यमराज नचिकेता से -
आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
तू आत्मा को रथी जान, शरीर को रथ समझ, बुद्धि को सारथी जान और मन को लगाम समझ।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥
विवेकी पुरुष इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़े रुप से कल्पना किए जाने पर विषयों को उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मन से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं।
(कठोपनिषद्, अध्याय - १, वल्ली - ३, श्लोक - ३ और ४)
आत्मा - कर्मफल भोगने वाला संसारी - रथ का स्वामी है। और शरीर तो रथ ही है, क्योंकि शरीर रथ में बँधे हुए अश्व रूप इन्द्रियों द्वारा खींचा जाता है। निश्चय करना ही जिसका लक्षण है वह बुद्धि ही सारथी है, क्योंकि सारथी रूप नेता ही जिसमें प्रधान है उस रथ के समान शरीर बुद्धि रूप नेता की प्रधानता वाला है, क्योंकि देह के सभी कार्य प्रायः बुद्धि के ही कर्तव्य हैं। संकल्प-विकल्पादि रूप मन लगाम है क्योंकि जिस प्रकार घोड़े लगाम से नियंत्रित होकर चलते हैं उसी प्रकार आँख, कान, नाक, आदि समस्त इन्द्रियाँ मन से नियन्त्रित होकर ही अपने विषयों रूप, रस, आदि में प्रवृत होती हैं।
आँख, कान, नाक, आदि इन्द्रियों को घोड़े बतलाया गया है, क्योंकि इन्द्रियों और घोड़ों की क्रमशः शरीर और रथ को खींचने में समानता है। इस प्रकार उन इन्द्रियों को घोड़े रूप से परिकल्पित किए जाने पर रूप, रस, गंध, आदि विषयों को उनके मार्ग बतलाया गया है तथा शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि के सहित अर्थात उनसे युक्त आत्मा को विवेकी पुरुष "यह भोक्ता - संसारी है" ऐसा बतलाते हैं।
केवल (शुद्ध) आत्मा भोक्ता नहीं है। उसका भोक्तृत्व तो इन्द्रिय, मन, बुद्धि, आदि उपाधि के कारण ही है। वास्तव में इसका नाम "जीवात्मा" है।
जो बुद्धि रूप सारथी अविज्ञानवान् - अकुशल अर्थात् रथ संचालन में अकुशल अन्य सारथी के समान इन्द्रियरूप घोड़ों की प्रवृत्ति - निवृत्ति के विवेक से रहित है तथा विक्षिप्त/असंयत चित्त से युक्त है उस अनिपुण बुद्धि रूप सारथी के इन्द्रियरूप घोड़े अन्य सारथी के दुष्ट अर्थात बेकाबू घोड़ों के समान अवश्य यानी जिनका निवारण नहीं किया जा सकता ऐसे हो जाते हैं। जो अविज्ञानवान्, असंयतचित्त और इसीलिए सदा अपवित्र रहने वाला होता है उस सारथी के द्वारा वह रथी अक्षर परम पद को प्राप्त नहीं कर सकता है। वह कैवल्य को प्राप्त नहीं होता है। इतना ही नहीं, बल्कि जन्म-मरण रूप संसार को भी प्राप्त होता है।
जो बुद्धि रूप सारथी पूर्वोक्त सारथी से विपरीत विज्ञानवान् - कुशल तथा मन को नियंत्रित रखनेवाला अर्थात् संयतचित्त होता है उसके इन्द्रिय रूप घोड़े प्रवृत्त और निवृत्त किए जाने में इस प्रकार समर्थ होते हैं जैसे सारथी के लिए अच्छे घोड़े। जो विज्ञानवान् - कुशल, संयतचित्त/युक्तचित्त और इसीलिए सदा पवित्र रहनेवाला होता है उस सारथी के द्वारा वह रथी उसी पद को प्राप्त कर लेता है, जिस प्राप्त हुए पद से च्युत न होकर वह फिर संसार में उत्पन्न नहीं होता है। यह विद्वान पुरुष विवेकयुक्त बुद्धि - सारथी से युक्त एकाग्र मनवाला होने से पवित्र है। वह सम्पूर्ण संसार बन्धनों से मुक्त हो जाता है और प्राप्तव्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
उपरोक्त कुशल सारथी से युक्त रथी ही महारथी है; जिसके सारथी ने रथ की दिशा को पलट दिया है।
"महारथी" = महा + रथी = महा + आत्मा = "महात्मा" !!
यही 'महात्मा' है ! गुरु का पद केवल इसी से सुशोभित है। क्योंकि केवल यही हमें मोक्ष/कैवल्य प्राप्त करने में सहयोग कर सकता है!
जय श्री कृष्ण !!
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