सूर्यनगर में धनंजय नाम का एक बहुरुपिया रहता था, अपनी रूप बदलने की कला को प्रदर्शित कर वह लोगों को प्रसन्न करता था और अपनी जीविका चलाता था, इस कला में वह इतना दक्ष था कि कई बार लोग उसे पहचान नहीं पाते थे !
एक विद्वान ने भी धनंजय की कला को देखा और वह भी बहुत प्रभावित हुए !
उन्होंने धनंजय को सुझाव दिया कि तुम राजा के समक्ष इस कला का प्रदर्शन क्यों नहीं करते !!
यदि वह प्रसन्न हो गए तो एक बार में ही सारी दरिद्रता मिट जाएगी !!!
धनंजय को भी यह सुझाव पसंद आया, उसने एक मोहिनी स्त्री का वेश धारण किया और दरबार में जा पहुंचा, उसने इतना सुंदर रूप धरा था कि सभी दरबारी और राजा तक उसके रूप पर मुग्ध हो गए !
धनंजय ने जब देख लिया कि उसकी कला सबके हृदय पर छाप छोड़ चुकी है तो फिर उसने पूरे दरबार को अपना वास्तविक परिचय दिया !!
राजा भी उसकी कला से प्रसन्न हुए, कुछ स्वर्ण मुद्राए देकर उसे रोज एक नया रूप धरकर दरबार में आने को कहा !!!
अगले दिन धनंजय एक संन्यासी का वेश धरकर दरबार में गया, उसने शास्त्रों की और दर्शन के गुणों की व्याख्या की और ईश्वर की महत्ता से सबका परिचय कराया !
राजा उसके वास्तविक से लगने वाले रूप से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे सौ स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार स्वरूप देनी चाही लेकिन धनंजय ने कहा- मैं संन्यासी हूँ मुझे धन से क्या प्रयोजन! इतना कहकर वह शांति से दरबार से बाहर निकल गया !!
सन्यासी के बाद धनंजय ने नर्तकी का रूप धारण किया, नर्तकी के रूप में उसने लय और ताल पर ऐसा समधुर नृत्य प्रस्तुत किया कि सभी दंग रह गये !
राजा ने उसे पुनः सौ मुद्राएं पुरस्कार के रूप में देनी चाही तब धनंजय ने कहा- हे महाराज आपका यश सुनकर मै अत्यंत दूर से आयी हूँ, आशा है आप मेरी कला का उचित सम्मान करेंगे !!
राजा क्रोधित होकर बोला- यह क्या मजाक है? कल तो तुमने एक भी स्वर्ण मुद्रा नहीं ली और आज सौ भी तुम्हें कम समझ आ रही हैं, एक ही दिन में व्यक्ति का लालच इतना बढ़ते मैंने कभी नही देखा !!!
धनंजय ने शांत स्वर में उत्तर दिया- महाराज कल मैंने एक संन्यासी का रूप बनाया था अत: सन्यासी के स्वभाव के अनुरूप ही व्यवहार किया, संन्यासी को माया से कोई मोह नहीं होता इसलिये मैंने वो इनाम नहीं लिया !
किन्तु एक नर्तकी तो विषयों की दासी है, नर्तकी अपनी कला का प्रदर्शन अधिकाधिक धन प्राप्ति के लिए ही करती है उसका मकसद केवल अधिक से अधिक धन कमाना ही होता है !!
अत: संन्यासी के लिए सौ स्वर्ण मुद्राएं जहां व्यर्थ थीं वहीं नर्तकी के लिए सौ स्वर्ण मुद्राए पर्याप्त नही हैं !!!
धनंजय के उत्तर से महाराज प्रसन्न हुए और पांच सौ मुद्राएं दीं !!!
इन्सान को अपने चरित्र के समान ही व्यवहार करना चाहिए तभी वह सफल है, जैसे अगर आप एक साधु होकर लोभ, मोह और क्रोध रखेंगे तो आप साधु कहलाने लायक नही हैं और एक नर्तकी अगर सादा व्यवहार रखेगी तो उसका जीवन कैसे चलेगा !!!
उसी प्रकार इन्सान को चाहिए कि वह स्वयं को अपने पद के अनुसार ढाले, यदि नौकरीपेशा हैं तो आपमें अपने अधिकारी की आज्ञा मानने का गुण होना चाहिए !
और अगर आप अधिकारी हैं तो आपको आदेश देने के उचित गुण होने चाहिए !!
इनके विपरीत आचरण से आप अपना धन और मान दोनों ही गंवा सकते हैंl
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