जागो हिंदू: समय" का अस्तित्व "नहीं"

शनिवार, 5 मई 2018

समय" का अस्तित्व "नहीं"



"वहाँ" - "समय" का अस्तित्व "नहीं" है !!!
"Time" does NOT exist - "There" !!!

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।. अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश एवं मन, बुद्धि और अहंकार; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्रकृति अर्थात मुझ ईश्वर की मायाशक्ति आठ प्रकार से भिन्न है - विभाग को प्राप्त हुई है ।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌ ॥

यह (उपर्युक्त) मेरी अपरा प्रकृति अर्थात् परा नहीं, किन्तु निकृष्ट है, अशुद्ध है और अनर्थ करने वाली है एवं संसार बन्धनरूपा है । और हे महाबाहो! इस उपर्युक्त प्रकृति में दूसरी जीवरूपा अर्थात प्राणधारण की निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है, अंतर में प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृति के द्वारा यह समस्त जगत धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान ।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय - ७, श्लोक - ४ और ५)

कल्पित पदार्थों और उनसे संबंधित विचारों तक मन सीमित है। इसके पार मन नहीं जा सकता है। मन के दायरे में नए पदार्थ/वस्तु और उससे संबंधित विचार यानी जो पहले कल्पनातीत था, अभी-अभी कल्पित हुआ है, उसके अस्तित्व में आने के साथ ही उस पदार्थ/वस्तु को प्राप्त करने की कामना/इच्छा, लालसा, राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, आदि की उत्पत्ति होती है। इसी के साथ, उस पदार्थ/वस्तु और उसके विचार के संदर्भ में समय/काल की उत्पत्ति होती है। अगर किसी पदार्थ, विचार, आदि का अस्तित्व ही न हो तो समय का भी उस पदार्थ, विचार, आदि के संदर्भ में अस्तित्व नहीं होगा। अर्थात्, कल्पित वस्तु, विचार, आदि समय की परिधि में होंगे जबकि कल्पनातीत वस्तु, विचार, आदि का समय के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता है। मन के दायरे में उपलब्ध वस्तु, विचार, आदि पर ही समय प्रभावी है। यानी समय के प्रभाव का दायरा मन के दायरे के बराबर ही है। हम कह सकते हैं कि मन में उपलब्ध पदार्थ, विचार, आदि समय के आश्रय हैं।

३० वर्ष पहले, मोबाईल फोन हमारे लिए कल्पनातीत था। किंतु, आविष्कार के बाद मोबाईल फोन मन के दायरे में आ गया। साथ ही उसे प्राप्त करने की इच्छा, राग, लोभ, आदि की भी उत्पत्ति हुई। प्राप्त करने में असमर्थ व्यक्ति में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, हीन भावना, आदि की उत्पत्ति हुई। मन के दायरे में मोबाईल फोन के आने के बाद ही मोबाईल फोन के संदर्भ में समय/काल की उत्पत्ति हुई।

यदि कोई वस्तु मेरे लिए कल्पनातीत है तो मेरे लिए उस वस्तु के संबंध में समय का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। लेकिन, यदि वही वस्तु आपके लिए कल्पित है तो उस वस्तु के संबंध से आपके लिए समय प्रभावी रहेगा।

"समय की सहज उपस्थिति में केवल कल्पित तत्त्व, पदार्थ, वस्तु, विचार, आदि ही व्यक्त/इन्द्रियगोचर होते हैं".

भगवान् स्पष्ट कह रहे हैं, "पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश सहित मन, बुद्धि और अहंकार (अंतःकरण) मेरी माया शक्ति (अपरा प्रकृति) - निकृष्ट, अशुद्ध, अनर्थ करनेवाली एवं संसार बंधन रुपा है". उपरोक्त सभी जड़ (जैसे मिट्टी) पदार्थ हैं। अतः इनकी अपनी कोई शक्ति नहीं है। इस प्रकार जड़ मन का आश्रय ग्रहण करनेवाला समय भी जड़ सिद्ध हो जाता है।

कहते हैं - "पुरुष बली नहीं होत है, होत समय बलवान". प्रश्न है - समय तो जड़ (बलहीन) सिद्ध हो गया तो समय पुरुष (चेतन) से बलवान कैसे हो सकता है? बल्कि समय के संदर्भ में शब्द बलवान का प्रयोग ही नहीं होना चाहिए। उत्तर है - माया में आत्मा को आरोपित करनेवाला पुरुष माया के सहज ही वशीभूत हो जाने के कारण मन का आश्रय ग्रहण करनेवाले समय के भी वशीभूत हो जाता है। अतः जब तक माया प्रभावी है तब तक समय पुरुष से सहज ही बलवान प्रतीत होता है।

अपरा प्रकृति यानी माया (उपरोक्त समस्त ८) से सहज ही छूट जाने के फलस्वरुप स्वरुपतः सर्वव्याप्त सत्ता आत्मा की उपलब्धि का नाम "मोक्ष" है। यदि ऐसा है तो मन के साथ मन का आश्रय ग्रहण करनेवाले समय का भी छूट जाना निश्चित है। अतः माया के उस पार उतरने वाला पुरुष "कालरहित" सत्ता प्राप्त करता है। अतः वहाँ न क्षण है, न मिनट है, न घंटा है, न दिन है, न सप्ताह है, न पखवाड़ा है, न मास है, न वर्ष है और न ही युग है। माया की परिधि में बसने वाले हम सब तो काल रहित अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सक रहे हैं।

अ-काल है। सिक्खों के द्वारा कहे जाने वाले "अकाल तख्त" का शाब्दिक अर्थ है "काल से रहित परमात्मा का सिंहासन". शास्त्र कहता है "वह काल परिच्छिन्न नहीं है".

वहाँ गया हुआ पुरुष कब लौट कर आता है?? इस प्रश्न का प्रश्न ही नहीं उठता है क्योंकि "कब" समय के परिप्रेक्ष्य में ही पूछा जा सकता है। अतः मोक्ष प्राप्त पुरूष कभी लौट कर नहीं आता है!

जय श्री कृष्ण !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ १. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक हो...