जागो हिंदू: ‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼



आज का प्रात: सँदेश

सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी ने कई बार मानव की रचना की , परंतु सृष्टि का विस्तार नहीं हो पाया ! तब उन्होंने मैथुनीसृष्टि करने का विचार करके मनु-सतरूपा को उत्पन्न किया | यहीं से सृष्टि में "विवाह-विधान" की उत्पत्ति हुई | सनातन धर्म के चार आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ आश्रम "गृहस्थाश्रम" कहा गया है | गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए विवाहरूपी द्वार को पार करना पड़ता है | विवाहोपरान्त ही मनुष्य गृहस्थाश्रम में प्रवेश पाता है | यह ऐसा आश्रम है जहाँ से समस्त मानवजाति ने जन्म एवं विकास प्राप्त किया | सनातनधर्म के सोलह संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार है-- विवाह-संस्कार | हमारे धर्म मेंकुल आठ प्रकार के विवाह बताये गये हैं ! इनमें से सर्वश्रेष्ठ वैदिकविधानान्तर्गत "ब्रह्मविवाह" माना गया है | जहाँ वरपक्ष के लोग दूल्हे का श्रृंगार करके कन्या के यहाँ बारति लेकर पहुँचते थे और वहाँ उनका विवधिवत स्वागत करके विवाहविधान वैदिक ब्रह्मण के द्वारा सम्पन्न कराया जाता है | सभी प्रकार के दानों में कन्यादान प्रमुख स्थान रखता है | कन्यादान करने के के लिए कन्यापक्ष के लोग व्रत रहकर कन्यादान करके अपना जीवन धन्य मानते थे | यहीं पर ब्राह्मण द्वारा "पाणिग्रहण-संस्कार" सम्पन्न कराया जाता था | पाणिग्रहण का अर्थ है कि कन्या के पिता द्वारा विधिवत संकल्प करके कन्या का हाथ वर के हाथ में सौंपना ! एवं वर द्वारा कन्या का पाणि (हाथ) ग्रहण करना | फिर सात फेरे लेकर सात वचनों में बांधकर वर-वधू को उसे जीवनभर निभाने की प्रतिज्ञा दिलवायी जाती थी |

आज आधुनिक युग में जहाँ सारे रीति-रिवाज बदलते हुए दिख रहे हैं वहीं विवाह-संस्कार भी इससे अछूते नहीं रह गये हैं | आज के विवाहोत्सव को देखकर यह कहा जा सकता है कि आज "ब्रह्मविवाह" के अन्तर्गत विवाह सम्पन्न कराने का ढोंग मात्र किया जाता है , शेष "गन्धर्वविवाह" ने अपना पूरा प्रभाव जमा दिया है | आज के विवाह संस्कारों ने "गन्धर्वविवाह" को भी लज्जित कर दिया है | गन्धर्वविवाह में वर-वधू स्वेच्छा से किसी एकान्त स्थान में किसी वृक्ष को साक्षी मानकर एक-दूसरे को जयमाल पहनाकर पति-पत्नी बन जाया करते थे | परंतु आज जो जयमाल संस्कार किये जा रहे हैं उसमें दोनों पक्षों के अतिरिक्त सर्वसमाज की साक्षी होती है | जयमाल के मंच पर ही आज वर वधू का पाणिग्रहण कर लेता है | जयमाल पहनाकर एक - दूसरे के साथ विभिन्न मुद्राओं में चित्र बनवाने में निर्लज्जता साफ झलकती है | आज शहरों के कुछ परिवारों के विवाह में निर्लज्जता भी लज्जित हो जाती है जब विवाह के पूर्व ही दोनों परिवारों की सहमति से वर वधू "प्री-वेडिंग के छायांकन (चित्रण) के लिए एकान्त में निकल जाते हैं | विचार कीजिए कि अब क्या मर्यादा बची है | आज परिवारों के टूटने का कारण यह विवाह संस्कार भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है | जहाँ पहले की बहुएं ससुराल में बड़ों के सामने बोलने या घूंघट खोलने की हिम्मत न करके मर्यादित रहती थीं | वहीं आज की बहू जिसने जयमाल के मंच या प्री-वेडिंग में ही अपनी मर्यादा को मिटा दिया है वह कितना सम्मान करेगी इसका प्रभाव आज समाज में देखने को मिल रहा है |

आईये पुन: वैदिक परम्पराओं की ओर लौटने का प्रयास करके जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करें |

सभी भगवत्प्रेमियोँ को आज दिवस की मंगलमय कामना---

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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बडागाँव-फैजाबाद
श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830

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