यह शरीर एक नगर है! प्रज्ञा इसकी चहार दीवारी हौ है! हड्डियाँ खम्भे हैं! चमड़ा इस नगर की दीवार है जो समूचे नगर को रोके है! माँस और रक्त के पंक का इस पर लेप चढ़ा हुआ है! इस नगर मे नौ दरवाजा है, इसकी रक्षा मे बहुत प्रयत्न करना पड़ता है, नस नाड़ियाँ घेरे हुए हैं, चेतन पुरूष नगर के भीतर राजा के रूप मे विराजमान है उसके दो मन्त्री हैं - बुद्धि और मन! दोनों परस्पर विरोधी हैं, और आपस मे वैर निकालने का यत्न करते रहते हैं, राजा के चार शत्रु हैं - काम, क्रोध., लोभ, मोह! जो उसका नाश चाहते है, जब तक राजा नौ दरवाजों को बन्द किये रहता है तब तक सुरक्षित रहता है! परन्तु जब नगर के सभी दरवाजे खुला छोड़ देता है राग नामक शत्रु नेत्र आदि द्वारो पर आक्रमण कर देता है! वह हर जगह व्याप्त रहता है, बहुत विशाल और पॉच दरवाज़ो से नगर में प्रवेश करता है! उसके साथ तीन भंयकर शत्रु प्रवेश करते है, पॉच इन्द्रिय नामक द्वारो से शरीर में प्रवेश करके राग, मन तथा अन्यान्य इन्द्रयो के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है और मन तथा इन्द्रयो को वश मे करके वह दुर्धर्ष हो जाता है! और समस्त दरवाजों को काबू में करके चहार दीवारी को नष्ट कर देता है, मन को राग के अधीन देखकर बुद्धि पलायन कर जाती है, नष्ट हो जाती है, जब मन्त्री साथ नहीं रहते तब अन्य पुरबासी भी साथ छोड़ देते है! फिर शत्रुओं को उसके छिद्र का ज्ञान हो जाने से राजा उनके द्वारा नाश को प्राप्त होता है! इस प्रकार राग, मोह, लोभ तथा क्रोध -ये दुरात्मा शत्रु मनुष्य की स्मरण -शक्ति का नाश करने वाले हैं, राग से काम होता है, काम से लोभ का जन्म होता है, लोभ से सम्मोह - अविवेक. होता है! और सम्मोह से स्मरण शक्ति भ्रान्त हो जाती है, स्मृति की भ्रान्ति से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य स्वयं भी नष्ट हो जाता है --कर्तव्य भ्रष्ट हो जाता है.!!!!!!!
सोमवार, 18 दिसंबर 2017
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