सनातन बंधुओ मुझे अपने बचपन की एक बात बार बार याद आती है । जब मैने पहली कक्षा में प्रवेश लिया और सर्दियां आई तो पता चला के अब बड़े दिनों की छुट्टियों होंगी । ऐसा नहीं है पहले ये बात नहीं सुनी थी ।बड़े भाइयों और बहन से सुना था पर कभी ध्यान नहीं गया इस ऒर । तब ये समझ में भी नहीं आया । लेकिन एक बात मस्तिक में जरूर आई तीसरी कक्षा में आते आते कि माँ कहती है सर्दियों के दिन छोटे होते है फिर बड़े दिनों की छुट्टियां सर्दी में कैसे होती है ?
नया साल एक जनवरी से क्यों शुरू होता है ? जबकि माँ कहती नया सम्वत् होली के बाद आने वाले नवरात्रों से शुरू होता है ।
ऐसे ही अनेक प्रश्नो को मस्तिक में लिए मैं बड़ा हुआ । जिनमें से कुच्छ का उत्तर मुझे छठी कक्षा में मिला ।
अभी 25 दिसम्बर को मेरे कुछ मित्रों ने मुझे क्रिसमस के सन्देश भेंजे और इसके साथ ही ईसाई नव वर्ष की तैयारियाँ शुरू हो गयी है ।अब बहुत सारें शुभ कामना सन्देश आने शुरू हो जायेंगे ।
इसके ठीक उलटे जब हमारा सम्वत्सर शुरू होता है तो हममें से इसके बारे में बहुतों को पता तक नहीं होता या फिर ये कहिये उनको उसमे पिछड़ापन नजर आता है ।
ये सब लिखने का मेरा उद्देश्य किसी का विरोध करना नहीं है , बल्कि अपनी सनातन पहचान और ज्ञान को आमजन को बताना है, और उन बंधुओ को बताना है हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में ,काल गणना के माध्यम से भारतीय वर्ष पद्धतियों को आधार बना कर ।
हमारी सनातन परम्परा में सामन्यतया 7 तरह के वर्ष प्रचलन में है । जो इस तरह से है । चांद्रवर्ष,सौरवर्ष,नाक्षत्रवर्ष, सावनवर्ष,पितृवर्ष,देववर्ष, ब्रह्मावर्ष ।
यहाँ हम इन्हें बरी - बरी से जानते है ।
चांद्रवर्ष :-चन्द्र वर्ष का निर्माण तिथियों के आधार पर होता है , और तिथि का निर्माण सूर्य और चन्द्र की गति का अंतर 12 अंश होने पर होता है । इस तरह से 30 तिथियों का निर्माण होता है जो पूर्णतया वैज्ञानिक है । और इससे ये सिद्ध होता है कि हमारे पूर्वज नक्षत्र विज्ञान के जन्मदाता थे । एक गोले में 360 अंश होते है अत: 360÷12=30 इस तरह 30 तिथियों से एक मास का निर्माण होता है । इसी तरह 12 चंद्र मासो का एक चन्द्रवर्ष होता है ।
मास की 30 तिथियाँ कृष्ण पक्ष में एक से चौदह और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि। शुक्ल पक्ष में 14 तिथियों के अंत में पूर्णिमा होती है इस तरह शुक्ल पक्ष की 15 तिथियाँ । 14 तिथियों के नाम वही होते है दोनों पक्षों में ।
तिथियों के नाम निम्नवत् है :- प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दशमी), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (द्वादसी), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) पूर्णिमा (पूरणमासी)अमावस्या (अमावस)।
यहाँ ये स्पष्ठ करना जरुरी है कि ज्योतिष में शुक्ल प्रतिपदा मास की पहली तिथि , पूर्णिमा पन्द्रमी और अमावस्या तीसवीं तिथि होती है ।
आकाशमण्डल के 27 नक्षत्रों में से 12 नक्षत्रों के नामों पर मास नाम रखे गये हैं। जिस मास जो नक्षत्र आकाश में प्रायः रात्रि के आरम्भ से अन्त तक दिखाई देता है या कह सकते हैं कि जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है।
1) चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र मास
2) विशाखा नक्षत्र के नाम पर वैशाख मास
3)ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम पर ज्येष्ठ मास
4) आषाढ़ा नक्षत्र के नाम पर आषाढ़ मास
5)श्रवण नक्षत्र के नाम पर श्रावण मास
6)भाद्रपद के नाम पर भाद्रपद मास
7)अश्विनी के नाम पर आश्विन मास
8)कृत्तिका के नाम पर कार्तिक मास
9)मृगशीर्ष के नाम पर मार्गशीर्ष
10) पुष्य के नाम पर पौष
11) मघा के नाम पर माघ तथा
12) फाल्गुनी नक्षत्र के नाम पर फाल्गुन मास का नामकरण हुआ है।
सौरवर्ष :- सौरवर्ष में 12 सौरमास होते है , एक सौर मास 30 से 31 दिन का होता है । सौर मास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है।
सौरमास के नाम 12 राशियों के नाम ही है यथा मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन
सवनवर्ष :- सावन दिन एक सूर्य उदय से दूसरे सूर्य उदय तक होता है । 30 सावन दिन का एक सावन मास होता है। 12 सावन मास का एक सवनवर्ष होता है । इसी कारण ज्योतिष में दिन सूर्य उदय से शुरू होकर अगले सूर्य उदय तक रहता है ।
नाक्षत्रवर्ष :- चन्द्रमा मध्यम गति से एक दिन में एक नक्षत्र का भोग करता है । इस तरह से 27 दिन में 27 नक्षत्र का भोग पूरा कर लेता है । इसे एक नक्षत्र मास कहते है । 12 नक्षत्र मास का एक नक्षत्र वर्ष होता है ।
पितृवर्ष :- पितृ देवता चन्द्रमा पर निवास करते है । कृष्ण पक्ष उनका दिन और शुक्ल पक्ष उनकी रात होती है । इस तरह से हमारे 30 महीनों का का उनका एक महीना होता है ,और ऐसे 12 महीनो का उनका एक वर्ष होता है ।
देववर्ष :- देवताओ का निवास उत्तरी ध्रु पर है । दक्षणी ध्रु पर दैत्य निवास करते है । ध्रु प्रदेश पर 6 - 6 महीने के दिन - रात होते है ।
इस तरह से हमारे 30 वर्ष का देवताओ का एक महीना होता है ।और हमारे 360 वर्ष देवताओ के एक वर्ष के बराबर होते है ।
ब्रह्मावर्ष :- सनातन परम्परा में 4 युग होते है ।
कलयुग का मान = 4,32000 वर्ष
द्वापर का मान =8,64000 वर्ष
त्रेता का मान =12,96000 वर्ष
सतयुग का मान =17,28000 वर्ष
चार युगो को मिला के एक महायुग बनता है
महागुग का मान =43,20000 वर्ष
ऐसे 71 महायुगों का एक कल्प बनता है । और एक कल्प ब्रह्मा के एक दिन के बराबर होता है । और 360 दिनों का ब्रह्मा का एक वर्ष होता है । ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष की होती है।
अब वर्ष के प्रारम्भ होने के समय की बात करते है । हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है ।
इस समय सूर्य मेष राशि में होता है । सृष्टि का आरम्भ मेष राशि के आदि बिंदु से हुआ है । सृष्टि का पहला दिन रविवार था और सूर्य की पहली होरा थी ।
इस कारण हमारा नव वर्ष तब ही शुरू होता है यानि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ।
अब ईशवी नववर्ष की अवैज्ञानिकता की बात करते है । जिसके स्वागत की तैयारियाँ आप बेसब्री से कर रहें है । उसमे कोई वैज्ञानिता मुझे नजर नहीं आती । इसमें पहले 10 महीने होते थे । तब ये मार्च से शुरू होता था । मार्च का अर्थ भी शुरुवात करना होता है। बाद में इसमें 2 महीने जोड़ दिए गए जनवरी और फ़रवरी इनको अंत में जोड़ना चाहिए था लेकिन शुरू में जोड़ दिया इसका परिणाम ये हुआ कि जहाँ से शुरू होता था वह तीसरा महीना बन गया । दिसम्बर अर्थ दशवाँ होता है यह दशमलव से बना है अब ये 12वाँ महीना बन गया । डेट और दिन रात के बारह बजे बदलती है जिसका कोई आधार नहीं है । वास्तव में पहले विश्व का समय महाकालेश्वर से निर्धारित होता था । लेकिन जब हम अंग्रेजो के गुलाम बने तो उन्होंने हमारे बारे में बहुत कुच्छ जाना और हमारे साथ डेट और दिन बदलना शुरू किया । क्योंकि भारत और इंग्लैंड के समय में 5 घंटे 30 मिनट का अंतर है ।वो हमसे 5.30 घंटे पिच्छे है । लेकिन ऐसा करके उन्होंने अपने बौद्धिक दिवलयेपन का ही परिचय दिया उस समय वहाँ रात होती है ।
अब हमारी राष्ट्रीय नैतृत्व की बात करे जो आज भी कामनवेल्थ का सदस्य है जिसका अर्थ है हम आज भी इंग्लैंड की महारानी को अपनी आका मानते है ।
और एक सच्चे सेवक की भाति हमने भी मध्य रात्रि में दिन और दिनांक बदलना शुरू कर दिया ।
हमारी इसी पराधीन मानसिकता के कारण हम अपने पे भरोसा करने के स्थान पर दुसरो का कचरा इस नववर्ष और अन्य तरह कई तरह से ढो रहे है ।
बन्धुजन अब आप चिंतन करे आपको कौनसा नववर्ष मनाना है गौरव के साथ अपना या गुलामो की दुसरो का ?
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