जागो हिंदू

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ

१. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक होगी, उस कुल में व्यक्ति जन्म लेता है

२. कुल अर्थात मूलाधारचक्र, शक्ति अथवा कुंडलिनी । कुल + देवता अर्थात ऐसे देवता जिसकी उपासना से मूलाधारचक्र में विद्यमान कुंडलिनीशक्ति जागृत होती है तथा आध्यात्मिक प्रगति आरंभ होती है । कुलदेवता, अर्थात कुलदेव अथवा कुलदेवी, दोनों ।

२. कुलदेवताकी उपासनाका इतिहास

कुलदेवताकी उपासनाका आरंभ वेदोत्तर एवं पुराणपूर्व कालमें हुआ । कुलदेवताकी साधनाद्वारा आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक उन्नति करनेवाले एक सिद्ध उदाहरण हैं छत्रपति शिवाजी महाराज । शिवाजी महाराजके गुरु समर्थ रामदासस्वामीजीने उन्हें उनकी कुलदेवी भवानीमाताकी ही उपासना बताई थी । संत तुकाराम महाराजने जिस पांडुरंगकी अनन्यभक्ति कर सदेह मुक्ति प्रप्त की, वह विठोबा उनके कुलदेवता ही थे ।

३. कुलदेवताका नामजप करने का महत्व

हम गंभीर रोगों में स्वयं निर्धारित औषधि नहीं लेते । ऐसे में उस क्षेत्र के अधिकारी व्यक्ति अर्थात, डॉक्टर के पास जाकर उनके परामर्शनुसार औषधि लेते हैं । उसी प्रकार भवसागर के गंभीर रोगों से बचने हेतु अर्थात, अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए, आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत व्यक्तियों के मार्गदर्शन अनुसार साधना करना आवश्यक है; परंतु ऐसे उन्नत व्यक्ति समाज में बहुत अल्प होते हैं । ९८ प्रतिशत तथाकथित गुरु वास्तव में गुरु होते ही नहीं । अतः यह प्रश्‍न उठता है कि कौनसा नाम जपना चाहिए; परंतु इस संदर्भ में भी प्रत्येक को उसकी उन्नति हेतु आवश्यक, ऐसे उचित कुल में ही भगवान ने जन्म दिया है ।

अस्वस्थ होने पर हम अपने फैमिली डॉक्टर के पास जाते हैं, क्योंकि उन्हें हमारी शरीरप्रकृति एवं रोग की जानकारी रहती है । यदि किसी कार्यालय में शीघ्र काम करवाना हो, तो हम परिचित व्यक्तिद्वारा काम करवा लेते हैं । उसी प्रकार अनेक देवताओं में से कुलदेवता ही हमें अपने लगते हैं । वे हमारी पुकार सुनते हैं एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु उत्तरदायी होते हैं ।

जब ब्रह्मांड के सर्व तत्त्व पिंड में लाए जाते हैं, तब साधना पूर्ण होती है । सर्व प्राणियों में से केवल गाय में ही ब्रह्मांड के सर्व देवताओं की स्पंदन-तरंगें ग्रहण करने की क्षमता है । (इसीलिए गाय के उदर में तैंतीस करोड देवता वास करते हैं, ऐसा कहा जाता है ।) उसी प्रकार ब्रह्मांड के सर्व तत्त्वों को आकर्षित कर, उन सभी में ३० प्रतिशत वृद्धि करने का सामर्थ्य केवल कुलदेवता के जप में है । इसके विपरीत श्रीविष्णुु, शिव, श्री गणपति आदि देवताओं का नामजप केवल विशिष्ट तत्त्व की वृद्धि हेतु है, जैसे शक्तिवर्धक के रूप में जीवनसत्त्व अ, ब (विटामिन ए, बी) इत्यादि लेते हैं ।

४. कुलदेवता का रुष्ट होना

यदि कोई विद्यार्थी बुद्धिमान होेते हुए भी पढाई न करता हो, तो पाठशाला में शिक्षक उसे डांटते हैं । उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति करने की क्षमता होने पर भी यदि कोई व्यक्ति साधना नहीं करता, तो कुलदेवता उस पर क्रोधित होते हैं; परंतु सामान्यतः उस व्यक्ति को इस क्रोध का भान नहीं होता, इसलिए कुलदेवता कुछ व्यावहारिक अडचनें उत्पन्न करते हैं बहुत प्रयत्न करने पर भी उन अडचनों का निराकरण न कर पाने पर, वह व्यक्ति किसी उन्नत पुरुष से (संत अथवा गुरुसे) पूछताछ करता है । उन्नत पुरुषद्वारा कुलदेवता की उपासना बताए जाने पर एवं उसके अनुसार उपासना आरंभ करने पर कुलदेवता अडचनों का निराकरण करते हैं एवं उपासना में सहायता भी करते हैं ।

५. किसका नामजप करना चाहिए – कुलदेवता का अथवा कुलदेवी का ?

१. केवल कुलदेवता होने पर उन्हींका एवं केवल कुलदेवी के होने पर कुलदेवी का नामजप करना चाहिए ।

२. यदि किसी के कुलदेव एवं कुलदेवी दोनों हों, तो उन्हें कुलदेवी का जप करना चाहिए । इसके निम्नलिखित कारण हैं ।

बचपन में माता-पिता दोनों के होते हुए हम माता के साथ ही अधिक हठ करते हैं, क्योंकि मां हमारे हठ को शीघ्र पूर्ण कर देती है । उसी प्रकार, कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं ।

कुलदेवता की अपेक्षा कुलदेवी पृथ्वीतत्त्व से अधिक संबंधित होती हैं ।

आध्यात्मिक प्रगति के लिए परात्पर गुरु का दिया नाम १०० प्रतिशत, कुलदेवी का ३० प्रतिशत तो कुलदेवता का नाम २५ प्रतिशत पूरक होता है ।

६. कुलदेवताका नामजप करनेकी पद्धति

कुलदेवताके नामसे पूर्व ‘श्री’ लगाएं, नामको संस्कृत व्याकरणानुसार चतुर्थीका त्यय लगाएं एवं अंतमें ‘नमः’ बोलें, उदा. कुलदेवता गणेश हों, तो ‘श्री गणेशाय नमः ।’, कुलदेवी दुर्गा हों, तो ‘श्री दुर्गायै नमः ।’ बोलना कठिन है, इसलिए ‘देव्यै’ त्यय लगाकर ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ बोलें ।

७. नामजप कितना करना चाहिए ?

कुलदेवता का नामजप प्रतिदिन न्यूनतम १ से २ घंटे एवं अधिकतम अर्थात निरंतर करना चाहिए ।

८. कुलदेवता के नामजप संबंधी प्रायः पूछे जानेवाले प्रश्‍न

कुलदेवता यदि ज्ञात न हो, तो क्या करें ?

यदि कुलदेवता ज्ञात न हो तो कुटुंब के ज्येष्ठ, अपने उपनामवाले बंधु, जातिबंधु, गांव के लोग, पुरोहित इत्यादि से कुलदेवता की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करें । कुलदेवता के संदर्भ में जानकारी न मिलने से इष्टदेवता के नामका जप करना चाहिए अथवा ‘श्री कुलदेवतायै नमः ।’ यह जप करना चाहिए । यह जप पूर्ण होते ही कुलदेवता का नाम बतानेवाले मिलते हैं । देवता के रूप की कल्पना न होने के कारण मात्र ‘श्री कुलदेवतायै नमः ऐसा जप करना, अधिकांश लोगों के लिए कठिन हो जाता है । इसके विपरीत, प्रिय देवता को रूप ज्ञात होने के कारण उनका जप करना सहज लगता है ।

कुलदेवता का नामजप करने से क्या लाभ होता है ?

कुलदेवता का आवश्यक जप पूर्ण होने पर गुरु साधक के जीवन में स्वयं आकर गुरुमंत्र देते हैं ।
कुलदेवता यदि श्री गणेश-पंचायतन जैसे हो, तो नामजप कैसे करें ?

किसी के कुलदेवता श्री गणेश-पंचायतन अथवा श्रीविष्णुु-पंचायतन (पंचायतन अर्थात पांच देवता) इस प्रकार के हों, तो पंचायतन के प्रमुख देवता को क्रमशः श्री गणेश अथवा श्रीविष्णुु को ही कुलदेवता मानें ।

विवाहित स्त्री ससुराल के अथवा मायके के कुलदेवता का नाम जपें ?

सामान्यतः विवाहोपरांत स्त्री का नाम परिवर्तित होता है । मायके का सबकुछ त्यागकर स्त्री ससुराल आती है । एक अर्थ से यह उसका पुनर्जन्म ही होता है; इसीलिए विवाहित स्त्री को अपने ससुराल के कुलदेवता का जप करना चाहिए । यदि कोई स्त्री बचपन से ही नामजप करती हो एवं प्रगत साधक हो, तो विवाह के पश्‍चात भी वही नामजप जारी रखने में कोई हानि नहीं । यदि गुरु ने किसी स्त्री को उसके विवाहपूर्व नामजप दिया हो, तो उसे वही नाम जपना चाहिए।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

Dharma ka Prabhav

《 ब्रह्मा पुराण 》
अध्याय – ५८-

🥦💎🍥🌙🌞🚩धर्म से यमलोक में सुखपूर्वक गति तथा भगवदभक्ति के प्रभाव का वर्णन🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩मुनियों ने कहा – अहो ! यमलोक के मार्ग में तो बड़ा भयंकर दुःख होता है | सधुश्रेष्ठ ! आपने उन दु:खों के साथ ही घोर नरकों तथा दक्षिणद्वार का भी वर्णन किया | ब्रह्मन ! उस भयानक मार्ग में कष्टों से बचने का कोई उपाय हैं या नही ? यदि है तो बताइये, किस उपाय से मनुष्य यमलोक में सुखपूर्वक जा सकते हैं ?🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩व्यासजी ने कहा – मुनिवरो ! जो लोग इस लोकमें धर्मपरायण हो अहिंसा का पालन करते, गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहते और देवता तथा ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, वे स्त्री और पुत्रोंसहित जिस प्रकार उस मार्ग से यात्रा करते हैं, वह बतलाता हूँ | उपर्युक्त पुण्यात्मा पुरुष सुवर्णमय ध्वजाओं से सुशोभित भांति-भांति के दिव्य विमानोंपर आरूढ़ हो धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक नाना पराक्र की वस्तुएँ दान में देते हैं, वे उस महान पथपर सुख से यात्रा करते हैं | जो ब्राह्मणों को, बाह्मणों में भी विशेषत: श्रीत्रियों को अत्यंत भक्तिपूर्वक उत्तम रीति से तैयार किया हुआ अन्न देते हैं , वे सुसज्जित विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो सदा सत्य बोलते और बाहर-भीतर से शुद्ध रहते हैं, वे भी देवताओं के समान कान्तिमान शरीर धारणकर विमानोंद्वारा यमराज के भवन में जाते हैं | जो धर्मज्ञ पुरुष जीविकारहित दिन-दुर्बल साधुओं को भगवान विष्णु के उद्देश्य से पवित्र गोदान करते हैं, वे मणिजटित दिव्य विमानोंद्वारा धर्मराज के लोक में जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो जूता, छाता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे दिव्य आभूषणों स अलंकृत हो हाथी, रथ और घोड़ों की सवारी से वहाँ की यात्रा करते हैं | उनके ऊपर सोने-चांदी का छत्र लगा रहता हैं | जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विशुद्ध ह्रदय से भक्तिपूर्वक गुड़का रस और भात देते हैं, वे सुवर्णमय वाहनोंद्वारा यमलोक में जाते हैं | जो ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक शुद्ध एवं सुसंस्कृत दूध, दही, घी और गुड दान करते हैं, वे चक्रवाक पक्षियों से जुड़े हुए सुवर्णमय विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं | उससमय गन्धर्वगण वाद्योंद्वारा उनकी सेवा करते हिन् | जो सुगन्धित पुष्प दान करते हैं, वे हंसयुक्त विमानों से धर्मराज के नगर को जाते हैं | जो क्षोत्रिय ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक तिल, तिलमयी धेनु अथवा घृतमयी धेनु दान करते हैं, वे चंद मंडल के समान उज्ज्वल विमानोंद्वारा यमराज के भवन में प्रवेश करते हैं | उससमय गंधर्वगण उनका सुयश गाते रहते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩इस लोक में जिनके बनवाये हुए कुएँ, बावडी, तालाब, सरोवर, दीर्घिका, पुष्करिणी तथा शीतल जलाशय शोभा पाते हैं, वे दिव्य घंटानाद से मुखरित, सुवर्ण और चन्द्रमा के समान कान्तिमान विमानोद्वारा यात्रा करते हैं | मार्ग में उन्हें सुख देने के लिये दिव्य पंखे डुलाये जाते हैं | जो लोग समस्त प्राणियों के जीवनभुत जलका दान करते हैं, वे पिपासा से रहित हो दिव्य विमानोंपर बैठकर सुखपूर्वक उस महान पथ की यात्रा करते हैं | जिन्होंने ब्राह्मणों को लकड़ी की बनी खडाऊं, सवारी, पीढ़ा और आसन दान किये हैं, वे उस मार्ग में सुख से जाते हैं | वे विमानोंपर बैठकर सोने और मणियों के बने हुए उत्तम पिढोपर पैर रखकर यात्रा करते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो मनुष्य दूसरों के उपकार के लिये फल और पुष्पों से सुशोभित विचित्र उद्यान लगाते हैं, वे वृक्षोंकी रमणीय एवं शीतल छाया में सुखपूर्वक यात्रा करते हैं | जो लोग सोना, चाँदी, मूँगा तथा मोती दान करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्ज्वल विमानोंपर बैठकर यमलोक में जाते हैं | भूमिदान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओं से तृप्त हो उदयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी विमानोंपर बैठकर देदीप्यमान शरीर से धर्मराज के नगर को जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो बाह्मणों के लिये भक्तिपूर्वक उत्तम गंध, अगर, कपूर, पुष्प और धूप का दान करते हैं, वे मनोहर गंध, सुंदर वेष, उत्तम कान्ति और श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित हो विचित्र विमानोंद्वारा धर्मनगर की यात्रा करते हैं | दीप-दान करनेवाले मनुष्य अग्नि के तुल्य प्रकाशमान होकर सूर्य के समान तेजस्वी विमानोंद्वारा दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए चलते हैं | जो गृह अथवा रहने के लिये स्थान देते हैं, वे अरुणोदयकी-सी कान्तिवाले सुवर्णमंडित गुर्हों के साथ धर्मराज के नगर में जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो ‘पापहरे !’ इत्यादि का उच्चारण करके गौ को मस्तक झुकाते हैं, वह सुख से यमलोक के मार्गपर आगे बढ़ता हैं | जो शठता और दम्भ का परित्याग करके एक समय भोजन करते हैं, वे हंसयुक्त विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक की यात्रा करते हैं | जो जितेन्द्रिय पुरुष एक दिन उपवास करके दूसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे मोरों से जुड़े हुए विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो नियमपूर्वक व्रत का पालन करते हुए तीसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे हाथियों से जुड़े हुए दिव्य रथोंपर आसीन हो यमराज के लोक में जाते अं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो नित्य पवित्र रहकर इन्द्रियों को वश में रखते हुए छठे दिन आहार ग्रहण करते हैं, वे साक्षात शचीपति इंद्र के समान ऐरावत की पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं | जो एक पक्षतक उपवास करके अन्न ग्रहण करते हैं, वे बाघों से जुड़े हुए विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | उससमय देवता और असुर उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं | जो जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे सूर्य के समान देदीप्यमान रथोपर बैठकर यमलोक की यात्रा करते हैं | जो स्त्री अथवा गौ की रक्षा के लिये युद्ध प्राणत्याग करता हैं, वह सूर्य के समान कान्तिमान शरीर धारण करके देवकन्याओंद्वारा सेवित हो धर्मनगर की यात्रा करता है |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो भगवान विष्णु में भक्ति रखते हुए जितेन्द्रियभाव से तीर्थों की यात्रा करते हैं, वे सुखदायक विमानों से सुशोभित हो उस भयंकर पथ की यात्रा करते हैं | जो श्रेष्ठ द्विज प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा भगवान का यजन करते हैं, वे तपाये हुए सुवर्णसदृश विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं | जो दूसरों को पीड़ा नहीं देते और भृत्यों का भरण-पोषण करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्ज्वल विमानोंपर बैठकर सुखसे यात्रा करते है |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो समस्त प्राणियों के प्रति क्षमाभाव रखते, सबको अभय देते, क्रोध, मोह और मद से मुक्त रहते तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे महान तेजसे सम्पन्न हो पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशमान विमानपर बैठकर यमराज की पूरी में जाते हैं | उससमय देवता और गन्धर्व उनकी सेवामे खड़े रहते हैं | जो सत्य और पवित्रता से युक्त रहकर कभी भी मांसाहार नही करते, वे बी धर्मराज के नगर में सुखसे ही यात्रा करते हैं | जो एक हजार गौओं का दान करता है और जो कभी मांस भक्षण नही करता, वे दोंनो समान हैं – यह बात पूर्वकाल में वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ साक्षात ब्रह्माजी ने कही थी |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩ब्राह्मणों ! सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य होता हैं और समस्त यज्ञों के अनुष्ठान से जिस फल की प्राप्ति होती हैं, वही या उसके समान फल मांस न खाने से भी प्राप्त होता हैं | इसप्रकार दान और व्रत में तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा पुरुष विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं, जहाँ सूर्यनंदन यम विराजमान रहते हैं | धार्मिक पुरुषों को देखकर यमराज स्वयं ही स्वागतपूर्वक उन्हें आसन देते और पाद्य, अर्घ्य तथा प्रिय वचनोंद्वारा उनका सम्मान करते हैं | वे कहते हैं – पुण्यात्मा पुरुषो ! आपलोग धन्य हैं | आप अपने आत्माका कल्याण करनेवाले महात्मा हैं, क्योंकि आपने दिव्य सुख के लिये शुभकर्मों का अनुष्ठान किया है | अब इस विमानपर बैठकर उस अनुपम स्वर्गलोक को जाइये, जहाँ समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं | वहाँ महान भोगो माँ उपभोग करके अंत में पुण्य क्षीण होनेपर जो थोडा अशुभ कर्म शेष रहेगा, उसका फल यहाँ आकर भोगियेगा |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩धर्मात्मा पुरुष अपने पुण्यों के प्रभाव से धर्मराज को कोमल ह्रदयवाले अपने पिता के तुल्य देखते हैं, इसलिये धर्म का सदा सेवन करना चाहिये | धर्म मोक्षरूप फल को देनेवाला हैं | धर्म से ही अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि बतायी गयी हैं | धर्म ही माता-पिता और भ्राता हैं, धर्म ही अपना रक्षक और सुह्रद हैं | स्वामी, सखा, पालक तथा धारण-पोषण करनेवाला धर्म ही हैं | धर्मसे अर्थ, अर्थ से काम और कामसे भोग एवं सुख उपलब्ध होते है | धर्म से ही ऐश्वर्य, एकाग्रता और उत्तम स्वर्गीय गति प्राप्त होती हैं | विप्रवरो ! धर्म का यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्य की महान भय से रक्षा करता हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि धर्म से देवत्त्व और ब्राह्मणत्त्व भी प्राप्त हो सकते हैं | जब मनुष्यों के पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं, तब उनकी बुद्धि इस लोक में धर्म की ओर लगती है |हजारों जन्मों के पश्चात दुर्लभ मनुष्य जीवन को पाकर जो धर्म का आचरण नहीं करता, वह निश्चय ही सौभाग्य से वंचित है | जो लोग कुत्सित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरों के सेवक और मुर्ख है, उन्होंने पूर्वजन्म में धर्म नहीं किया हैं – ऐसा जानना चाहिये | जो दीर्घायु, शूरवीर, पंडित, भोगसाधन से सम्पन्न, धनवान, नीरोग तथा रूपवान हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में अवश्य ही धर्म का अनुष्ठान किया है | ब्राह्मणों ! इसप्रकार धर्मपरायण मनुष्य उत्तम गति को प्राप्त होते हैं और अधर्म का सेवन करनेवाले लोग पशु-पक्षियों की योनि में जाते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩जो मनुष्य नरकासुर का विनाश करनेवाले भगवान वासुदेव के भक्त है, वे स्वप्न में भी यमराज अथवा नरकों को नहीं देखते | जो दैत्यों और दानवों का संहार करनेवाले आदि-अंतरहित भगवान नारायण को प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, वे भी यमराज को नहीं देखते | जो मन, वाणी और क्रिया के द्वारा भगवान अच्युत की शरण में चले गये हैं, उनपर यमराज का वश नही चलता | वे मोक्षरूप फल के भागी होते हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

🥦💎🍥🌙🌞🚩ब्राह्मणों ! जो मनुष्य प्रतिदिन जगन्नाथ श्रीनारायण को नमस्कार करते है, वे वैकुण्ठधाम के सिवा अन्यत्र नही जाते | श्रीविष्णु को नमस्कार करके मनुष्य यमदूतों को, यमलोक के मार्ग को, यमपुरी को तथा वहाँ के नरकों को किसीप्रकार नहीं देख पाते | मोह में पडकर अनेकों बार पाप कर लेनेपर भी यदि मानव सर्वपापहारी श्रीहरि को नमस्कार करते हैं तो वे नरक में नही पड़ते | जो लोग शठतासे भी सदा भगवान जनार्दन का स्मरण करते हैं, वे भी देहत्याग के पश्चात रोग-शोक से रहित श्रीविष्णुधाम को प्राप्त होते हैं | अत्यंत क्रोध में आसक्त होकर भी जो कभी श्रीहरि के नामों का कीर्तन करता हैं, वह भी चेदिराज शिशुपाल की भांति सम्पूर्ण दोषों का क्षय हो जानेसे मोक्ष को प्राप्त करता हैं |🥦💎🍥🌙🌞🚩

– नारायण नारायण –

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जिला फैजाबाद बाल कृष्ण मंदिर धार्मिक जय भगवान परशुराम की आप सभी भक्तजनों से हाथ जोड़कर विनती है प्रतिदिन हाजिरी जरूर लगाएं प्रेम से बोलिए राधे राधे और हमारा नंबर है संपर्क कर लीजिएगा☎ 85 2880 5193 आपका शुभचिंतक बृजलाल पासवान
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         🌹जय श्री कृष्ण🌹
         🌹Զเधे-Զเधे ...✍🌹

मददगार

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शिप्रा का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने शिप्रा पूरी बोगी घूम आई थी, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी । मन अनजाने भय से काँप सा गया ।
पहली बार अकेली सफर कर रही थी, इसलिये पहले से ही घबराई हुई थी। अतः खुद को सहज रखने के लिए चुपचाप अपनी सीट पर मैगज़ीन निकाल कर पढ़ने लगी ।
नवयुवकों का झुंड जो शायद किसी कैम्प जा रहे थे, के हँसी - मजाक , चुटकुले उसके हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे ।
शिप्रा के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे - धीरे उतरने लगी ।
सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने कहा --
" हेलो , मैं साकेत और आप ? "
भय से पीली पड़ चुकी शिप्रा ने कहा --" जी मैं ........."
"कोई बात नहीं , नाम मत बताइये । वैसे कहाँ जा रहीं हैं आप ?"
शिप्रा ने धीरे से कहा--"इलाहबाद"
"क्या इलाहाबाद... ?
वो तो मेरा नानी -घर है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं ।" खुश होते हुए साकेत ने कहा ।और फिर इलाहाबाद की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति हैं , उसके दोनों मामा सेना के उच्च अधिकारी हैं और ढेरों नई - पुरानी बातें ।
शिप्रा भी धीरे - धीरे सामान्य हो उसके बातों में रूचि लेती रही । शिप्रा रात भर साकेत का हाथ पकड़ के सोती रही
रात जैसे कुँवारी आई थी , वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई ।
सुबह शिप्रा ने कहा - " लीजिये मेरा पता रख लीजिए , कभी नानी घर आइये तो जरुर मिलने आइयेगा ।"
" कौन सा नानीघर बहन ? वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ - मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो पहले कभी इलाहबाद आया ही नहीं ।"
"क्या..... ?" -- चौंक उठी शिप्रा ।
"बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं, कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें । हम में ही तो पिता और भाई भी होते हैं ।"
कह कर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुरा उठा साकेत ।
शिप्रा साकेत को देखती रही जैसे कि कोई अपना भाई उससे विदा ले रहा हो शिप्रा की आँखें गीली हो चुकी थी
काश इस संसार मे सब ऐसे हो जाये
न कोई अत्याचार ,न व्यभिचार ,भय मुक्त समाज का स्वरूप हमारा देश,हमारा प्रदेश, हमारा शहर,हमारा गांव
जहाँ सभी बहन ,बेटियों,खुली हवा में सांस ले सकें
निर्भय होकर कहीं भी कभी भी आ जा सके जहाँ जर कोई एक दूसरे का मददगार हो I 💐💐💐💐

शनिवार, 2 जून 2018

देवराज इंद्र और महालक्ष्मी संवाद–

देवराज इंद्र और महालक्ष्मी संवाद– जिसमे देवी लक्ष्मी ने बताए थे लक्ष्मी कृपा के कारण !!
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महालक्ष्मी की कृपा पाने के लिए पूजन-पाठ के साथ ही कई और बातों का भी ध्यान रखना अनिवार्य है। यहां हम आपको आज महालक्ष्मी को प्रसन्न करने वाले खास उपाय बता रहे है जो की स्वयं लक्ष्मी ने देवराज इंद्र को बताए थे। महाभारत के शांति पर्व में देवराज इंद्र और महालक्ष्मी के संवाद दिए गए हैं। इन संवादों में बताया गया है कि कैसे काम करने वाले लोगों के घर लक्ष्मी निवास नहीं करती हैं। आज भी जिन घरों में इन बातों का ध्यान नहीं रखा जाता है, वहां दरिद्रता का वास होता है।

महाभारत में दिए गए प्रसंग के अनुसार एक समय जब देवी लक्ष्मी असुरों का साथ छोड़कर देवराज इंद्र के यहां निवास करने के लिए पहुंची थीं, तब इंद्र ने लक्ष्मी से पूछा था कि किन कारणों से आपने दैत्यों का साथ छोड़ दिया है? इस प्रश्न के जवाब में लक्ष्मी ने देवताओं के उत्थान तथा दानवों के पतन के कारण बताए थे।

लक्ष्मी ने बताया जो लोग व्रत-उपवास करते हैं। प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व बिस्तर का त्याग कर देते हैं, रात को सोते समय दही और सत्तू का सेवन नहीं करते हैं, सुबह-सुबह घी और पवित्र वस्तुओं का दर्शन किया करते हैं, दिन के समय कभी सोते नहीं हैं, इस सभी बातों का ध्यान रखने वाले लोगों के यहां लक्ष्मी सदैव निवास करती हैं। पूर्व काल में सभी दानव भी इन नियमों का पालन करते थे, इस कारण मैं उनके यहां निवास कर रही थी। अब सभी दानव अधर्मी हो गए हैं, इस कारण मैंने उनका त्याग कर दिया है।

इंद्र ने देवी लक्ष्मी से असुरों पर कृपा न करने का कारण पूछा।

महालक्ष्मी ने इंद्र को बताया कि जो पुरुष दानशील, बुद्धिमान, भक्त, सत्यवादी होते हैं, उनके घर में मेरा वास होता है। जो लोग ऐसे कर्म नहीं करते हैं, मैं उनके यहां निवास नहीं करती हूं।

लक्ष्मी कहती हैं कि पूर्व काल में मैं असुरों के राज्य में निवास करती थीं, लेकिन अब वहां अधर्म बढ़ने लगा है। इस कारण मैं देवताओं के यहां निवास करने आई हूं।

इंद्र के पूछने पर महालक्ष्मी ने कहा कि जो लोग धर्म का आचरण नहीं करते हैं। जो लोग पितरों का तर्पण नहीं करते हैं। जो लोग दान-पुण्य नहीं करते हैं, उनके यहां मेरा निवास नहीं होता है।

पूर्व काल में दैत्य दान, अध्ययन और यज्ञ किया करते थे, लेकिन अब वे पाप कर्मों में लिप्त हो गए हैं। अत: मैं उनके यहां निवास नहीं कर सकती।

महाभारत में महालक्ष्मी ने बताया है कि जहां मूर्खों का आदर होता है, वहां उनका निवास नहीं होता। जिन घरों में स्त्रियां दुराचारिणी यानी बुरे चरित्र वाली हो जाती हैं, जहां स्त्रियां उचित ढंग से उठने-बैठने के नियम नहीं अपनाती हैं, जहां स्त्रियां साफ-सफाई नहीं रखती हैं, वहां लक्ष्मी का निवास नहीं होता है।

देवी लक्ष्मी ने बताया कि वह स्वयं धनलक्ष्मी, भूति, श्री, श्रद्धा, मेधा, संनति, विजिति, स्थिति, धृति, सिद्धि, समृद्धि, स्वाहा, स्वधा, नियति तथा स्मृति हैं। धर्मशील पुरुषों के देश में, नगर में, घर में हमेशा निवास करती हैं।

लक्ष्मी उन्हीं लोगों पर कृपा बरसाती हैं जो युद्ध में पीठ दिखाकर नहीं भागते हैं। शत्रुओं को बाहुबल से पराजित कर देते हैं। शूरवीर लोगों से लक्ष्मी सदैव प्रसन्न रहती हैं।

जिन घरों में खाना बनाते समय पवित्रता का ध्यान नहीं रखा जाता है, जहां जूठे हाथों से ही घी को छू लिया जाता है, वहां मैं निवास नहीं करती हूं।

लक्ष्मी ने बताया जिन घरों में बहु अपने सास-ससुर पर नौकरों के समान हुकुम चलाती है, उन्हें कष्ट देती हैं, अनादर करती है, मैं उन घरों का त्याग कर देती हूं।

जिस घर में पत्नी अपने पति को प्रताडि़त करती है, पति की आज्ञा का पालन नहीं करती है, पति के अतिरिक्त अन्य पुरुषों से अनैतिक संबंध रखती है, मैं उन घरों का त्याग कर देती हूं।

जो लोग अपने शुभ चिंतकों के नुकसान पर हंसते हैं, उनसे मन ही मन द्वेष भाव रखते हैं, किसी मित्र बनाकर उसका अहित करते हैं तो मैं उन लोगों पर कृपा नहीं बरसाती हूं। ऐसे लोग सदैव दरिद्र रहते हैं।

भविष्य वर्णन





हिन्दू शास्त्रों के अनुसार अनिश्चित भविष्य के बीच एक निश्‍चित या तय भविष्य की रेखा चलती रहती है अर्थात भविष्य में कुछ घटनाओं का घटना तय है तो कुछ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जाता सकता। भविष्य का निर्माण एक व्यक्ति, समूह या संगठन पर ही निर्भर नहीं है बल्कि इसमें प्राकृतिक तत्वों का भी योगदान रहता है।

संभावनाएं अनंत हैं, लेकिन कुछ संभावनाओं के बारे में पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है।

श्रीकृष्ण ने कहा था- ऐसा होगा कलियुग
भारत में पैदा होगा दुनिया का 'मुक्तिदाता'

आप नीचे खड़े हैं तो यह नहीं देख पा रहे हैं कि 10 मिनट बाद आपके क्षेत्र में बारिश होने वाली है, लेकिन यदि आप किसी ऊंचे स्थान पर खड़े हैं तो आप दूर कहीं हो रही बारिश को देखकर नीचे खड़े लोगों से कह सकते हैं कि 10 मिनट बाद बारिश होने वाली है, फिर वे चाहे आपकी बातों पर विश्‍वास करें या न करें। 10 मिनट बाद ही उन्हें इसकी सचाई का पता चलेगा। इसी तरह भविष्य देखने वाले कहीं ओर खड़े हैं और हम सब नीचे... संभावनाएं अनंत हैं और उन्हीं अनंत संभावनाओं में से किसी एक संभावना को पकड़कर कोई भविष्यवाणी करता है। यहां हम इस बार लाए हैं हिन्दू पुराणों में वर्णित कुछ ऐसी भविष्यवाणियां जिन्हें जानकर आप आश्‍चर्य में पड़ जाएंगे।

पहली भविष्यवाणी...

दाम्पत्येभिरुचिहेतमायैव व्यावहारके।
स्त्रीत्वे पुंस्तवे च हि रितर्विप्रत्वे सूत्रमेव हि।।

* संबंध होगा मात्र समझौता :भागवत पुराण के अनुसार कलयुग में विवाह बस एक समझौता होगा दो लोगों के बीच। इस युग में पुरुष और स्त्री साथ-साथ रहेंगे और व्यापार में सफलता छल पर निर्भर रहेगी। शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही महिला-पुरुष एक-दूसरे के साथ रहेंगे। पुरुषत्व का अर्थ सिर्फ पुरुष की संभोग शक्ति से जोड़कर ही देखा जाएगा। महिलाएं बेहद कड़वा बोलने लगेंगी और उनके चरित्र में नकारात्मकता घर चुकी होगी। उनके ऊपर न तो पिता का और न ही पति का जोर होगा।

वर्तमान में लिव-इन-रिलेशनशिप, समलैंगिक विवाह, जातिवाद, शराबखोरी, सिगरेट का प्रचलन, मिथ्‍या प्रेम-विवाह, दहेज प्रकरण, भ्रूण हत्या, कंडोम का प्रचलन और इसी तरह की तमाम बुराइयां उपरोक्त भविष्यवाणी को सच साबित करती हैं।

दूसरी भविष्यवाणी...

वित्तमेव कलौ नृणां जन्माचारगुणोदय:।
धर्मन्यायव्यवस्थायां कारणं बलमेव हि।।
लिड्गमेवाक्षमख्‍यातावनेयोन्यापत्तिकारणम।
अवृत्तया न्यायदौर्बल्यं पाडिण्त्ये चापलं वच:।।

* धन ही होगा सब कुछ :श्रीमद् भागवत पुराण में किए गए कलयुग के वर्णन में कहा गया है कि इस युग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा वो अधर्मी, अपवित्र और बेकार माना जाएगा और जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा वो उतना गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर लागू किया जाएगा। व्यक्ति के अच्छे कुल की पहचान सिर्फ धन के आधार पर ही होगी। धन के लिए वे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों का रक्त बहाने में भी हिचक नहीं महसूस करेंगे।

अनढयतैवासाधुत्वे साधुत्वे दम्भ एव तु।
स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधन्म।।

श्रीमद् भागवत पुराण में किए गए कलयुग के वर्णन में कहा गया है कि इस युग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा वो अधर्मी, अपवित्र और बेकार माना जाएगा और जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा वो उतना गुणी माना जाएगा।

श्रीमद् भागवत के श्लोक 12.2.21 से 12.3.42 तक कलयुग का वर्णन मिलता है। आगे के पन्नों पर हम इसी बारे में बताएंगे।

तीसरी भविष्यवाणी...

दरे वार्ययनं तीर्थ लावण्यं केशधारणम।
उदरंभरता स्वार्थ सत्य्त्वे धाष्टर्यमेव हि।।
दाक्ष्यम कुटुम्बभरणं यशाड्थे धर्मसेवनम्।
एवं प्राजाभिर्दुभिराकीर्णों क्षितिमण्डले।।

* लोग झूठे, मांसभक्षी और भ्रष्ट होंगे :पृथ्वी भ्रष्ट लोगों से भर जाएगी और लोग सत्ता हासिल करने के लिए एक-दूसरे को मारेंगे। इन्हीं भ्रष्ट लोगों में से जो सबसे अधिक ताकतवर होगा, वही सत्ता को हथिया लेगा। जो व्यक्ति बहुत चालाक और स्वार्थी होगा, वो इस युग में बहुत विद्वान माना जाएगा। मनुष्य की सुंदरता उसके बालों से होगी। पेट भरना लोगों का लक्ष्य हो जाएगा।

नहीं बचेगी गाय :भागवत पुराण के अनुसार कलियुग की समाप्ति से पहले लोग सिर्फ और सिर्फ मछली खाकर और बकरी का दूध पीकर ही जीवन व्यतीत करेंगे, क्योंकि धरती पर एक भी गाय नहीं बचेगी।

चौथी भविष्यवाणी...

क्षित्तृड्भ्या व्याधिभिश्चैव सन्तप्स्यन्ते च चिन्चया।
त्रिंशद्विंशतिवर्षाणि परमायु: कलौ नृणाम।।

* घट जाएगी लोगों की आयु: कलियुग में व्यक्ति की अधिकतम आयु मात्र 50 वर्ष रह जाएगी और वे अपने बुजुर्गों की रक्षा या देखभाल नहीं कर पाएंगे। भविष्य में एक सामान्य व्यक्ति की उम्र मात्र 16 वर्ष रहेगी और 7-8 वर्ष की उम्र में लड़कियां गर्भधारण करने लगेंगी। धरती पर एक भी धार्मिक स्थल नहीं होगा और तारों की रोशनी भी कम पड़ती जाएगी। ऐसे हालातों में जन्म लेगा विष्णु का अगला और आखिरी अवतार ‘कल्कि’।

पांचवीं भविष्यवाणी...

अनावृष्टया व्याधिभिश्चैव सन्तप्स्यन्ते च चिन्या।
शीतवीतीवपप्रावृड्‍हिमैरन्योन्यत: प्रजा:।।
आत्छिन्नदारद्रविणा याय्स्न्ति गिरिकाननम।
शाकमूलामिषक्षौद्रफलपुष्पाष्टिभोजना:।।

* बदल जाएगा धरती का मौसम :अकाल और अत्यधिक करों द्वारा परेशान लोग पत्ते, जड़, मांस, जंगली शहद, फल, फूल और बीज खाने को मजबूर हो जाएंगे। भयंकर सूखा पड़ेगा। ठंड, हवा, गर्मी, बारिश और बर्फ- ये सब लोगों को बहुत परेशान करेंगे।

महाभारत में कलियुग के अंत में प्रलय होने का जिक्र है, लेकिन यह किसी जलप्रलय से नहीं बल्कि धरती पर लगातार बढ़ रही गर्मी से होगा। महाभारत के वन पर्व में उल्लेख मिलता है कि सूर्य का तेज इतना बढ़ जाएगा कि सातों समुद्र और नदियां सूख जाएंगी। संवर्तक नाम की अग्रि धरती को पाताल तक भस्म कर देगी। वर्षा पूरी तरह बंद हो जाएगी। सबकुछ जल जाएगा, इसके बाद फिर 12 वर्षों तक लगातार बारिश होगी जिससे सारी धरती जलमग्न हो जाएगी।

छठी भविष्यवाणी...

ततश्चनुदिनं धर्म: सत्यं शौचं क्षमा दया।
कालेन बलिना राजन् नड्क्षय्यायुर्बलं स्मृति:।।

वैदिक धर्म का होगा पतन :कलयुग में धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवन की अवधि, शारीरिक शक्ति और स्मृति सभी दिन-ब-दिन घटती जाएगी। लोग बस स्नान करके समझेंगे कि वे अंतरात्मा से भी साफ-सुथरे हो गए हैं।

धरती पर रहने वाला कोई व्यक्ति किसी भी तरह से वैदिक और धार्मिक कार्यों में रुचि नहीं लेगा, वह एक स्वच्छंद जीवन व्यतीत करेगा। कलयुग में वे लोग सिर्फ एक धागा पहनकर अपने को ब्राह्मण होने का दावा करेंगे।

'अपनी तुच्छ बुद्धि को ही शाश्वत समझकर कुछ मूर्ख ईश्वर की तथा धर्मग्रंथों की प्रामाणिकता मांगने का दुस्साहस करेंगे। इसका अर्थ है कि उनके पाप जोर मार रहे हैं।'

'ज्यों-ज्यों घोर कलयुग आता जाएगा त्यों-त्यों सौराष्ट्र, अवन्ती, अधीर, शूर, अर्बुद और मालव देश के ब्राह्मणगण संस्कारशून्य हो जाएंगे तथा राजा लोग भी शूद्रतुल्य हो जाएंगे।'

यहां 'शूद्र' का मतलब उस आचरण से है, जो वेद विरुद्ध है। मांस, मदिरा और संभोगादि प्रवृत्ति में ही सदा रत रहने वाले राक्षसधर्मी को 'शूद्र' कहा गया है। जो ब्रह्म को मानने वाले हैं वही ब्राह्मण हैं। आज की जनता ब्रह्म को छोड़कर सभी को पूजने लगी है। जब सभी वेदों को छोड़कर संस्कारशून्य हो जाएंगे, तब क्या होगा पढ़ें अगले पन्ने पर...

सातवीं भविष्यवाणी...

म्लेच्छों का राज होगा :हालांकि ऐसा तो पिछले सैकड़ों वर्षों से हैं। श्रीमद्मभागवत पुराणानुसार... 'सिंधु तट, चंद्रभाग का तटवर्ती प्रदेश, कौन्तीपुरी और कश्मीर मंडल पर प्राय: शूद्रों का संस्कार ब्रह्म तेज से हीन नाममा‍त्र के द्विजों का और म्लेच्छों का राज होगा। सबके सब राजा (राजनेता) आचार-विचार में म्लेच्छप्राय होंगे। वे सब एक ही समय में भिन्न-भिन्न प्रांतों में राज करेंगे।' उल्लेखनीय है कि यहां सिर्फ सिंधु नदी के तट की ही बात है।

प्राचीनकाल में 'म्लेच्छ' उसे कहते थे, जो हिन्दुकुश पर्वत के उस पार रहता था और जिसने घुसपैठ करके अफगानिस्तान के बहुत बड़े इलाके को अपने अधीन कर लिया था। आजकल लोग म्लेच्छ का अर्थ गलत निकालते हैं। इन लोगों का धर्म कुछ भी हो लेकिन ये जाति से सभी म्लेच्छ हैं।

आप जानते हैं कि सिन्धु के ज्यादातर तटवर्ती इलाके अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गए हैं। कुछ कश्मीर में हैं, जहां नाममात्र के द्विज अर्थात ब्राह्मण हैं। इन सभी (म्लेच्छों) के बारे में पुराणों में लिखा है कि... 'ये सबके सब परले सिरे के झूठे, अधार्मिक और स्वल्प दान करने वाले होंगे। छोटी बातों को लेकर ही ये क्रोध के मारे आग-बबूला हो जाएंगे।'

अब आगे पढ़िए कश्मीर में ब्राह्मणों के साथ जो हुआ, 'ये दुष्ट लोग स्त्री, बच्चों, गौओं और ब्राह्मणों को मारने में भी नहीं हिचकेंगे। दूसरे की स्त्री और धन हथिया लेने में ये सदा उत्सुक रहेंगे। न तो इन्हें बढ़ते देर लगेगी और न घटते। इनकी शक्ति और आयु थोड़ी होगी। राजा के वेश में ये म्लेच्‍छ ही होंगे।'

'राजा के वेश में ये म्लेच्छ होंगे' का अर्थ है कि ऐसे लोग सत्ता में होंगे जिनका अपना कोई धर्म नहीं होगा। उनका धर्म सिर्फ सत्ता ही होगा। पूरे देश की यही हालत है। अब राजा (राजनेता) न तो क्षत्रित्व धारण करने वाले रहे और न ही ब्राह्मणत्व। यह शब्द जातिसूचक नहीं है।

राजधर्म तो लगभग समाप्त ही हो गया है तो ऐसी स्थिति में, 'वे लूट-खसोटकर अपनी प्रजा का खून चूसेंगे। जब ऐसा शासन होगा तो देश की प्रजा में भी वैसा ही स्वभाव, आचरण, भाषण की वृद्धि हो जाएगी। राजा लोग तो उनका शोषण करेंगे ही, आपस में वे भी एक-दूसरे को उत्पीड़ित करेंगे और अंतत: सबके सब नष्ट हो जाएंगे।' भागवत पुराण (अध्याय 'कलयुग की वंशावली' से अंश)

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने कहा 'हे नारद! भयंकर कलियुग के आने पर मनुष्य का आचरण दुष्ट हो जाएगा और योगी भी दुष्ट चित्त वाले होंगे। संसार में परस्पर विरोध फैल जाएगा। द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) दुष्ट कर्म करने वाले होंगे और विशेषकर राजाओं में चरित्रहीनता आ जाएगी। देश-देश और गांव-गांव में कष्ट बढ़ जाएंगे। संतजन दुःखी होंगे। अपने धर्म को छोड़कर लोग दूसरे धर्म का आश्रय लेंगे। देवताओं का देवत्व भी नष्ट हो जाएगा और उनका आशीर्वाद भी नहीं रहेगा। मनुष्यों की बुद्धि धर्म से विपरीत हो जाएगी और पृथ्वी पर म्लेच्छों के राज्य का विस्तार हो जाएगा।'

आठवीं भविष्यवाणी...

गंगा और उसके तीर्थ लुप्त हो जाएंगे :कहते हैं कि गंगा नदी, केदारनाथ, बद्रीनाथ सहित सभी प्रमुख तीर्थ लुप्त हो जाएंगे और भविष्य में 'भविष्यबद्री' नाम का एक नया तीर्थ ही रहेगा। बद्रीनाथ की कथा के अनुसार सतयुग में देवताओं, ऋषि-मुनियों एवं साधारण मनुष्यों को भी भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन प्राप्त होते थे। इसके बाद आया त्रेतायुग। इस युग में भगवान सिर्फ देवताओं और ऋषियों को ही दर्शन देते थे, लेकिन द्वापर में भगवान विलीन ही हो गए। इनके स्थान पर एक विग्रह प्रकट हुआ। ऋषि-मुनियों और मनुष्यों को साधारण विग्रह से संतुष्ट होना पड़ा।

तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते।
जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने।।
दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च।
केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:।। शिवपुराण

शास्त्रों के अनुसार सतयुग से लेकर द्वापर तक पाप का स्तर बढ़ता गया और भगवान के दर्शन दुर्लभ हो गए। द्वापर के बाद आया कलियुग, जो वर्तमान का युग है।

नृसिंह भगवान की मूर्ति: अब बद्रीनाथ में नहीं होंगे भगवान के दर्शन, क्योंकि मान्यता के अनुसार जोशीमठ में स्थित नृसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल-दर-साल पतला होता जा रहा है।

भविष्यवाणी :माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा। भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों के अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।

पुराणों में बद्री-केदारनाथ के रूठने का जिक्र मिलता है। पुराणों के अनुसार कलियुग के 5,000 वर्ष बीत जाने के बाद पृथ्‍वी पर पाप का साम्राज्य होगा। कलियुग अपने चरम पर होगा तब लोगों की आस्था लोभ, लालच और काम पर आधारित होगी। सच्चे भक्तों की कमी हो जाएगी। ढोंगी और पाखंडी भक्तों और साधुओं का बोलबाला होगा। ढोंगी संतजन धर्म की गलत व्याख्‍या कर समाज को दिशाहीन कर देंगे, तब इसका परिणाम यह होगा कि धरती पर मनुष्यों के पाप को धोने वाली गंगा स्वर्ग लौट जाएगी।

नौवीं भविष्यवाणी...

कल्कि अवतार जन्म लेगा: 'भविष्य दीपिका' ग्रंथ के अनुसार शाक शालिवाहन के 1600 वर्ष व्यतीत हो जाने पर (विक्रम संवत् 1738) संपूर्ण जीवों के उद्धार के लिए इस ब्रह्मांड में 'कल्कि' का आगमन होगा। (अध्याय-3)

पद्मावती और केन नदी के मध्य विंध्याचल पर्वत के एक क्षेत्र में इन्द्रावती नामक परब्रह्म की आत्मा होगी। उनके अंदर परब्रह्म सच्चिदानंद विराजमान होकर पूर्ण ब्रह्म कहलाएंगे। वे प्राणियों का उद्धार करेंगे।

कल्कि पुराण हिन्दुओं के विभिन्न धार्मिक एवं पौराणिक ग्रंथों में से एक है। यह एक उपपुराण है। इस पुराण में भगवान विष्णु के 10वें तथा अंतिम अवतार की भविष्यवाणी की गई है और कहा गया है कि विष्णु का अगला अवतार (महा अवतार) 'कल्कि' अवतार होगा। इसके अनुसार 4,320वीं शती में कलियुग के अंत के समय में कल्कि अवतार लेंगे।

कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि का जन्म मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश) के संभल जिले में होगा। वह अपने अभिभावकों की 5वीं संतान होगा और उसके पिता का नाम विष्णुयश अथवा माता का नाम सुमति होगा। कल्कि के भीतर दैवीय शक्तियां होंगी। सामान्य तौर पर वह बेहद खूबसूरत और श्वेत होगा लेकिन उसका क्रोधी रूप बेहद डरावना हो जाएगा। कल्कि बेहद बुद्धिमान और साहसी युवक होगा जिसके सोचने भर से ही अस्त्र-शस्त्र और वाहन उसके समक्ष उपस्थित होंगे। कल्कि सभी बुराइयों और बुरे व्यक्तियों का नाश कर पुन: सतयुग की स्थापना करेगा।

दसवीं भविष्यवाणी...

स्वर्ण युग होगा: ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण गंगा को बताते हैं कि कलियुग में एक स्वर्ण युग होगा जिसकी शुरुआत कलियुग के 5,000 वर्ष बाद होगी और यह सुनहरा युग अगले 10,000 वर्ष तक चलेगा। यह भविष्यवाणी भारत के संदर्भ में नहीं, बल्कि संपूर्ण धरती के संदर्भ में है। कलयुग के 5,000 वर्ष बीत चुके हैं और अब सभी ओर राजनीतिक शुद्धता और तकनीकी का युग शुरू हो चुका है। हर देश में क्रांति और आंदोलन हो रहे हैं। अब झूठ और फरेब ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा।

ईसा मसीह के 3,114 वर्ष पूर्व कलियुग की शुरुआत हुई थी। आज इसके 5,130 वर्ष बीत चुके हैं। 130 वर्ष पहले ही विश्व में औद्योगिक क्रांति के परिणाम निकलने शुरू हुए थे। निश्चित ही पिछले 100-200 वर्षों से संपूर्ण दुनिया में परिवर्तन का युग चल रहा है। मानव आज अंतरिक्ष में रहने लगा है और भविष्य में वह किसी अन्य ग्रह पर रहने भी लगेगा।

ग्यारहवीं भविष्यवाणी...

नष्ट हो जाएगी इस्लाम की कट्टरपंथी धारा :भविष्य पुराण में भारत के राजवंशों और भारत पर शासन करने वाले विदेशियों के बारे में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस पुराण के संबंध में कहा जाता है कि यह हर्षवर्धन के काल में लिखा गया हो सकता है अर्थात सन् 600 ईस्वी में। लेकिन कुछ विद्वान मानते हैं कि यह तो वेदव्यास की रचना है, जो 3,000 ईसा पूर्व हुए थे। खैर..

इस पुराण में द्वापर और कलियुग के राजा तथा उनकी भाषाओं के साथ-साथ विक्रम-बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्यनारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गई है। इस पुराण में ऐतिहासिक व आधुनिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। इसमें ईसा मसीह का जन्म, उनकी भारत-यात्रा, मुहम्मद साहब के अरब में आविर्भाव का वर्णन भी मिलता है। आल्हा-उदल के इतिहास का प्रसिद्ध आख्यान इसी पुराण के आधार पर प्रचलित है।

इस पुराण में नंद वंश, मौर्य वंश एवं शंकराचार्य आदि के साथ-साथ इसमें मध्यकालीन हर्षवर्धन आदि हिन्दू और बौद्ध राजाओं तथा चौहान एवं परमार वंश के राजाओं तक का वर्णन प्राप्त होता है। इसमें तैमूर, बाबर, हुमायूं, अकबर, औरंगजेब, पृथ्वीराज चौहान तथा छत्रपति शिवाजी के बारे में भी स्पष्‍ट उल्लेख मिलता है।

सन्‌ 1857 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के भारत की साम्राज्ञी बनने और आंग्ल भाषा के प्रसार से भारतीय भाषा संस्कृत के विलुप्त होने की भविष्यवाणी भी इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से की गई है। इसी पुराण का निम्न श्लोक हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जो प्रतिसर्ग पर्व में वर्णित है। श्रीमद्भागवत पुराण के द्वादश स्कंध के प्रथम अध्याय में भी वंशों का वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ के श्लोक को हम यहां यथावत उल्लेख कर रहे हैं लेकिन हम यह दावा नहीं करते कि संस्कृत के इस श्लोक की व्याख्‍या वहीं है तो कि श्लोक में है।

लिंड्गच्छेदी शिखाहीन: श्मश्रुधारी सदूषक:।
उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनोमम।।25।।
विना कौलं च पश्वस्तेषां भक्ष्या मतामम।
मुसलेनैव संस्कार: कुशैरिव भविष्यति ।।26।।
तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषका:।
इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृत:।। 27।। : (भविष्य पुराण पर्व 3, खंड 3, अध्याय 1, श्लोक 25, 26, 27)

व्याख्‍या : रेगिस्तान की धरती पर एक 'पिशाच' जन्म लेगा जिसका नाम महामद होगा, वो एक ऐसे धर्म की नींव रखेगा जिसके कारण मानव जाति त्राहिमाम् कर उठेगी। वो असुर कुल सभी मानवों को समाप्त करने की चेष्टा करेगा। उस धर्म के लोग अपने लिंग के अग्रभाग को जन्म लेते ही काटेंगे, उनकी शिखा (चोटी) नहीं होगी, वो दाढ़ी रखेंगे, पर मूंछ नहीं रखेंगे। वो बहुत शोर करेंगे और मानव जाति का नाश करने की चेष्टा करेंगे। राक्षस जाति को बढ़ावा देंगे एवं वे अपने को 'मुसलमान' कहेंगे और ये असुर धर्म कालांतर में स्वत: समाप्त हो जाएगा।

भविष्य पुराण में भविष्य में होने वाली घटनाओं का वर्णन है। भविष्य पुराण के अनुसार इसके श्लोकों की संख्या 50,000 के लगभग होनी चाहिए, परंतु वर्तमान में कुल 14,000 श्लोक ही उपलब्ध हैं। यह पुराण ब्रह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग तथा उत्तर इन 4 प्रमुख पर्वों में विभक्त है। ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन प्रतिसर्ग पर्व में वर्णित है। यह पुराण भारतवर्ष के वर्तमान समस्त आधुनिक इतिहास का आधार है। इसके प्रतिसर्ग पर्व के तृतीय तथा चतुर्थ खंड में इतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री विद्यमान है। इतिहास लेखकों ने प्राय: इसी का आधार लिया है।


हिन्दू शास्त्रों के अनुसार अनिश्चित भविष्य के बीच एक निश्‍चित या तय भविष्य की रेखा चलती रहती है अर्थात भविष्य में कुछ घटनाओं का घटना तय है तो कुछ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जाता सकता। भविष्य का निर्माण एक व्यक्ति, समूह या संगठन पर ही निर्भर नहीं है बल्कि इसमें प्राकृतिक तत्वों का भी योगदान रहता है। संभावनाएं अनंत हैं, लेकिन कुछ संभावनाओं के बारे में पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है।

हिन्दू पुराणों में कलयुग के वर्णन के साथ ही वर्तमान युग के बारे में भी विस्तार से मिलता है। जहां तक भविष्यवाणी का संबंध है जो कहा जाता है कि भविष्य पुराण में वर्तमान युग के बारे में भविष्यवाणियां मिलती है। भविष्य पुराण में भविष्य में होने वाली घटनाओं का वर्णन है। भविष्य पुराण के अनुसार इसके श्लोकों की संख्या 50,000 के लगभग होनी चाहिए, परंतु वर्तमान में कुल 14,000 श्लोक ही उपलब्ध हैं।

भारतीय प्राच्य विद्या के विद्वानों के अनुसार भविष्य पुराण में मूलतः पचास हजार श्लोक विद्यमान थे, परन्तु श्रव्य परम्परा पर निर्भरता और अभिलेखों के लगातार विनष्टीकरण के परिणामस्वरूप वर्तमान में केवल 129 अध्याय और अठ्ठाइस हजार श्लोक ही उपलब्ध रह गए हैं। स्पष्ट है कि अभी भी दुनिया उन अद्‍भुत एवं विलक्षण घटनाओं और ज्ञान से पूर्णतया अनभिज्ञ हैं, जो इस पुराण के विलुप्त आधे भाग में वर्णित रही होंगी।

यह पुराण ब्रह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग तथा उत्तर- इन 4 प्रमुख पर्वों में विभक्त है। ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन प्रतिसर्ग पर्व में वर्णित है। यह पुराण भारतवर्ष के वर्तमान समस्त आधुनिक इतिहास का आधार है। इसके प्रतिसर्ग पर्व के तृतीय तथा चतुर्थ खंड में इतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री विद्यमान है। इतिहास लेखकों ने प्राय: इसी का आधार लिया है।

भविष्य पुराण में भारत के राजवंशों और भारत पर शासन करने वाले विदेशियों के बारे में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस पुराण के संबंध में कहा जाता है कि कलियुगीन राजाओं की पुराणों में प्राप्त बहुतसारी जानकारी सर्वप्रथम ‘भविष्य पुराण ’ में ग्रंथित की गयी थी, जिसकी रचना दूसरी शताब्दी के पश्चात् मगध देश में पाली अथवा अर्धमागधी भाषा में, एवं खरोष्ट्री लिपि में दी गयी थी।

भविष्य पुराण के इस सर्वप्रथम संस्करण की रचना आंध्र राजा शातकर्णि के राज्यकाल में (द्वितीय शताब्दी का अंत) की गयी थी। भविष्यपुराण के इस आद्य संस्करण में तत्कालीन सूत एवं मगध लोगों में प्रचलित राजवंशों के सारे इतिहास की जानकारी ग्रथित की गयी थी। हालांकि यह पुराण 5 हजार वर्ष पूर्व ऋषि वेद व्यास द्वारा लिखे जाने का उल्लेख मिलता है जिसका समय समय पर नवीनतम संस्करण निकलते रहे हैं।

ईसा मसीह के बारे में :इस पुराण में ईसा मसीह का जन्म, उनकी हिमालय यात्रा और तत्कालीन सम्राट शालिवाहन से भेंट के बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं, जिसे आधुनिक रिसर्च के बाद प्रमाणित भी किया जा चुका है।

भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के तृ‍तीय खंड के द्वितीय अध्याय के श्लोक में तक ऐसा ही उल्लेख है जिसमें ईसा मसीह के लंबे समय तक भारत के उत्तराखंड में निवास करने और तपस्यारत रहने का वर्णन है। उस समय उत्तरी भारत में शालिवाहन का शासन था। एक दिन वे हिमालय गए जहां लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों पर उन्होंने एक गौरवर्ण दिव्य पुरुष को ध्यानमग्न अवस्था में तपस्या करते हुए देखा। समीप जाकर उन्होंने उनसे पूछा-आपका नाम क्या है और आप कहां से आए हैं?

उस पुरुष ने उत्तर दिया- ‘मेरा नाम ईसा मसीह है। कुंवारी मां के गर्भ से उत्पन्न हुआ हूं। विदेश से आया हूं जहां बुराइयों का अंत नहीं है। उन आस्थाहीनों के बीच मैं मसीहा के रूप में प्रकट हुआ हूं। जैसे कि ‘म्लेच्छदेश मसीहो हं समागत।।..... ईसा मसीह इति च ममनाम प्रतिष्ठितम् ।।

कलयुग का वर्णन : -----
''रविवारे च सण्डे च फाल्गुनी चैव फरवरी। षष्टीश्च सिस्कटी ज्ञेया तदुदाहार वृद्धिश्म्।।''
अर्थात भविष्य में अर्थात आंग्ल युग में जब देववाणी संस्कृत भाषा लोपित हो जाएगी, तब रविवार को ‘सण्डे’, फाल्गुन महीने को ‘फरवरी’ और षष्टी को सिक्स कहा जाएगा।

भविष्यपुराण में बताया गया है कि कलयुग में लोगों के दिलों में छल होगा और अपनों के लिए भी लोगों के दिलों में जहर भरा होगा। अपनों का भी बुरा करने से कलयुग के लोग घबराया नहीं करेंगे। दूसरों का भी हक़ खाने की आदत लोगों को हो जाएगी और चारों तरफ लूट ही लूट होगी।

कलयुग में हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज का अहंकार होगा और वह खुद को इसलिए दूसरों से ऊपर समझने का काम करेगा। अहंकार की वजह से कलयुग में टकराव बढ़ जाएगा और यही वजह इन्सान के अंत की भी वजह रहेगी। भविष्यपुराण में साफ बताया गया है कि कलयुग में पैसा ही सबका बाप होगा। पैसे की चाहत इतनी मनुष्य को हो जाएगी कि वह पैसे के लिए किसी की जान तक ले लिया करेगा।

ब्रह्मा जी ने कहा-हे नारद! भयंकर कलियुग के आने पर मनुष्य का आचरण दुष्ट हो जाएगा और योगी भी दुष्ट चित्त वाले होंगे। संसार में परस्पर विरोध फैल जाएगा। द्विज (ब्राह्मण) दुष्ट कर्म करने वाले होंगे और विशेषकर राजाओं में चरित्रहीनता आ जाएगी। देश-देश और गांव-गांव में कष्ट बढ़ जाएंगे। साधू लोग दुःखी होंगे। अपने धर्म को छोड़कर लोग दूसरे धर्म का आश्रय लेंगे। देवताओं का देवत्व भी नष्ट हो जाएगा और उनका आशीर्वाद भी नहीं रहेगा। मनुष्यों की बुद्धि धर्म से विपरीत हो जाएगी और पृथ्वी पर मलेच्छों के राज्य का विस्तार हो जाएगा। मलेच्छ का अर्थ होता है दुष्ट, नीच और अनार्य।

जब हिन्दू तथा मुसलमानों में परस्पर विरोध होगा और औरंगजेब का राज्य होगा, तब विक्रम सम्वत् १७३८ का समय होगा। उस समय अक्षर ब्रह्म से भी परे सच्चिदानन्द परब्रह्म की शक्ति भारतवर्ष में इन्द्रावती आत्मा के अन्दर विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक स्वरूप में प्रकट होगी। वह चित्रकूट के रमणीय वन के क्षेत्र (पद्मावतीपुरी पन्ना) में प्रकट होंगे। वे वर्णाश्रम धर्म (निजानन्द) की रक्षा तथा मंदिरों की स्थापना कर संसार को प्रसन्न करेंगे। वे सबकी आत्मा, विश्व ज्योति पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं। म्लेच्छों का नाश करने वाले बुद्ध ही होंगे और श्री विजयाभिनन्द नाम से संसार में प्रसिद्ध होंगे। (उ.ख.अ. ७२ ब्रह्म प्र.)

वह परब्रह्म पुरुष निष्कलंक दिव्य घोड़े पर (श्री इन्द्रावती जी की आत्मा पर) बैठकर, निज बुद्धि की ज्ञान रूपी तलवार से इश्क बन्दगी रूपी कवच और सत्य रूपी ढाल से युक्त होकर, अज्ञान रूपी म्लेच्छों के अहंकार को मारकर सबको जागृत बुद्धि का ज्ञान देकर अखण्ड करेंगे। (प्र. ३ ब. २६ श्लोक १)

नष्ट हो जाएगी इस्लाम की कट्टरपंथी धारा : - इसी पुराण का निम्न श्लोक हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जो प्रतिसर्ग पर्व में वर्णित है। इस ग्रंथ के श्लोक को हम यहां यथावत उल्लेख कर रहे हैं लेकिन हम यह दावा नहीं करते कि संस्कृत के इस श्लोक की व्याख्‍या वहीं है तो कि श्लोक में है।

भविष्य पुराण पर्व 3, खंड 3, अध्याय 3 और मंत्र 5 से 8 तक इस बारे में उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण, द्वितिय खंड, प्रतिसर्ग अध्याय 3, अनुवादक पंडित बाबूराव उपाध्याय, मुद्रक मनोज आफसेट 255 चक जीरो रोड़ इलाहाबाद और प्रकाशक हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, 12 सम्मेलन मार्ग इलाहाबाद से प्रकाशित पुस्तक के पृष्ठ नंबर 258 पर इसका जिक्र है।

लिंड्गच्छेदी शिखाहीन: श्मश्रुधारी सदूषक:।
उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनोमम।।25।।
विना कौलं च पश्वस्तेषां भक्ष्या मतामम।
मुसलेनैव संस्कार: कुशैरिव भविष्यति ।।26।।
तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषका:।
इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृत:।। 27।। : (भविष्य पुराण पर्व 3, खंड 3, अध्याय 1, श्लोक 25, 26, 27)

व्याख्‍या : रेगिस्तान की धरती पर एक 'पिशाच' जन्म लेगा जिसका नाम महामद होगा, वो एक ऐसे धर्म की नींव रखेगा जिसके कारण मानव जाति त्राहिमाम् कर उठेगी। वो असुर कुल सभी मानवों को समाप्त करने की चेष्टा करेगा। उस धर्म के लोग अपने लिंग के अग्रभाग को जन्म लेते ही काटेंगे, उनकी शिखा (चोटी) नहीं होगी, वो दाढ़ी रखेंगे, पर मूंछ नहीं रखेंगे। वो बहुत शोर करेंगे और मानव जाति का नाश करने की चेष्टा करेंगे। राक्षस जाति को बढ़ावा देंगे एवं वे अपने को 'मुसलमान' कहेंगे और ये असुर धर्म कालांतर में स्वत: समाप्त हो जाएगा।

इस पुराण में द्वापर और कलियुग के राजा तथा उनकी भाषाओं के साथ-साथ विक्रम-बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्यनारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गई है। इस पुराण में ऐतिहासिक व आधुनिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। इसमें आल्हा-उदल के इतिहास का प्रसिद्ध आख्यान इसी पुराण के आधार पर प्रचलित है।

इस पुराण में नंद वंश, मौर्य वंश एवं शंकराचार्य आदि के साथ-साथ इसमें मध्यकालीन हर्षवर्धन आदि हिन्दू और बौद्ध राजाओं तथा चौहान एवं परमार वंश के राजाओं तक का वर्णन प्राप्त होता है। इसमें तैमूर, बाबर, हुमायूं, अकबर, औरंगजेब, पृथ्वीराज चौहान तथा छत्रपति शिवाजी के बारे में भी स्पष्‍ट उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भागवत पुराण के द्वादश स्कंध के प्रथम अध्याय में भी वंशों का वर्णन मिलता है।

सन्‌ 1857 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के भारत की साम्राज्ञी बनने और आंग्ल भाषा के प्रसार से भारतीय भाषा संस्कृत के विलुप्त होने की भविष्यवाणी भी इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से की गई है।

भविष्य पुराण में जिक्र आता है कि एक समय जब हिन्दुस्तान की सीमा हिंदकुश पर्वत तक थी तो वहां के प्रसिद्ध शिव मंदिर था। ऐसा कहा जाता है कि एक बार कुछ लोग हिन्दकुश पर्वत पर शिव के दर्शन करने गए थे तो भगवान शिव ने इन लोगों को बताया था कि अब आप सभी यहां से लौट जाओ। मैं भी इस स्थान को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ रहा हूं। जाओ और सभी को बताओ कि अब यहां किसी को नहीं आना है। थोड़े दिनों में प्रलय की शुरुआत यहां होने वाली है।

कहा जाता है कि इसके बाद खलिफाओं के आक्रमण ने अफगान और हिन्दुकुश पर्वतमाला के पास रहने वाले 15 लाख हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार किया था। अफगान इतिहासकार खोण्डामिर के अनुसार यहां पर कई आक्रमणों के दौरान 15 लाख हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार किया गया था। इसी के कारण यहां के पर्वत श्रेणी को हिन्दुकुश नाम दिया गया, जिसका अर्थ है 'हिंदुओं का वध।' हालांकि कुछ संत लोग मानते हैं कि भगवान जब किसी स्थान से नाराज होते हैं तो वहां प्राकृतिक प्रलय आने लगती हैं। आज हिंद्कुश पर्वत और आसपास का क्षेत्र भूकंप के आने का केंद्र बना हुआ है।

''अपनी तुच्छ बुद्धि को ही शाश्वत समझकर कुछ मूर्ख ईश्वर की तथा धर्मग्रंथों की प्रामाणिकता मांगने का दुस्साहस करेंगे इसका अर्थ है उनके पाप जोर मार रहे हैं।''

पुराणों में भारत में आज तक होने वाले सभी शासकों की वंशावली का उल्लेख मिलता है। पुराणकार पुराणों की भविष्यवाणियों का अलग-अलग अर्थ निकालते हैं। यहां प्रस्तुत हैं भागवत पुराण में दर्ज भविष्यवाणी के अंश।

''ज्यों-ज्यों घोर कलयुग आता जाएगा त्यों-त्यों सौराष्ट्र, अवंति, अधीर, शूर, अर्बुद और मालव देश के ब्राह्मणगण संस्कारशून्य हो जाएंगे तथा राजा लोग भी शूद्रतुल्य हो जाएंगे।''

यहां शूद्र का मतलब उस आचरण से है, जो वेद विरुद्ध है। मांस, मदिरा और संभोगादि प्रवृत्ति में ही सदा रत रहने वाले राक्षसधर्मी को शूद्र कहा गया है। जो ब्रह्म को मानने वाले हैं वही ब्राह्मण है। आज की जनता ब्रह्म को छोड़कर सभी को पूजने लगी है। जब सभी वेदों को छोड़कर संस्कारशून्य हो जाएंगे तब...

''सिंधुतट, चंद्रभाग का तटवर्ती प्रदेश, कौन्तीपुरी और कश्मीर मंडल पर प्राय: शूद्रों का संस्कार ब्रह्मतेज से हीन नाममा‍त्र के द्विजों का और म्लेच्छों का राज होगा। सबके सब राजा (राजनेता) आचार-विचार में म्लेच्छप्राय होंगे। वे सब एक ही समय में भिन्न-भिन्न प्रांतों में राज करेंगे।''

आप जानते हैं कि सिंधु के ज्यादातर तटवर्ती इलाके अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गए हैं। कुछ कश्मीर में हैं, जहां नाममात्र के द्विज अर्थात ब्राह्मण हैं। इन सभी (म्लेच्छों) के बारे में पुराणों में लिखा है कि... ''ये सबके सब परले सिरे के झूठे, अधार्मिक और स्वल्प दान करने वाले होंगे। छोटी बातों को लेकर ही ये क्रोध के मारे आग-बबूला हो जाएंगे।''

अब आगे पढ़िए कश्मीर में ब्राह्मणों के साथ जो हुआ, ''ये दुष्ट लोग स्त्री, बच्चों, गौओं और ब्राह्मणों को मारने में भी नहीं हिचकेंगे। दूसरे की स्त्री और धन हथिया लेने में ये सदा उत्सुक रहेंगे। न तो इन्हें बढ़ते देर लगेगी और न घटते। इनकी शक्ति और आयु थोड़ी होगी। राजा के वेश में ये म्लेच्‍छ ही होंगे।''

पूरे देश की यही हालत है अब राजा (राजनेता) न तो क्षत्रित्व धारण करने वाले रहे और न ही ब्राह्मणत्व। राजधर्म तो लगभग समाप्त ही हो गया है तो ऐसी स्थिति में, ''वे लूट-खसोटकर अपनी प्रजा का खून चूसेंगे। जब ऐसा शासन होगा तो देश की प्रजा में भी वैसा ही स्वभाव, आचरण, भाषण की वृद्धि हो जाएगी। राजा लोग तो उनका शोषण करेंगे ही, आपस में वे भी एक-दूसरे को उत्पीड़ित करेंगे और अंतत: सबके सब नष्ट हो जाएंगे।''

भागवत पुराण (अध्याय 'कलयुग की वंशावली' से अंश)

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ १. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक हो...