जागो हिंदू: *अहिल्या*अहिल्या उद्धार की सबसे सुन्दर कथा।*

रविवार, 24 दिसंबर 2017

*अहिल्या*अहिल्या उद्धार की सबसे सुन्दर कथा।*

 
जरूर पढ़ें ।
पत्थर क्यों पूजते हैं।
लोग जरूर पढ़ें ।

(पत्थर)- पत्थर भी हमारी तरह जीवात्मा हैं. फिर, हमें यह भी ज्ञात है कि वैज्ञानिक पत्थर की उम्र भी निकालते हैं और किसी पत्थर को डेड स्टोन अर्थात मृत पाषाण भी घोषित करते हैं. उनके इस प्रकरण से स्पष्ट होता है कि पत्थर का अपना जीवन-काल होता है. उसकी उत्पत्ति होती है और अंत भी होता है. ये सारे लक्षण सजीव के होते हैं, अत: पत्थर भी सजीव हुआ. चूंकि, उपर्युक्त सारे कार्य अविनाशी, आत्म-तत्व के बिना संभव नहीं हो सकते, अत: इसमें निस्संदेह आत्मा का वास है, यह सिद्घ हो जाता है. यह सत्य हमारे ग्रंथों में कथा रूप में वर्णित हैं, जिनके कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं.पर्वतराज हिमालयहमारे ग्रंथों में पर्वतराज हिमालय का वर्णन विलक्षण मानव के रूप में मिलता है. जिसके माध्यम से मनीषियों ने इस सत्य को जन-समुदाय के समक्ष रखा कि एक कलाधारी जीव अर्थात पर्वत अपने तेज़ बल से चार पांच और कलाओं को धारण कर श्रेष्ठ मनुष्य बन सकता है.

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि अगर पर्वतराज हिमालय में आत्मा नहीं थी, तो कारक शक्ति के बिना उन्होंने अपनी कलाओं को कैसे बढ़ा लिया और स़िर्फ कलाओं के बढ़ने से निर्जीव, सजीव कैसे हो गया? अब उपर्युक्त दोनों स्थितियां आत्मा के बिना संभव नहीं हैं, अत: यह सिद्ध हुआ कि पर्वत में आत्मा होती है. कथा के माध्यम से यह सा़फ इंगित होता है कि संपूर्ण पाषाण-जगत का प्रगटीकरण आत्म-तत्व के साथ ही संभव हो पाया है.गौतम-पत्नी अहिल्यायह कथा सर्वविदित है कि गौतम ऋषि के श्रापवश उनकी पत्नी अहिल्या पत्थर बन गई और जब श्रीराम के चरण-रज ने उस पत्थर का स्पर्श किया तो उसने पुन: नारी रूप को प्राप्त कर लिया.

इस प्रसंग से कई प्रश्न जन्म लेते हैं. प्रथम प्रश्न तो यह होगा कि श्रापवश अगर अहिल्या का शरीर पत्थर का बन गया और पत्थर में चूंकि आत्मा नहीं बस सकती, इस कारण अहिल्या की आत्मा अन्यत्र कहीं चली गई तो उसकी आत्मा ने कोई और रूप धारण कर लिया होगा और इस स्थिति में अहिल्या नहीं, बल्कि उसका मात्र शरीर पत्थर का रूप धारण किया तो क्या श्राप मिथ्या सिद्ध नहीं हुआ?

श्राप तभी मिथ्या सिद्घ नहीं होगा जब अहिल्या की आत्मा भी उस पत्थर में बस गई हो और तभी यह संभव हो पाया कि पत्थर-रूपी अहिल्या भगवान श्रीराम के चरण-रज का स्पर्श पाते ही पुन: नारी रूप प्राप्त कर पाई.

इस कथा से यह सत्य स्पष्ट रूप से प्रकाशित होता है कि पत्थर में भी आत्मा का वास होता है. गौतम ऋषि के श्राप ने अहिल्या की एक कला को छोड़कर शेष सारी कलाएं छीन लीं और अहिल्या एक कलाधारी जीव अर्थात पाषाणरूप में परिणत हो गई. भगवान श्रीराम के चरण-रज के स्पर्श ने अहिल्या की श्राप द्वारा छीनी हुई कलाएं लौटा दीं, फलत: अहिल्या पूर्ववत नारी रूप में प्रकट हो गई।

उपरोक्त दोनों कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि पाषाण ब्रह्म का प्रथम प्रकट स्वरूप है. अत: ब्रह्म के इस प्रथम प्रकट स्वरूप को ब्रह्म का प्रतीक मानकर पूजा अर्चना हेतु अपनाया गया. तब से पत्थर को ब्रह्म के अनेक रूपों में एक रूप देकर पूजा जाने लगा और इस तरह साकार ब्रह्म की उपासना हेतु मूर्ति-पूजा सशक्त परंपरा के रूप में प्रचलित हुई. यह परंपरा ब्रह्म के सर्वत्र प्राप्त होने वाले गुण को प्रतिबिंबित करने का प्रथम प्रयास है.

(संकलित जानकारी से-) उद्धार की
सबसे सुन्दर कथा।*
जरूर पढ़ें ।
पत्थर क्यों पूजते हैं।
लोग जरूर पढ़ें ।

(पत्थर)- पत्थर भी हमारी तरह जीवात्मा हैं. फिर, हमें यह भी ज्ञात है कि वैज्ञानिक पत्थर की उम्र भी निकालते हैं और किसी पत्थर को डेड स्टोन अर्थात मृत पाषाण भी घोषित करते हैं. उनके इस प्रकरण से स्पष्ट होता है कि पत्थर का अपना जीवन-काल होता है. उसकी उत्पत्ति होती है और अंत भी होता है. ये सारे लक्षण सजीव के होते हैं, अत: पत्थर भी सजीव हुआ. चूंकि, उपर्युक्त सारे कार्य अविनाशी, आत्म-तत्व के बिना संभव नहीं हो सकते, अत: इसमें निस्संदेह आत्मा का वास है, यह सिद्घ हो जाता है. यह सत्य हमारे ग्रंथों में कथा रूप में वर्णित हैं, जिनके कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं.पर्वतराज हिमालयहमारे ग्रंथों में पर्वतराज हिमालय का वर्णन विलक्षण मानव के रूप में मिलता है. जिसके माध्यम से मनीषियों ने इस सत्य को जन-समुदाय के समक्ष रखा कि एक कलाधारी जीव अर्थात पर्वत अपने तेज़ बल से चार पांच और कलाओं को धारण कर श्रेष्ठ मनुष्य बन सकता है.

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि अगर पर्वतराज हिमालय में आत्मा नहीं थी, तो कारक शक्ति के बिना उन्होंने अपनी कलाओं को कैसे बढ़ा लिया और स़िर्फ कलाओं के बढ़ने से निर्जीव, सजीव कैसे हो गया? अब उपर्युक्त दोनों स्थितियां आत्मा के बिना संभव नहीं हैं, अत: यह सिद्ध हुआ कि पर्वत में आत्मा होती है. कथा के माध्यम से यह सा़फ इंगित होता है कि संपूर्ण पाषाण-जगत का प्रगटीकरण आत्म-तत्व के साथ ही संभव हो पाया है.गौतम-पत्नी अहिल्यायह कथा सर्वविदित है कि गौतम ऋषि के श्रापवश उनकी पत्नी अहिल्या पत्थर बन गई और जब श्रीराम के चरण-रज ने उस पत्थर का स्पर्श किया तो उसने पुन: नारी रूप को प्राप्त कर लिया.

इस प्रसंग से कई प्रश्न जन्म लेते हैं. प्रथम प्रश्न तो यह होगा कि श्रापवश अगर अहिल्या का शरीर पत्थर का बन गया और पत्थर में चूंकि आत्मा नहीं बस सकती, इस कारण अहिल्या की आत्मा अन्यत्र कहीं चली गई तो उसकी आत्मा ने कोई और रूप धारण कर लिया होगा और इस स्थिति में अहिल्या नहीं, बल्कि उसका मात्र शरीर पत्थर का रूप धारण किया तो क्या श्राप मिथ्या सिद्ध नहीं हुआ?

श्राप तभी मिथ्या सिद्घ नहीं होगा जब अहिल्या की आत्मा भी उस पत्थर में बस गई हो और तभी यह संभव हो पाया कि पत्थर-रूपी अहिल्या भगवान श्रीराम के चरण-रज का स्पर्श पाते ही पुन: नारी रूप प्राप्त कर पाई.

इस कथा से यह सत्य स्पष्ट रूप से प्रकाशित होता है कि पत्थर में भी आत्मा का वास होता है. गौतम ऋषि के श्राप ने अहिल्या की एक कला को छोड़कर शेष सारी कलाएं छीन लीं और अहिल्या एक कलाधारी जीव अर्थात पाषाणरूप में परिणत हो गई. भगवान श्रीराम के चरण-रज के स्पर्श ने अहिल्या की श्राप द्वारा छीनी हुई कलाएं लौटा दीं, फलत: अहिल्या पूर्ववत नारी रूप में प्रकट हो गई।

उपरोक्त दोनों कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि पाषाण ब्रह्म का प्रथम प्रकट स्वरूप है. अत: ब्रह्म के इस प्रथम प्रकट स्वरूप को ब्रह्म का प्रतीक मानकर पूजा अर्चना हेतु अपनाया गया. तब से पत्थर को ब्रह्म के अनेक रूपों में एक रूप देकर पूजा जाने लगा और इस तरह साकार ब्रह्म की उपासना हेतु मूर्ति-पूजा सशक्त परंपरा के रूप में प्रचलित हुई. यह परंपरा ब्रह्म के सर्वत्र प्राप्त होने वाले गुण को प्रतिबिंबित करने का प्रथम प्रयास है.

(संकलित जानकारी से-)

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