जागो हिंदू: "शरीर" - एक अविद्यमान सत्ता !!!

रविवार, 24 दिसंबर 2017

"शरीर" - एक अविद्यमान सत्ता !!!



देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है॥

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥

असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।वास्तव में अविद्यमान शीतोष्णादि का और उनके कारणों का भाव - होनापन अर्थात अस्तित्व है ही नहीं क्योंकि प्रमाणों द्वारा निरूपण किए जाने पर शीतोष्णादि और उनके कारण कोई पदार्थ ही नहीं ठहरते क्योंकि वे शीतोष्णादि सब विकार हैं और विकार सदा बदलता रहता है। जैसे आँख द्वारा निरूपण किया जाने पर घटादि (घड़ा) का आकार मिट्टी को छोड़ कर और कुछ भी उपलब्ध नहीं होता इसलिए असत् है, वैसे ही सभी विकार कारण के सिवा उपलब्ध न होने से असत् हैं। क्योंकि, उत्पत्ति से पूर्व और नाश के पश्चात उन सब की उपलब्धि नहीं है।

(श्रीमद्भगवद्गीता ; अध्याय - २, श्लोक - १३ से १६)

सर्वत्र सत्-बुद्धि और असत्-बुद्धि ऐसी दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। जिस पदार्थ को विषय करने वाली बुद्धि बदलती नहीं वह पदार्थ सत् है और जिसको विषय करने वाली बुद्धि बदलती हो वह असत् है। इस प्रकार सत् और असत् का विभाग बुद्धि के अधीन है।

कहने का तात्पर्य यह है कि मृगतृष्णा में भ्रमवश अधिष्ठान बालू के अतिरिक्त जल का अभाव है तो भी 'यह जल है' ऐसी बुद्धि असत् बुद्धि है।और अच्छी तरह समझने का प्रयास करते हैं - उत्त्पत्ति से पूर्व 'जल नहीं था', नाश के पश्चात् 'जल नहीं रहेगा', क्या वास्तव में वर्त्तमान में जल है ?? बिल्कुल नहीं ! वर्त्तमान में भी बालू है 'जल नहीं है'. इसी प्रकार, असत् जो शरीरादि एवं शीतोष्णादि द्वन्द्व और उनके कारण हैं उनका किसी का भी भाव - अस्तित्व उत्पत्ति से पूर्व 'नहीं था', नाश के पश्चात 'नहीं रहेगा' अतः वर्त्तमान में भी 'नहीं है' !! यह केवल प्रतीत हो रहा है !

वैसे ही, सत् जो आत्मतत्त्व है उसका अभाव अर्थात अविद्यमानता नहीं है ; क्योंकि वह सर्वत्र अटल है !!

भगवान् अर्जुन से कहते हैं, तू भी तत्त्वदर्शी पुरुषों की बुद्धि का आश्रय लेकर शोक और मोह को छोड़ कर तथा अनियत रूप शीतोष्णादि द्वन्द्वों को इस प्रकार मन में समझ कर कि ये सब विकार हैं, ये वास्तव में न होते हुए हीं मृगतृष्णा के जल की भाँति मिथ्या प्रतीत हो रहे हैं, इनको सहन कर। यह अभिप्राय है।

जय श्री कृष्ण !!

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