जागो हिंदू: सबका मालिक एक है.... ईश्वरः एकोअस्ति।।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

सबका मालिक एक है.... ईश्वरः एकोअस्ति।।


सबका मालिक - "संख्या एक (१) वाला नहीं" !!!

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश एवं मन, बुद्धि और अहंकार; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्रकृति अर्थात मुझ ईश्वर की मायाशक्ति आठ प्रकार से भिन्न है - विभाग को प्राप्त हुई है ।

भगवान् श्री कृष्ण आगे कहते हैं,

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌ ॥

यह (उपर्युक्त) मेरी अपरा प्रकृति अर्थात परा नहीं, किन्तु निकृष्ट है, अशुद्ध है और अनर्थ करने वाली है एवं संसार बन्धनरूपा है । और हे महाबाहो! इस उपर्युक्त प्रकृति में दूसरी जीवरूपा अर्थात प्राणधारण की निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है, अंतर में प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृति के द्वारा यह समस्त जगत धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान ।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय - ७, श्लोक - ४ और ५)

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ॥

मुझ अव्यक्त रूप परमात्मा द्वारा अर्थात मेरा जो परम भाव है, जिसका स्वरुप प्रत्यक्ष नहीं है यानी मन, बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है, ऐसे मुझ अव्यक्त मूर्ति द्वारा यह समस्त जगत व्याप्त - परिपूर्ण है। उस अव्यक्त स्वरुप मुझ परमात्मा में ब्रह्मा से लेकर स्तंबपर्यंत समस्त प्राणी स्थित हैं। क्योंकि कोई भी निर्जीव प्राणी व्यवहार के योग्य नहीं समझा जाता अतः वे सब मुझमें स्थित हैं अर्थात मुझ परमात्मा से ही आत्मवान् हो रहे हैं, इसलिए मुझमें स्थित कहे जाते हैं। उन भूतों का वास्तविक स्वरुप मैं ही हूँ इसलिए अज्ञानियों को ऐसी प्रतीति होती है कि मैं उनमें स्थित हूँ, अतः कहता हूँ कि मैं उन भूतों में स्थित नहीं हूँ। क्योंकि साकार वस्तुओं की भाँति मुझमें संसर्ग दोष नहीं है। इसलिए मैं बिना संसर्ग के सूक्ष्म भाव से आकाश के भी अन्तर्व्यापी हूँ। संगहीन वस्तु कहीं भी आधेय भाव से स्थित नहीं होती यह प्रसिद्ध है।

(श्रीमद्भगवद्गीता ; अध्याय - ९ , श्लोक - ४)

भगवान् की सत्ता सर्वव्याप्त अतः अनंत और इसी कारण से अनादि है। यह मन, बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है। इन सब की उत्पत्ति का बीज भगवान् की योग माया है। ये सभी भगवान् की अपरा प्रकृति के अंतर्गत हैं। कोई भी संख्या और संख्याओं की गणना माया की सत्ता में ही होती है क्योंकि अनंत सत्ता में न कुछ जुड़ता है, न घटता है, न गुणा होता है और न ही विभाजित होता है। अतः कोई भी संख्या माया के कारण ही परिकल्पित है। सभी विषय और उन विषयों का ज्ञान जिनसे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और शरीर पोषित होता हो - माया यानी प्रकृति की ही उपज हैं। इसीलिए जीवन यापन के लिए या शरीर से आरम्भ होकर शरीर पर ही अंत हो जाने वाली समस्त विद्याओं को शास्त्रों में 'अविद्या' कहा गया है।

जब हम 'एक' कहते हैं तो उसी जाति के दूसरे की उपलब्धि अवश्य है। जैसे - राम एक लड़का है। श्याम नाम का दूसरा लड़का भी अवश्य है। इस प्रकार अनेक नामों के कई लड़के हैं। अनंत सत्ता समस्त जातियों से, अंकों एवं उनकी गणनाओं से परे सम्पूर्ण है।

१ = १, १ ≠ २, १ ≠ ३,............... १ ≠ १०००,...........अंततः १ ≠ ∞ (अनन्त)

आप ठीक से समझ सकें इसलिए मैंने उपरोक्त ढंग से बताया लेकिन सभी अंकों की तरह अनंत कोई अंक नहीं है।जिसने सर्वव्याप्त अनन्त सत्ता से युक्त भगवान् को "एक" कह दिया उसी ने अपनी प्रशंसा में अति की भी अति करके अत्यधिक कर दिया। उसने स्वयं के सम्बन्ध में कहा "अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड नायक". इसका क्या अर्थ है ???

इसका एक अर्थ है - "अनन्त करोड़ ब्रह्माण्ड" का नायक (निर्माता)। और दूसरा अर्थ है - "अनन्त प्रकार के ब्रह्माण्ड" का नायक (निर्माता)। यदि "अनन्त करोड़" को हम अंक में व्यक्त करें तो संख्या होगी ∞०००००००. वास्तव में, यह संख्या ही नहीं है बल्कि एक अर्थहीन आकृति मात्र है। शब्द "ब्रह्माण्ड" के आरंभ में अंक नहीं लग सकता है जैसे १ ब्रह्माण्ड, २ ब्रह्माण्ड, आदि। ब्रह्माण्ड का बहुवचन नहीं होता है। अन्यथा, कहा जाता - "कई ब्रह्माण्डों", "अनन्त ब्रह्माण्डों" आदि। बल्कि, इसका एकवचन भी नहीं होता है। "समूचा ब्रह्माण्ड", "पृथ्वी ब्रह्माण्ड का अंश", आदि कहना गलत नहीं है। अतः "अनन्त करोड़ ब्रह्माण्ड का नायक" और "अनन्त प्रकार के ब्रह्माण्ड का नायक" दोनों ही गलत सिद्ध होते हैं!

अनंत को किसी अतिश्योक्ति की आवश्यकता नहीं है। वह बस अनंत है, जो सम्पूर्ण है। यदि एक को अनन्त नहीं कह सकते हैं तो अनन्त को एक कैसे कह सकते हैं ! इसलिए "सबका मालिक एक" कदापि नहीं "सबका मालिक अनंत" है !!

जय श्री कृष्ण !!

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