जागो हिंदू: महर्षि शरभंग

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

महर्षि शरभंग



तपोभूमि दण्कारण्य क्षेत्र में अनेकानेक ऊर्ध्वरेता ब्रह्मवादी ऋषियों ने घोर तपस्याएँ की हैं ।कठिन योगाभ्यास एवं प्राणायाम आदि द्वारा संसार के समस्त पदार्थों से आसक्ति, ममता, स्पृहा एवं कामना का समूह नाश करके अपनी उग्र तपस्या द्वारा समस्त इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने वाले अनेकानेक ऋषियों में से शरभंग जी भी एक थे।
अपनी उत्कट तपस्या द्वारा इन्होंने ब्रह्मलोक पर विजय प्राप्त कर ली थी ।देवराज इन्द्र इन्हें सत्कारपूर्वक ब्रह्मलोक तक पहुँचाने के निमित्त आये।इन्होंने देखा कि पृथ्वी से कुछ ऊपर आकाश में देवराज का रथ खड़ा है ।बहुत से देवताओं से घिरे वे उसमें विराजमान हैं ।सूर्य एवं अग्नि के समान उनकी शोभा है ।देवांगनाएँ उनकी स्वर्ण-दण्डिकायुक्त चमरों से सेवा कर रही हैं ।उनके मस्तक पर श्वेत छत्र शोभायमान है ।गन्धर्व, सिद्ध एवं अनेक ब्रह्मर्षि उनकी अनेक उत्तमोत्तम वचनों द्वारा स्तुति कर रहे हैं ।ये इनके साथ ब्रह्मलोक की यात्रा के लिए तैयार ही थे कि इन्हें पता चला कि राजीवलोचन कोशलकिशोर श्री राघवेन्द्र रामभद्र भ्राता लक्ष्मण एवं भगवती श्री सीता जी सहित इनके आश्रम की ओर पधार रहे हैं ।ज्यों ही भगवान श्री राम के आगमन का शुभ समाचार इनके कानों में पहुँचा, त्यों ही तपःभूत अन्तःकरण में भक्ति का संचार हो गया ।वे मन ही मन सोचने लगे --- 'अहो ! लौकिक और वैदिक समस्त धर्मों का पालन जिन भगवान के चरण कमलों की प्राप्ति के लिए ही किया जाता है --- वे ही भगवान स्वयं जब मेरे आश्रम की ओर पधार रहे हैं, तब उन्हें छोड़ कर ब्रह्मलोक को जाना तो सर्वथा मूर्खता है ।ब्रह्मलोक के प्रधान देवता तो मेरे यहाँ ही आ रहे हैं --- तब वहाँ जाना निष्प्रयोजनीय ही है ।अतः मन ही मन यह निश्चय कर कि 'तपस्या के प्रभाव से मैंने जिन जिन अक्षय लोकों पर अधिकार प्राप्त किया है, वे सब मैं भगवान के चरणों में समर्पित करता हूँ ' इन्होंने देवराज इन्द्र को विदा कर दिया ।
ऋषि शरभंग जी के अन्तःकरण में प्रेमजनित विरह का भाव उदय हो गया ---

'चितवत पंथ रहेउँ दिन राती।'

वे भगवान श्री राम की अल्पकाल की प्रतीक्षा को भी युग युग के समान समझने लगे । 'भगवान श्री राम के सम्मुख ही मैं इस नश्वर शरीर का त्याग करूँगा ' --- इस दृढ़ संकल्प से वे भगवान राम की क्षण-क्षण प्रतीक्षा करने लगे ।
कमल-दल-लोचन श्यामसुंदर भगवान श्री राम इनके आश्रम पर पधारे ही।सीता - लक्ष्मण सहित रघुनन्दन को मुनिवर ने देखा ।उनका कण्ठ गद्गद हो गया ।वे कहने लगे ---

चितवत पंथ रहेउँ दिन राती।
अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
नाथ सकल साधन मैं हीना।
कीन्ही कृपा जानि जनु दीना।।

भगवान श्री राम को देखते ही प्रेमवश इनके लोचन भगवान के रूप-सुधा-मकरन्द का साग्रह पान करने लगे ।इनके नेत्रों के सम्मुख तो वे थे ही --- अपने प्रेम से इन्होंने इन्हें अपने अन्तःकरण में भी बैठा लिया ---

सीता अनुज समेत प्रभु
नील जलद तनु श्याम ।
मम हियँ बसहु निरंतर
सगुन रूप श्रीराम।।

भगवान को अपने अन्तःकरण में बैठाकर मुनि योगाग्नि से अपने शरीर को जलाने के लिए तत्पर हो गये ।योगाग्नि ने इनके रोम, केश, चमड़ी, हड्डी, मांस और रक्त -- सभी को जलाकर भस्म कर डाला।अपने नश्वर शरीर को नष्ट कर वे अग्नि के समान तेजोमय शरीर से उत्पन्न हुए ।परम तेजस्वी कुमार के रूप में वे अग्नियों, महात्मा ऋषियों और देवताओं के भी लोकों को लाँघकर दिव्य धाम को चले गये ।

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