जागो हिंदू: सोमवती अमावस्या-१

रविवार, 17 दिसंबर 2017

सोमवती अमावस्या-१

ह‍िंदू कैलेंडर में अमावस्‍या त‍िथि‍ हर माह पड़ती है। इसका कोई द‍िन न‍िश्‍च‍ित नहीं है। ज‍िससे यह अपने क्रमानुसार क‍िसी भी द‍िन पड़ जाती है। हालां‍क‍ि जब यह अमावस्‍या सोमवार के द‍िन पड़ती है तो इसका महत्‍व ज्‍यादा होता है, क्‍योंक‍ि इस द‍िन का सीधा संबंध भगवान श‍िव से होता है। ऐसे में सोमवार को पड़ने वाली अमावस्‍या को सोमवती अमावस्‍या कहते हैं। शास्‍त्रों के मुताब‍िक सोमवती अमावस्या के दिन वि‍ध‍िवि‍धान से पूजा पाठ करने से हर मनोकामना पूरी होती है। मह‍िलाओं के ल‍िए बेहद खास होता है। इस द‍िन पत‍ि की दीर्घायु की कामना की जाती है। वहीं कन्‍याओं द्वारा सोमवती अमावस्‍या की पूजा क‍िए जाने से उन्‍हें मनचाहा पत‍ि म‍िलता है। इस दि‍न पर पीपल वृक्ष की पूजा होती है। पि‍तृ दोष दूर करने के लि‍ए भी यह द‍िन खास होता हैं।


पत‍ि की लंबी आयु के ल‍िए

महि‍लाएं इस द‍िन सुबह उठकर सबसे पहले नदी आद‍ि में स्‍नान करें। उसके बाद सूर्य या फ‍िर तुलसी के वृक्ष में जल दें। भगवान श‍िव जी पर भी जलाभ‍िषेक करें। इसके बाद पीपल के पेड़ क नीचे जाकर वहां पर व‍िध‍िवि‍धान से उस वृक्ष की पूजा करें। पूजा में दूध, दही, फूल, चावल, हल्‍दी, त‍िल व सोलह श्रृंगार का सामान चढाएं। इसके बाद टॉफी, ब‍िस्‍कि‍ट, रूमाल, मेवा या फ‍िर सुहाग की क‍िसी भी एक सामान से कम से कम 14 बार पीपल की फेरी लगाएं। इन सामान की संख्‍या भी 14 होनी चाह‍िए। इसके अलावा यह फेरी ज्‍यादा से ज्‍यादा 108 बार ही लगानी चाह‍िए। फेरी लगाते समय पीपल में सफेद या पीला धागा लपेटना चाह‍िए। पूजा के समापन के बाद यह सारा सामाना कन्‍याओं या फ‍िर स‍ुहागि‍नों में बांट देना चाह‍िए।

प‍ितृ दोष से म‍िलती राहत

वहीं ज‍िन लोगों के ऊपर प‍ितृ दोष होते हैं उनके ल‍िए भी यह द‍िन बहुत खास होता है। प‍ितृदोष से परेशान लोगों को इस द‍िन पीपल के पेड़ के नीचे जाकर उसकी पूजा करनी चाह‍िए। यहां पर पीपल के पेड़ पर भगवान व‍िष्‍णु का नाम लेकर एक जनेऊ चढाएं। म‍िठाई आद‍ि का भोग लगाने के बाद करीब 108 बार पीपल के पेड़ की पर‍िक्रमा करें। वहीं सोमवती अमावस्‍या के द‍िन दूध से बनी खीर द्वारा दक्षिण दिशा में प‍ितृ की तस्‍वीर के सामने हवन करने से दोष दूर होता है। इसके अलावा एक आसान उपाय यह भी है क‍ि इस दि‍न कौओं और मछलियों को चावल और देशी घी से बने लड्डू देने से भी दोष में कमी आती है। इतना ही नहीं भोजन एवं दक्षिणा आद‍ि का दान करने से भी काफी हद तक दोषों से छुटकारा म‍िलता है। जीवन सरल बनता है।


सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। ये वर्ष में लगभग एक अथवा दो ही बार पड़ती है। इस अमावस्या का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व होता है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु कामना के लिए व्रत का विधान है। इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।[1] शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष।[2] इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर १०८ बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है।[3] और कुछ अन्य परम्पराओं में भँवरी देने का भी विधान होता है। धान,पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ को चढाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा। ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

कथा

सोमवती अमावस्या से सम्बंधित अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। परंपरा है कि सोमवती अमावस्या के दिन इन कथाओं को विधिपूर्वक सुना जाता है।[3] एक गरीब ब्रह्मण परिवार था, जिसमे पति, पत्नी के अलावा एक पुत्री भी थी। पुत्री धीरे धीरे बड़ी होने लगी। उस लड़की में समय के साथ सभी स्त्रियोचित गुणों का विकास हो रहा था। लड़की सुन्दर, संस्कारवान एवं गुणवान भी थी, लेकिन गरीब होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। एक दिन ब्रह्मण के घर एक साधू पधारे,जो कि कन्या के सेवाभाव से काफी प्रसन्न हुए। कन्या को लम्बी आयु का आशीर्वाद देते हुए साधू ने कहा की कन्या के हथेली में विवाह योग्य रेखा नहीं है। ब्राह्मण दम्पति ने साधू से उपाय पूछा कि कन्या ऐसा क्या करे की उसके हाथ में विवाह योग बन जाए। साधू ने कुछ देर विचार करने के बाद अपनी अंतर्दृष्टि से ध्यान करके बताया कि कुछ दूरी पर एक गाँव में सोना नाम की धूबी जाती की एक महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती है, जो की बहुत ही आचार- विचार और संस्कार संपन्न तथा पति परायण है। यदि यह कन्या उसकी सेवा करे और वह महिला इसकी शादी में अपने मांग का सिन्दूर लगा दे,उसके बाद इस कन्या का विवाह हो तो इस कन्या का वैधव्य योग मिट सकता है। साधू ने यह भी बताया कि वह महिला कहीं आती जाती नहीं है। यह बात सुनकर ब्रह्मणि ने अपनी बेटी से धोबिन कि सेवा करने कि बात कही।


कन्या तडके ही उठ कर सोना धोबिन के घर जाकर, सफाई और अन्य सारे करके अपने घर वापस आ जाती। सोना धोबिन अपनी बहू से पूछती है कि तुम तो तडके ही उठकर सारे काम कर लेती हो और पता भी नहीं चलता। बहू ने कहा कि माँजी मैंने तो सोचा कि आप ही सुबह उठकर सारे काम ख़ुद ही ख़तम कर लेती हैं। मैं तो देर से उठती हूँ। इस पर दोनों सास बहू निगरानी करने करने लगी कि कौन है जो तडके ही घर का सारा काम करके चला जाता हा। कई दिनों के बाद धोबिन ने देखा कि एक एक कन्या मुँह अंधेरे घर में आती है और सारे काम करने के बाद चली जाती है। जब वह जाने लगी तो सोना धोबिन उसके पैरों पर गिर पड़ी, पूछने लगी कि आप कौन है और इस तरह छुपकर मेरे घर की चाकरी क्यों करती हैं। तब कन्या ने साधू द्बारा कही गई साड़ी बात बताई। सोना धोबिन पति परायण थी,उसमें तेज था। वह तैयार हो गई। सोना धोबिन के पति थोड़ा अस्वस्थ थे। उसमे अपनी बहू से अपने लौट आने तक घर पर ही रहने को कहा। सोना धोबिन ने जैसे ही अपने मांग का सिन्दूर कन्या की मांग में लगाया, उसके पति गया। उसे इस बात का पता चल गया। वह घर से निराजल ही चली थी, यह सोचकर की रास्ते में कहीं पीपल का पेड़ मिलेगा तो उसे भँवरी देकर और उसकी परिक्रमा करके ही जल ग्रहण करेगी। उस दिन सोमवती अमावस्या थी। ब्रह्मण के घर मिले पूए- पकवान की जगह उसने ईंट के टुकडों से १०८ बार भँवरी देकर १०८ बार पीपल के पेड़ की परिक्रमा की और उसके बाद जल ग्रहण किया। ऐसा करते ही उसके पति के मुर्दा शरीर में कम्पन होने लगा।


महिमा

पीपल के पेड़ में सभी देवों का वास होता है।[3] अतः, सोमवती अमावस्या के दिन से शुरू करके जो व्यक्ति हर अमावस्या के दिन भँवरी (परिक्रमा करना ) देता है,उसके सुख और सौभग्य में वृद्धि होती है। जो हर अमावस्या को न कर सके, वह सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन १०८ वस्तुओं कि भँवरी देकर सोना धोबिन और गौरी-गणेश कि पूजा करता है, उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।


विधान


ऐसी परम्परा है कि पहली सोमवती अमावस्या के दिन धान, पान, हल्दी,सिन्दूर और सुपाड़ी की भँवरी दी जाती है।[3] उसके बाद की सोमवती अमावस्या को अपने सामर्थ्य के हिसाब से फल,मिठाई, सुहाग सामग्री, खाने कि सामग्री इत्यादि की भँवरी दी जाती है। भँवरी पर चढाया गया सामान किसी सुपात्र ब्रह्मण,ननद या भांजे को दिया जा सकता है। अपने गोत्र या अपने से निम्न गोत्र में वह दान नहीं देना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कुलदेवता

कुलदेवता’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ १. कुल अर्थात आप्तसंबंधों से एकत्र आए एवं एक रक्त-संबंध के लोग । जिस कुलदेवता की उपासना आवश्यक हो...