और दूसरा यहाँ स्थित गणपतिजी की मूर्ति का आकार लगातार बढ़ रहा है। कहा जाता है कि यहाँ आने वाले हर भक्त के पाप को विघ्नहर्ता हर लेते हैं। मंदिर के बनने की कहानी भी बेहद रोचक है , कहा जाता है कि तीन भाई थे। उनमें से एक गूंगा , दूसरा बहरा और तीसरा अंधा था। तीनों ने मिलकर अपने जीवन व्यापन के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा खरीदा। जमीन पर खेती के लिए पानी की जरुरत थी। इसलिए तीनों ने उस कुंए को खोदना शुरू किया जो सूख चुका था।काफी खोदने के बाद पानी निकला उसके बाद थोड़ा और खोदने पर एक पत्थर दिखाई दिया। जिसे हटाने पर खून की धारा निकलने लगी। थोड़ी ही देर में पूरे कुंए का पानी लाल हो गया। यह चमत्कार होते ही तीनों भाई जो कि गूंगे , बेहरे व अंधे थे , वे एकदम ठीक हो गए। जब ये खबर उस गाँव में रहने वाले लोगों तक पहुँची तो वे सभी यह चमत्कार देखने के लिए एकत्रित होने लगे। तभी सभी को वहाँ प्रकट स्वयं भू गणेशजी की मूर्ति दिखाई दी , जिसे वहीं पानी के बीच ही स्थापित कर दिया गया ।यहाँ के लोगों का मानना है कि प्रतिदिन गणपति की ये मूर्ति अपना आकार बढ़ा रही है।इस बात का प्रमाण उनका पेट और घुटना है , जो बड़ा आकार लेता जा रहा है। कहा जाता है कि विनायक को एक भक्त श्री लक्ष्माम्मा ने एक कवच भेंट किया था , लेकिन प्रतिमा का आकार बढ़ऩे की वजह से अब उसे पहनाना मुश्किल हो गया है।कहा जाता है कि यदि किसी व्यक्ति को भगवान से अपने पाप कर्मों की क्षमा मांगनी है तो उसे यहाँ स्थित नदी में स्नान करके ये प्रण लेना होगा कि वह फिर कभी उस तरह का पाप नहीं करेगा , जिसके लिए वह क्षमा मांगने आया है। ऐसा प्रण करने के बाद गणेश जी के दर्शन करने से सारे पाप दूर हो जाते हैं।
माना जाता है कि इस नियम का पालन करने पर ही उस व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं।हैदराबाद से सड़क मार्ग से चित्तूर पहुंचा जा सकते है। चित्तूर , हैदराबाद से 581, तिरुपति से 70 , चेन्नई से 161, कांचीपुरम से 91, वेल्लोर से 31 कि.मी. दूर स्थित है ।

आज सन्यासी अपने आनंद में था।

एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, सन्यासी के मन में जिज्ञासा उतपन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए सन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है ? दुकानदारने कहा - इसमे नमक है ! सन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है ? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है ! इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है? दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है ! सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा राम राम?? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई?? मैंने तो इस नाम के किसी समान के बारे में कभी नहीं सुना। दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला - महात्मन ! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं !
संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई !
जिस बात के लिये मैं दर दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यपारी से समझ आ रही है। वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा ,,, ओह, तो खाली मे राम रहता है ! सत्य है भाई भरे हुए में राम को स्थान कहाँ ? (काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान,ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ? राम यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है ! ) एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी! आज सन्यासी अपने आनंद में था।

हनुमान जी के अहंकार नाश।

जब श्री राम ने किया हनुमान जी के अहंकार नाश।प्रभु की लीला प्रभु ही जानें।
यह कथा उस समय की है जब लंका जाने के लिए भगवान श्रीरामने सेतु निर्माण के पूर्व समुद्र तट पर शिवलिंग स्थापित किया था। वहाँ हनुमानजी को स्वयं पर अभिमान हो गया तब भगवान राम ने उनके अहँकार का नाश किया। 

यह कथा इस प्रकार है-

जब समुद्र पर सेतुबंधन का कार्य हो रहा था तब भगवान राम ने वहाँ गणेशजी और नौ ग्रहों
की स्थापना के पश्चात शिवलिंग स्थापित करने का विचार किया। उन्होंने शुभ मुहूर्त में शिवलिंग लाने के लिए हनुमानजी को काशी भेजा। हनुमानजी पवन वेग से काशी जा पहुँचे। उन्हें देख भोलेनाथ बोले- “पवनपुत्र!” दक्षिण में शिवलिंग की स्थापना करके भगवान राम मेरी ही इच्छा पूर्ण कर रहे हैं क्योंकि महर्षि अगस्त्य विन्ध्याचल पर्वत को झुकाकर वहाँ प्रस्थान तो कर गए लेकिन वे मेरी प्रतीक्षा में हैं। इसलिए मुझे भी वहाँ जाना था। तुम शीघ्र ही मेरे प्रतीक को वहाँ ले जाओ। यह बात सुनकर हनुमान गर्व से फूल गए और सोचने लगे कि केवल वे ही यह कार्य शीघ्र-अतिशीघ्र कर सकते हैं।

यहाँ हनुमानजी को अभिमान हुआ और वहाँ भगवान राम ने उनके मन के भाव को जान लिया। भक्त के कल्याण के लिए भगवान सदैव तत्पर रहते हैं। हनुमान भी अहंकार के पाश में बंध गए थे। अतः भगवान राम ने उन पर कृपा करने का निश्चय कर उसी समय वारनराज सुग्रीव को बुलवाया और कहा-“हे कपिश्रेष्ठ! शुभ मुहूर्त समाप्त होने वाला है और अभी तक हनुमान नहीं पहुँचे। इसलिए मैं बालू का शिवलिंग बनाकर उसे यहाँ स्थापित कर देता हूँ।”

तत्पश्चात उन्होंने सभी ऋषि-मुनियों से आज्ञा प्राप्त करके पूजा-अर्चनादि की और बालू का शिवलिंग स्थापित कर दिया। ऋषि-मुनियों को दक्षिणा देने के लिए श्रीराम ने कौस्तुम मणि का स्मरण किया तो वह मणि उनके समक्ष उपस्थित हो गई। भगवान श्रीराम ने उसे गले में धारण किया। मणि के प्रभाव से देखते-ही-देखते वहाँ दान-दक्षिणा के लिए धन, अन्न, वस्त्र आदि एकत्रित हो गए। उन्होंने ऋषि-मुनियों को भेंटें दीं। फिर ऋषि-मुनि वहाँ से चले गए।

मार्ग में हनुमानजी से उनकी भेंट हुई। हनुमानजी ने पूछा कि वे कहाँ से पधार रहे हैं? उन्होंने सारी घटना बता दी। यह सुनकर हनुमानजी को क्रोध आ गया। वे पलक झपकते ही श्रीराम के समक्ष उपस्थिति हुए और रुष्ट स्वर में बोले-“भगवन! यदि आपको बालू का ही शिवलिंग स्थापित करना था तो मुझे काशी किसलिए भेजा था? आपने मेरा और मेरे भक्तिभाव का उपहास किया है।”

श्रीराम मुस्कराते हुए बोले-“पवनपुत्र! शुभ मुहूर्त समाप्त हो रहा था, इसलिए मैंने बालू का शिवलिंग स्थापित कर दिया। मैं तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। मैंने जो शिवलिंग स्थापित किया है तुम उसे उखाड़ दो, मैं तुम्हारे लाए हुए शिवलिंग को यहाँ स्थापित कर देता हूँ।” हनुमान प्रसन्न होकर बोले-“ठीक है भगवन! मैं अभी इस शिविलंग को उखाड़ फेंकता हूँ।”

उन्होंने शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, लेकिन पूरी शक्ति लगाकर भी वे उसे हिला तक न सके। तब उन्होंने उसे अपनी पूंछ से लपेटा और उखाड़ने का प्रयास किया। किंतु वह नहीं उखड़ा। अब हनुमान को स्वयं पर पश्चात्ताप होने लगा। उनका अहंकार चूर हो गया था और वे श्रीराम के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगे।

इस प्रकार हनुमान ने अहम का नाश हुआ। श्रीराम ने जहाँ बालू का शिवलिंग स्थापित किया था उसके उत्तर दिशा की ओर हनुमान द्वारा लाए शिवलिंग को स्थापित करते हुए कहा कि ‘इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने के बाद मेरे द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा करने पर ही भक्तजन पुण्य प्राप्त करेंगे।’ 

यह शिवलिंग आज भी रामेश्वरम में स्थापित है और भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ है।

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

मीनाक्षी_मंदिर_मदुराई_तमिलनाडु

मीनाक्षी_मंदिर_मदुराई_तमिलनाडु
मीनाक्षी मन्दिर तमिलनाडु राज्य के मदुरै शहर में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है और इस मंदिर को मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्मान मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मीनाक्षी मन्दिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती थी, को समर्पित है।

वास्तु शिल्प

मीनाक्षी मन्दिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में द्रविड़ वास्तुकला में किया गया था। 65 हज़ार वर्ग मीटर में फैले इस विशाल मंदिर को यहाँ शासन करने वाले विभिन्न वंशों ने विस्तार प्रदान किया। दक्षिण में स्थित यह इमारत सबसे ऊँची है जिसकी ऊँचाई 160 फीट है। मीनाक्षी मन्दिर के विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं। मीनाक्षी मन्दिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।

पौराणिक मान्यता

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पर आए थे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुरै के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह करने का प्रस्ताव रखा और उन्होंने स्वीकार किया।

दर्शनीय स्थल

मीनाक्षी मन्दिर में कई आकर्षण के केंद्र हैं जैसे हज़ार स्तम्भ मंडपम (वास्तविक नाम: स्तंभ मण्डप), प्रत्येक स्तंभ थाप देने पर भिन्न स्वर निकालता है। स्तंभ मण्डप के दक्षिण में कल्याण मण्डप स्थित है, जहां प्रतिवर्ष मध्य अप्रैल में चैत्र मास में चितिरइ उत्सव मनाया जाता है। इसमें शिव-पार्वती के विवाह का आयोजन किया जाता है। स्वर्णकमल पुष्कर (वास्तविक नाम: पोर्थमराईकुलम) एक पवित्र सरोवर है जो कि 165 फीट लम्बा एवं 120 फीट चौड़ा है। यहाँ प्रतिदिन हज़ारों की संख्‍या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

महत्त्वपूर्ण उत्सव

मीनाक्षी मन्दिर से जुड़ा़ सबसे महत्त्वपूर्ण उत्सव है मीनाक्षी तिरुकल्याणम, जिसका आयोजन चैत्र मास (अप्रैल के मध्य) में होता है। इसके अलावा अन्य हिन्दु उत्सव जैसे नवरात्रि एवं शिवरात्रि भी यहाँ धूम धाम से मनाये जाते हैं।

अथ श्रीरामरक्षा स्तोत्रम्‌ !!!!!





मित्रों, सभी प्रकार की बाधाओं तथा मुश्किलों से मुक्ति प्राप्त करने का अमोघ उपाय ,राम रक्षा मन्त्र है यह स्तोत्र । कभी कभी इन्सान जीवन में इतना दुर्बल हो जाता है कि उसे सूझता ही नहीं की क्या किया जाय ।।

अगर आप किसी मुश्किल में फंसे हैं और कोई उपाय काम नहीं कर रहा ! किसी शत्रु का भय सता रहा हो या लड़ाई झगडे का डर हो ! असाधारण रूप से आप भय का अनुभव कर रहे हों ।।

फैसले की घडी हो और आपको डर हो कि आप मुसीबत में फंस जायेंगे ! अगर आपका कसूर न होते हुए भी आप को कोई नुक्सान होने का डर हो ! मुसीबतें चारों ओर हों और आप अकेले असहाय ।।

ऐसी दशा में श्री राम रक्षा स्त्रोत एक अमोघ अस्त्र सिद्ध होता है ! आप माने या ना माने परन्तु इस कलयुग में इस से बड़ा कोई भी ऐसा उपाय नहीं है जिससे आप तत्काल भय से मुक्त हो जाएँ ।।

जिसने भी इस मन्त्र को आजमा कर देखा है, इस के प्रभाव से वह तत्काल ही भयमुक्त हो गया है । इस अति विलक्षण मन्त्र से रक्षा कवच का एक ऐसा आवरण शरीर के आस पास उत्पन्न हो जाता है जिसे भेद पाना असंभव है ।।

अर्थात हर हाल में साधक को विजय प्राप्त होती है ! अगर आप पूरा राम रक्षा स्तोत्र नहीं पढ़ सकते हैं तो आप इसमें से सिर्फ एक निम्नांकित मन्त्र का प्रयोग कर सकते हैं ।।

श्री राम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्री राम राम भरताग्रज राम राम ।।
श्री राम राम रणकर्कश राम राम ।
श्री राम राम शरणम् भव राम राम ।।

अर्थात - हे राम मैं आपकी शरण में हूँ ! अब मेरी रक्षा आप ही कर सकते हैं ! इस मन्त्र में राम का नाम १६ बार आया है ! इसे ध्यान में रखें ।।

आप बस इस मन्त्र का मन में जितना हो सके जप करते रहें ! ये मन्त्र राम रक्षा स्तोत्र का अति महत्वपूर्ण मन्त्र है ! इस में भगवान् के नामो का षोडशोपचार (१६ तरह से) पूजन हो जाता है ।।

भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं । कैसी भी आपद-विपदा हो, श्री “राम रक्षा कवच” का पाठ करें, राम जी अच्छा ही करेंगे इससे चमत्कारी रक्षा कवच और कोई हो ही नहीं सकता ।।

अथ श्री राम रक्षा कवच ।।
कानन भूधर बारि बयारि महाविष व्याधि दवा अरि घेरे,
संकट कोटि जहाँ तुलसी सुत मातपिता हित बन्धु न नेरे !
राखिहैं राम कृपालु तहां हुनुमान से सेवक हैं जेहि केरे,
नाक रसातल भूतल माह रघुनायक एक सहायक मेरे !!

अथ श्रीरामरक्षा स्तोत्रम्‌ ।।

श्रीगणेशायनम: ।।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषि: ।श्रीसीतारामचंद्रोदेवता । अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: । श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ । श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

अर्थ:- इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक है तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं ।।

।। अथ ध्यानम्‌ ।।

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥

अथ ध्यान:- जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, बद्द पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं । जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं । जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम, विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करते हैं ।।

।। इति ध्यानम्‌ ।।

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥

अर्थ:- श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं। उसका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने वाला है ।।

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥

अर्थ:- नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले, जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके...

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥

अर्थ:- जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके...

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

अर्थ:- मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ । राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें ।।

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

अर्थ:- कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें ।।

जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

अर्थ:- मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें ।।

करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

अर्थ:- मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें ।।

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥

अर्थ:- मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और मेरे रानों की रक्षा राक्षस कुल का विनाश करने वाले रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम जी रक्षा करें ।।

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोsखिलं वपु: ॥९॥

अर्थ:- मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की रक्षा श्रीराम जी करें ।।

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥

अर्थ:- शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं ।।

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

अर्थ:- जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते रहते हैं, वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते ।।

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

अर्थ:- राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता । इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है ।।

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

अर्थ:- जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।।

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥

अर्थ:- जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं ।।

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

अर्थ:- भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र को लिखने का आदेश बुध कौशिक ऋषि को दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया ।।

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥

अर्थ:- जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं (विराम माने दूर कर देना ! सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को) और जो तीनो लोकों में सुंदर (अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं ।।

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

अर्थ:- जो युवा, सुन्दर, सुकुमार, महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं ।।

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

अर्थ:- जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी, तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं, वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें ।।

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

अर्थ:- ऐसे महाबली, रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ श्रीराम हमारा त्राण करें ।।

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥

अर्थ:- संघान किए धनुष धारण किए, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणों से युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें ।।rpd

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोsस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

अर्थ:- हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें ।।

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

अर्थ:- भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मणानुचर, बली, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम, वेदान्त्वेघ, यज्ञेश, पुराण पुरूषोतम, जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता हैं ।।

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

अर्थ:- दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता ।।

रामं लक्ष्मण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥

अर्थ:- लक्ष्मण जी के पूर्वज, सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर, गुण-निधान, विप्र भक्त, परम धार्मिक, राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक, राघव एवं रावण के शत्रु भगवान् श्री राम की मैं वंदना करता हूँ ।।

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

अर्थ:- राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप, रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं वंदना करता हूँ ।।

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

अर्थ:- हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम ! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए ।।

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

अर्थ:- मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ ।।

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

अर्थ:- श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता, मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं । इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं । उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता ।।

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥

अर्थ:- जिनके दाईं ओर लक्ष्मण जी, बाईं ओर जानकी जी और सामने हनुमानजी विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ ।।

लोकाभिरामं रणरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

अर्थ:- मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की मूर्ति और करुणा के भण्डार श्रीरामजी की शरण में हूँ ।।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

अर्थ:- जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानराग्रगण्य श्रीरामजी के दूत हनुमानजी की शरण लेता हूँ ।।

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥

अर्थ:- मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘‘राम-राम’’ के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ ।।

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥

अर्थ:- मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं ।।

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥

अर्थ:- ‘‘राम-राम’’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं । वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं । राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा भयभीत रहते हैं ।।

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोsस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

अर्थ:- राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं । मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ । सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ । श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं । मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ । मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ । हे श्रीराम ! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें ।।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

अर्थ:- (शिवजी पार्वती से बोले:-) हे सुमुखी ! राम का नाम ‘‘विष्णु सहस्त्रनाम’’ के समान हैं । मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ ।।

।। इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ।। श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ।

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼



आज का प्रात: सँदेश

सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी ने कई बार मानव की रचना की , परंतु सृष्टि का विस्तार नहीं हो पाया ! तब उन्होंने मैथुनीसृष्टि करने का विचार करके मनु-सतरूपा को उत्पन्न किया | यहीं से सृष्टि में "विवाह-विधान" की उत्पत्ति हुई | सनातन धर्म के चार आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ आश्रम "गृहस्थाश्रम" कहा गया है | गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए विवाहरूपी द्वार को पार करना पड़ता है | विवाहोपरान्त ही मनुष्य गृहस्थाश्रम में प्रवेश पाता है | यह ऐसा आश्रम है जहाँ से समस्त मानवजाति ने जन्म एवं विकास प्राप्त किया | सनातनधर्म के सोलह संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार है-- विवाह-संस्कार | हमारे धर्म मेंकुल आठ प्रकार के विवाह बताये गये हैं ! इनमें से सर्वश्रेष्ठ वैदिकविधानान्तर्गत "ब्रह्मविवाह" माना गया है | जहाँ वरपक्ष के लोग दूल्हे का श्रृंगार करके कन्या के यहाँ बारति लेकर पहुँचते थे और वहाँ उनका विवधिवत स्वागत करके विवाहविधान वैदिक ब्रह्मण के द्वारा सम्पन्न कराया जाता है | सभी प्रकार के दानों में कन्यादान प्रमुख स्थान रखता है | कन्यादान करने के के लिए कन्यापक्ष के लोग व्रत रहकर कन्यादान करके अपना जीवन धन्य मानते थे | यहीं पर ब्राह्मण द्वारा "पाणिग्रहण-संस्कार" सम्पन्न कराया जाता था | पाणिग्रहण का अर्थ है कि कन्या के पिता द्वारा विधिवत संकल्प करके कन्या का हाथ वर के हाथ में सौंपना ! एवं वर द्वारा कन्या का पाणि (हाथ) ग्रहण करना | फिर सात फेरे लेकर सात वचनों में बांधकर वर-वधू को उसे जीवनभर निभाने की प्रतिज्ञा दिलवायी जाती थी |

आज आधुनिक युग में जहाँ सारे रीति-रिवाज बदलते हुए दिख रहे हैं वहीं विवाह-संस्कार भी इससे अछूते नहीं रह गये हैं | आज के विवाहोत्सव को देखकर यह कहा जा सकता है कि आज "ब्रह्मविवाह" के अन्तर्गत विवाह सम्पन्न कराने का ढोंग मात्र किया जाता है , शेष "गन्धर्वविवाह" ने अपना पूरा प्रभाव जमा दिया है | आज के विवाह संस्कारों ने "गन्धर्वविवाह" को भी लज्जित कर दिया है | गन्धर्वविवाह में वर-वधू स्वेच्छा से किसी एकान्त स्थान में किसी वृक्ष को साक्षी मानकर एक-दूसरे को जयमाल पहनाकर पति-पत्नी बन जाया करते थे | परंतु आज जो जयमाल संस्कार किये जा रहे हैं उसमें दोनों पक्षों के अतिरिक्त सर्वसमाज की साक्षी होती है | जयमाल के मंच पर ही आज वर वधू का पाणिग्रहण कर लेता है | जयमाल पहनाकर एक - दूसरे के साथ विभिन्न मुद्राओं में चित्र बनवाने में निर्लज्जता साफ झलकती है | आज शहरों के कुछ परिवारों के विवाह में निर्लज्जता भी लज्जित हो जाती है जब विवाह के पूर्व ही दोनों परिवारों की सहमति से वर वधू "प्री-वेडिंग के छायांकन (चित्रण) के लिए एकान्त में निकल जाते हैं | विचार कीजिए कि अब क्या मर्यादा बची है | आज परिवारों के टूटने का कारण यह विवाह संस्कार भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है | जहाँ पहले की बहुएं ससुराल में बड़ों के सामने बोलने या घूंघट खोलने की हिम्मत न करके मर्यादित रहती थीं | वहीं आज की बहू जिसने जयमाल के मंच या प्री-वेडिंग में ही अपनी मर्यादा को मिटा दिया है वह कितना सम्मान करेगी इसका प्रभाव आज समाज में देखने को मिल रहा है |

आईये पुन: वैदिक परम्पराओं की ओर लौटने का प्रयास करके जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करें |

सभी भगवत्प्रेमियोँ को आज दिवस की मंगलमय कामना---

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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बडागाँव-फैजाबाद
श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ १. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक हो...